कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५४४ * श्रीरामॊत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड १
प्रविविक्त—सूक्ष्म जगत्का भोक्ता (जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव करनेवाला) तैजस (प्रकाशस्वरूप हिरण्यगर्भ) उस पूर्णतम परमेश्वरका द्वितीय पाद है। (श्रीरामपक्षमे श्री-शत्रुघ्न ही पूर्णतम परमात्मा श्रीरामके द्वितीय पाद—अङ्ग हैं। लक्ष्मणजीकी अपेक्षा दूसरे होनेके कारण ये द्वितीय हैं। प्रद्युम्न—कामके अङ्ग होनेसे ये सबके मनमें स्थित रहते हैं। स्वप्नावस्था में अन्य इन्द्रियोंके सुप्त हो जानेपर भी मन अपना कार्य करता रहता है, अतः मनके साथ उसमें निवास करनेवाले मनोभयरूप शत्रुघ्नजीकी भी स्वप्नमे स्थिति रहती ही है, इसलिये उनको 'स्वप्नस्थान' कहा गया है। मनमे स्थिति होनेसे वे अन्तःकरणकी बातोको जानते हैं, इसलिये अन्तःप्रज्ञ हैं। जैसे स्थूल जगत्का भार शेषरूपधारी लक्ष्मणपर है, उसी प्रकार सूक्ष्म लोकोंका भार समष्टि मनमें स्थित 'प्रद्युम्न'—कामपर है। समष्टि मन ही समस्त सूक्ष्म लोकोंका आधार है। उसमें रहनेवाले संकल्पमय प्रद्युम्न ही उस भारको वहन करते हैं। वे शत्रुघ्नसे अभिन्न हैं। अतः भूः आदि सात सूक्ष्म लोकोका भार जिनके अङ्गोंपर है, वे शत्रुघ्न-जी भी 'सप्ताङ्ग' हैं। उन्नीस मुख पूर्ववत् समझने चाहिये। जो सूक्ष्म लोकोंका अधिष्ठाता है, वह सूक्ष्म तत्त्वोंका भोक्ता और अनुभव करनेवाला होगा ही, अतः शत्रुघ्नजी ही 'प्रविविक्त-भुक्' हैं। तैजसका अर्थ यहाँ तेजोमय—परम कान्तिमान् है। प्रद्युम्न—कामके स्वरूप होनेसे शत्रुघ्नका सौन्दर्य अप्रतिम है, अतः वे 'तैजस' कहे गये हैं।)
अवस्थाको ही यहाँ 'सुषुप्ति' कहा है। इसमे सुप्त अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष न तो स्थूल भोगोकी इच्छा करता है और न स्वप्न—सूक्ष्म भोगोंकी ओर ही दृष्टि डालता है। इस जितेन्द्रियता एव स्थिरप्रज्ञतामें ही स्थित होनेके कारण भरतजी 'सुषुप्त-स्थान' कहे गये है। उन्होंने भी पिताकी ओरसे स्वतः प्राप्त हुए राज्यकी कामना नहीं की—स्वप्नमें भी उसका चिन्तन नहीं किया । वे नन्दिग्राममें समाधि लगाकर भगवान्के साथ एकीभूत हो गये थे । यो भी सदा श्रीरघुनाथजीका ही चिन्तन करनेके कारण वे उनके साथ एकरूप हो गये थे। वे प्रज्ञानघन अर्थात् महाप्राज्ञ—परम बुद्धिमान् हैं श्रीरघुनाथजीका अनन्य भक्त होना ही बुद्धिके उत्कर्षका परिचायक है । हर्ष-शोक आदिसे विचलित न होनेके कारण वे सदा 'आनन्दमय' कहे गये हैं । अनिरुद्धस्वरूप होनेके कारण उन्हें आनन्दका भोक्ता कहा गया है । उनमें विवेक शक्तिकी प्रधानता होनेसे ही वे 'चेतोमुख' हैं। 'प्राज्ञ' उनकी सञ्ज्ञा है। परम ज्ञानी—कुशाग्र-बुद्धि होनेके कारण उनको 'प्राज्ञ' कहा गया है।)
