कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५४४ * श्रीरामॊत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड १
प्रविविक्त—सूक्ष्म जगत्का भोक्ता (जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव करनेवाला) तैजस (प्रकाशस्वरूप हिरण्यगर्भ) उस पूर्णतम परमेश्वरका द्वितीय पाद है। (श्रीरामपक्षमे श्री-शत्रुघ्न ही पूर्णतम परमात्मा श्रीरामके द्वितीय पाद—अङ्ग हैं। लक्ष्मणजीकी अपेक्षा दूसरे होनेके कारण ये द्वितीय हैं। प्रद्युम्न—कामके अङ्ग होनेसे ये सबके मनमें स्थित रहते हैं। स्वप्नावस्था में अन्य इन्द्रियोंके सुप्त हो जानेपर भी मन अपना कार्य करता रहता है, अतः मनके साथ उसमें निवास करनेवाले मनोभयरूप शत्रुघ्नजीकी भी स्वप्नमे स्थिति रहती ही है, इसलिये उनको 'स्वप्नस्थान' कहा गया है। मनमे स्थिति होनेसे वे अन्तःकरणकी बातोको जानते हैं, इसलिये अन्तःप्रज्ञ हैं। जैसे स्थूल जगत्का भार शेषरूपधारी लक्ष्मणपर है, उसी प्रकार सूक्ष्म लोकोंका भार समष्टि मनमें स्थित 'प्रद्युम्न'—कामपर है। समष्टि मन ही समस्त सूक्ष्म लोकोंका आधार है। उसमें रहनेवाले संकल्पमय प्रद्युम्न ही उस भारको वहन करते हैं। वे शत्रुघ्नसे अभिन्न हैं। अतः भूः आदि सात सूक्ष्म लोकोका भार जिनके अङ्गोंपर है, वे शत्रुघ्न-जी भी 'सप्ताङ्ग' हैं। उन्नीस मुख पूर्ववत् समझने चाहिये। जो सूक्ष्म लोकोंका अधिष्ठाता है, वह सूक्ष्म तत्त्वोंका भोक्ता और अनुभव करनेवाला होगा ही, अतः शत्रुघ्नजी ही 'प्रविविक्त-भुक्' हैं। तैजसका अर्थ यहाँ तेजोमय—परम कान्तिमान् है। प्रद्युम्न—कामके स्वरूप होनेसे शत्रुघ्नका सौन्दर्य अप्रतिम है, अतः वे 'तैजस' कहे गये हैं।)
अवस्थाको ही यहाँ 'सुषुप्ति' कहा है। इसमे सुप्त अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष न तो स्थूल भोगोकी इच्छा करता है और न स्वप्न—सूक्ष्म भोगोंकी ओर ही दृष्टि डालता है। इस जितेन्द्रियता एव स्थिरप्रज्ञतामें ही स्थित होनेके कारण भरतजी 'सुषुप्त-स्थान' कहे गये है। उन्होंने भी पिताकी ओरसे स्वतः प्राप्त हुए राज्यकी कामना नहीं की—स्वप्नमें भी उसका चिन्तन नहीं किया । वे नन्दिग्राममें समाधि लगाकर भगवान्के साथ एकीभूत हो गये थे । यो भी सदा श्रीरघुनाथजीका ही चिन्तन करनेके कारण वे उनके साथ एकरूप हो गये थे। वे प्रज्ञानघन अर्थात् महाप्राज्ञ—परम बुद्धिमान् हैं श्रीरघुनाथजीका अनन्य भक्त होना ही बुद्धिके उत्कर्षका परिचायक है । हर्ष-शोक आदिसे विचलित न होनेके कारण वे सदा 'आनन्दमय' कहे गये हैं । अनिरुद्धस्वरूप होनेके कारण उन्हें आनन्दका भोक्ता कहा गया है । उनमें विवेक शक्तिकी प्रधानता होनेसे ही वे 'चेतोमुख' हैं। 'प्राज्ञ' उनकी सञ्ज्ञा है। परम ज्ञानी—कुशाग्र-बुद्धि होनेके कारण उनको 'प्राज्ञ' कहा गया है।)
जिस अवस्था मे सोया हुआ मनुष्य किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति-अवस्था है। सुषुप्ति-अवस्थासे यहाँ प्रलयावस्थाकी ओर सङ्केत किया गया है। उस समय समस्त जगत् अपने कारण तत्त्वमें विलीन हो जाता है। अतः सुपुप्त अर्थात् कारण-तत्त्व ही जिसका संस्थान (शरीर) है, जो एकरूप है, केवल घनीभूत प्रज्ञान ही जिसका स्वरूप है, जो केवल आनन्दमय है, चैतन्य ही जिसका मुख है, जो एकमात्र आनन्दका ही उपभोग करनेवाला है, वह 'प्राज्ञ' ही परब्रह्म परमात्माका तृतीय पाद है। (श्रीराम-पक्षमें श्रीभरतलालजी ही तृतीय पाद हैं । लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी अपेक्षासे तो वे तृतीय हैं और श्रीरामकी प्राप्ति करानेवाले होनेके कारण [ श्रीरामं पादयति—गमयति इति पादः', इस व्युत्पत्तिके अनुसार ] 'पाद' कहे गये हैं। जहाँ इन्द्रियवर्ग और मन दोनों सो जाते हैं—दोनोंके अनियन्त्रित व्यापार बद हो जाते हैं, उस शम-दमसे सम्पन्न स्थिरप्रज्ञताकी
यह तीन पादोंके रूपमें वर्णित परमेश्वर (एव लीलापुरुषोत्तम श्रीराम) सबका ईश्वर (शासक) है। यह सबको जाननेवाला है। यही सबका अन्तर्यामी है। यही सम्पूर्ण जगत्का कारण है। तथा यही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति, (स्थिति) और प्रलयका स्थान है । जिसकी प्रज्ञा न तो अन्तर्मुखी है न बहिर्मुखी है, न दोनों ओर मुखवाली ही है; जो न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला ही है, जिसको देखा नहीं गया, व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता और पकड़ा भी नहीं जा सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं, जो चिन्तनमें नहीं आ सकता, जो किसी विशेष सकेतसे भी बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार है, तथा जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसे सर्वथा शान्त एवं कल्याणमय अद्वैत तत्त्व (परब्रह्म) को ही ज्ञानीजन समग्र परमेश्वरका चतुर्थ पाद मानते हैं। वह परमात्मा है और वही जाननेके योग्य है । (श्रीरामपक्षमें भी 'नान्तःप्रज्ञम्' आदि पदोंका यही अर्थ है । यहाँ श्रुति अनिर्वचनीय एव सर्वथा विलक्षण श्रीराम-तत्त्वका तटस्थभावसे सङ्केतमात्र करती है। स्वरूपतः वर्णन करनेमें तो वह सर्वथा असमर्थ है; क्योंकि वाणीकी वहाँतक पहुँच ही नहीं है ।) वे पूर्ण ब्रह्म परमात्मा (श्रीराम) सदा उज्ज्वल (निर्मल यथार्थ प्रकाशमान) हैं। अविद्या और उसके कार्योंसे सर्वथा