कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 587, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४५ रहित हैं। अपने भक्तजनोंके आत्माका अज्ञानमय बन्धन वे हर लेते हैं। सर्वदा अद्वैत हैं—उनमें द्वैतका सर्वथा अभाव है। वे आनन्दमूर्ति हैं। सबके अधिष्ठान हैं। सत्तामात्र उनका स्वरूप है। अविद्याजनित अन्धकार और मोह उनमें स्वभावत नहीं हैं, अथवा उनकी शरणमें जाते ही अविद्या- मय अन्धकार और मोहका सर्वथा नाश हो जाता है। ऐसे जो अनिर्वचनीयपरमात्मा श्रीराम हैं, वह मैं ही हूँ—इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये। ॐ, तत्, सत्, यत् और परं ब्रह्म आदि नामोंसे प्रतिपादित होनेवाले जो चिन्मय श्रीरामचन्द्रजी हैं, वह मैं ही हूँ, ॐ—सच्चिदानन्दमय, परम ज्योति स्वरूप जो वे श्रीरामभद्र हैं, वह मैं हूँ, वह मैं ही हूँ—इस प्रकार अपनेको सामने रखकर मनके द्वारा परब्रह्म परमात्मा श्रीरामके साथ एकता करे—भगवान्के साथ अपनी अभिन्नताका चिन्तन करे। जो लोग सदा यथार्थरूपम समझकर 'मैं राम हूँ' यों कहते हैं, वे संसारी नहीं हैं। निश्चय ही वे श्रीरामके ही स्वरूप हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। यह उपनिषद् है। जो इस प्रकार जानता है, वह मुक्त हो जाता है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यजीने उपदेश दिया ॥ ३ ॥ तदनन्तर महर्षि अत्रिने इन सुप्रसिद्ध याज्ञवल्क्य मुनिसे प्रश्न किया—'यह जो अनन्त एव अव्यक्त आत्मा (परमात्मा) है, इसे मैं कैसे जानूँ ?' तत्र वे प्रसिद्ध याज्ञवल्क्यजी बोले—उस अव्यक्त परमात्माकी अविमुक्त क्षेत्रमें उपासना करनी चाहिये। यह जो अनन्त एवं अव्यक्त आत्मा है, वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्रतिष्ठित है। प्रश्न-किंतु उस अविमुक्त क्षेत्रकी स्थिति कहाँ है ? उत्तर-अविमुक्त क्षेत्र वरणा और नाशीके मध्यमें प्रतिष्ठित है। प्रश्न-'वरणा' नामसे कौन प्रसिद्ध है ? और 'नाशी' किसका नाम है ? उत्तर-सम्पूर्ण इन्द्रियकृत दोषोंका वारण करती है, इससे वह 'वरणा' है, और समस्त इन्द्रियजनित पापोंका नाश करती है, इससे वह 'नाशी' कहलाती है। प्रश्न-इस अविमुक्तक्षेत्रका आध्यात्मिक स्थान कौन है ? उत्तर-भौंहों और नासिकाकी जो सन्धि है (जहाँ इडा और पिङ्गला नामकी दो नाड़ियाँ मिली हुई हैं), वह द्युलोक तथा उससे भी उत्कृष्ट ज्योतिर्मय परमधामकी सन्धिक स्थान है। निश्चय ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस सन्धिकी ही 'सन्ध्या' के रूपमे उपासना करते हैं। अतः उस अव्यक्त परमात्मा श्रीरामकी अविमुक्त क्षेत्रमें रहकर अविमुक्तरूपमे (भांहों और नासिकाकी सन्धिमें) ही उपासना करनी चाहिये। जो उसे इस प्रकार जानता है, अर्थात् जो ऊपर बताये अनुसार यह भलीभाँति समझता है कि 'अव्यक्त परमात्माकी उपासनाका आधिभौतिक स्थान अविमुक्तक्षेत्र (काशी) और आध्यात्मिक स्थान भौंहों एव नासिकाके मध्यका भाग है—यहीं ध्यानद्वारा उस अव्यक्त तत्त्वका चिन्तन करना चाहिये', वही परमात्मासे नित्य संबद्ध (अविमुक्त) ज्ञानका उपदेश कर सकता है। यह अविनाशी, अनन्त, अव्यक्त, परिपूर्णानन्दैकरूचिन्मय- विग्रह परमात्मा अविमुक्तक्षेत्रम प्रतिष्ठित हैं। इसके बाद याज्ञवल्क्यजीने अत्रि मुनिसे यह कथा कही— एक समय भगवान् शङ्करने काशीम एक हजार मन्वन्तर- तक जप, होम और पूजन आदिके द्वारा श्रीरामकी आराधना करते हुए श्रीराम मन्त्रका जप किया। उसमे प्रसन्न होकर भगवान् श्रीरामने शङ्करजीमे कहा—'परमेश्वर ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लो, मैं उसे दूँगा।' तब मन्थानन्द- चिन्मय भगवान् शङ्करने श्रीरामसे कहा—'भगवन् ! मणिकर्णिका तीर्थम, मेरे काशीक्षेत्रमें अथवा गङ्गामे या गङ्गाके तटपर जो प्राण त्याग करता है, उस जीवको आप मुक्ति प्रदान कीजिये। इसके सिवा दूसरा कोई वर मुझे अभीष्ट नहीं है।' तब भगवान् श्रीरामने कहा—'देवेश्वर ! तुम्हारे इस पावन क्षेत्रमे जहाँ कहीं भी प्राण त्याग करनेवाले कीड़े मकोड़े आदि भी तत्काल मुक्त हो जायेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। तुम्हारे इस अविमुक्तक्षेत्रमे सब लोगोंकी मुक्ति सिद्धिके लिये मैं पाषाणकी प्रतिमा आदिम सदा निवास करता रहूँगा। शिवजी! इस काशीधामम मेरे इस षडक्षर तारक मन्त्र (रा रामाय नम ) द्वारा जो भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, मैं उसे ब्रह्महत्या आदि पापोंमे भी मुक्त कर दूँगा, तुम चिन्ता न करो। तुमसे अथवा ब्रह्माजीके मुखसे जो यहाँ षडक्षर मन्त्रकी दीक्षा लेते हैं, वे जीते जी तो मन्त्रसिद्ध होते हैं और मृत्युके बाद जन्म- मरणसे मुक्त हो मुझे प्राप्त कर लेते हैं। शिवजी ! जिस किसी भी मरणासन प्राणीके दाहिने कानमें तुम स्वयं मेरे मन्त्रका उपदेश करोगे, वह निश्चय ही मुक्त हो जायगा।' इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा वरदानसे अनुगृहीत अविमुक्तक्षेत्रका जो दर्शन करता है, वह जन्मान्तरके दोषोंको उ० अ० ६९-७०-