जिस अवस्था मे सोया हुआ मनुष्य किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति-अवस्था है। सुषुप्ति-अवस्थासे यहाँ प्रलयावस्थाकी ओर सङ्केत किया गया है। उस समय समस्त जगत् अपने कारण तत्त्वमें विलीन हो जाता है। अतः सुपुप्त अर्थात् कारण-तत्त्व ही जिसका संस्थान (शरीर) है, जो एकरूप है, केवल घनीभूत प्रज्ञान ही जिसका स्वरूप है, जो केवल आनन्दमय है, चैतन्य ही जिसका मुख है, जो एकमात्र आनन्दका ही उपभोग करनेवाला है, वह 'प्राज्ञ' ही परब्रह्म परमात्माका तृतीय पाद है। (श्रीराम-पक्षमें श्रीभरतलालजी ही तृतीय पाद हैं । लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी अपेक्षासे तो वे तृतीय हैं और श्रीरामकी प्राप्ति करानेवाले होनेके कारण [ श्रीरामं पादयति—गमयति इति पादः', इस व्युत्पत्तिके अनुसार ] 'पाद' कहे गये हैं। जहाँ इन्द्रियवर्ग और मन दोनों सो जाते हैं—दोनोंके अनियन्त्रित व्यापार बद हो जाते हैं, उस शम-दमसे सम्पन्न स्थिरप्रज्ञताकी
यह तीन पादोंके रूपमें वर्णित परमेश्वर (एव लीलापुरुषोत्तम श्रीराम) सबका ईश्वर (शासक) है। यह सबको जाननेवाला है। यही सबका अन्तर्यामी है। यही सम्पूर्ण जगत्का कारण है। तथा यही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति, (स्थिति) और प्रलयका स्थान है । जिसकी प्रज्ञा न तो अन्तर्मुखी है न बहिर्मुखी है, न दोनों ओर मुखवाली ही है; जो न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला ही है, जिसको देखा नहीं गया, व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता और पकड़ा भी नहीं जा सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं, जो चिन्तनमें नहीं आ सकता, जो किसी विशेष सकेतसे भी बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार है, तथा जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसे सर्वथा शान्त एवं कल्याणमय अद्वैत तत्त्व (परब्रह्म) को ही ज्ञानीजन समग्र परमेश्वरका चतुर्थ पाद मानते हैं। वह परमात्मा है और वही जाननेके योग्य है । (श्रीरामपक्षमें भी 'नान्तःप्रज्ञम्' आदि पदोंका यही अर्थ है । यहाँ श्रुति अनिर्वचनीय एव सर्वथा विलक्षण श्रीराम-तत्त्वका तटस्थभावसे सङ्केतमात्र करती है। स्वरूपतः वर्णन करनेमें तो वह सर्वथा असमर्थ है; क्योंकि वाणीकी वहाँतक पहुँच ही नहीं है ।) वे पूर्ण ब्रह्म परमात्मा (श्रीराम) सदा उज्ज्वल (निर्मल यथार्थ प्रकाशमान) हैं। अविद्या और उसके कार्योंसे सर्वथा
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४५ रहित हैं। अपने भक्तजनोंके आत्माका अज्ञानमय बन्धन वे हर लेते हैं। सर्वदा अद्वैत हैं—उनमें द्वैतका सर्वथा अभाव है। वे आनन्दमूर्ति हैं। सबके अधिष्ठान हैं। सत्तामात्र उनका स्वरूप है। अविद्याजनित अन्धकार और मोह उनमें स्वभावत नहीं हैं, अथवा उनकी शरणमें जाते ही अविद्या- मय अन्धकार और मोहका सर्वथा नाश हो जाता है। ऐसे जो अनिर्वचनीयपरमात्मा श्रीराम हैं, वह मैं ही हूँ—इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये। ॐ, तत्, सत्, यत् और परं ब्रह्म आदि नामोंसे प्रतिपादित होनेवाले जो चिन्मय श्रीरामचन्द्रजी हैं, वह मैं ही हूँ, ॐ—सच्चिदानन्दमय, परम ज्योति स्वरूप जो वे श्रीरामभद्र हैं, वह मैं हूँ, वह मैं ही हूँ—इस प्रकार अपनेको सामने रखकर मनके द्वारा परब्रह्म परमात्मा श्रीरामके साथ एकता करे—भगवान्के साथ अपनी अभिन्नताका चिन्तन करे। जो लोग सदा यथार्थरूपम समझकर 'मैं राम हूँ' यों कहते हैं, वे संसारी नहीं हैं। निश्चय ही वे श्रीरामके ही स्वरूप हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। यह उपनिषद् है। जो इस प्रकार जानता है, वह मुक्त हो जाता है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यजीने उपदेश दिया ॥ ३ ॥ तदनन्तर महर्षि अत्रिने इन सुप्रसिद्ध याज्ञवल्क्य मुनिसे प्रश्न किया—'यह जो अनन्त एव अव्यक्त आत्मा (परमात्मा) है, इसे मैं कैसे जानूँ ?' तत्र वे प्रसिद्ध याज्ञवल्क्यजी बोले—उस अव्यक्त परमात्माकी अविमुक्त क्षेत्रमें उपासना करनी चाहिये। यह जो अनन्त एवं अव्यक्त आत्मा है, वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्रतिष्ठित है। प्रश्न-किंतु उस अविमुक्त क्षेत्रकी स्थिति कहाँ है ? उत्तर-अविमुक्त क्षेत्र वरणा और नाशीके मध्यमें प्रतिष्ठित है। प्रश्न-'वरणा' नामसे कौन प्रसिद्ध है ? और 'नाशी' किसका नाम है ? उत्तर-सम्पूर्ण इन्द्रियकृत दोषोंका वारण करती है, इससे वह 'वरणा' है, और समस्त इन्द्रियजनित पापोंका नाश करती है, इससे वह 'नाशी' कहलाती है। प्रश्न-इस अविमुक्तक्षेत्रका आध्यात्मिक स्थान कौन है ? उत्तर-भौंहों और नासिकाकी जो सन्धि है (जहाँ इडा और पिङ्गला नामकी दो नाड़ियाँ मिली हुई हैं), वह द्युलोक तथा उससे भी उत्कृष्ट ज्योतिर्मय परमधामकी सन्धिक स्थान है। निश्चय ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस सन्धिकी ही 'सन्ध्या' के रूपमे उपासना करते हैं। अतः उस अव्यक्त परमात्मा श्रीरामकी अविमुक्त क्षेत्रमें रहकर अविमुक्तरूपमे (भांहों और नासिकाकी सन्धिमें) ही उपासना करनी चाहिये। जो उसे इस प्रकार जानता है, अर्थात् जो ऊपर बताये अनुसार यह भलीभाँति समझता है कि 'अव्यक्त परमात्माकी उपासनाका आधिभौतिक स्थान अविमुक्तक्षेत्र (काशी) और आध्यात्मिक स्थान भौंहों एव नासिकाके मध्यका भाग है—यहीं ध्यानद्वारा उस अव्यक्त तत्त्वका चिन्तन करना चाहिये', वही परमात्मासे नित्य संबद्ध (अविमुक्त) ज्ञानका उपदेश कर सकता है। यह अविनाशी, अनन्त, अव्यक्त, परिपूर्णानन्दैकरूचिन्मय- विग्रह परमात्मा अविमुक्तक्षेत्रम प्रतिष्ठित हैं। इसके बाद याज्ञवल्क्यजीने अत्रि मुनिसे यह कथा कही— एक समय भगवान् शङ्करने काशीम एक हजार मन्वन्तर- तक जप, होम और पूजन आदिके द्वारा श्रीरामकी आराधना करते हुए श्रीराम मन्त्रका जप किया। उसमे प्रसन्न होकर भगवान् श्रीरामने शङ्करजीमे कहा—'परमेश्वर ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लो, मैं उसे दूँगा।' तब मन्थानन्द- चिन्मय भगवान् शङ्करने श्रीरामसे कहा—'भगवन् ! मणिकर्णिका तीर्थम, मेरे काशीक्षेत्रमें अथवा गङ्गामे या गङ्गाके तटपर जो प्राण त्याग करता है, उस जीवको आप मुक्ति प्रदान कीजिये। इसके सिवा दूसरा कोई वर मुझे अभीष्ट नहीं है।' तब भगवान् श्रीरामने कहा—'देवेश्वर ! तुम्हारे इस पावन क्षेत्रमे जहाँ कहीं भी प्राण त्याग करनेवाले कीड़े मकोड़े आदि भी तत्काल मुक्त हो जायेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। तुम्हारे इस अविमुक्तक्षेत्रमे सब लोगोंकी मुक्ति सिद्धिके लिये मैं पाषाणकी प्रतिमा आदिम सदा निवास करता रहूँगा। शिवजी! इस काशीधामम मेरे इस षडक्षर तारक मन्त्र (रा रामाय नम ) द्वारा जो भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, मैं उसे ब्रह्महत्या आदि पापोंमे भी मुक्त कर दूँगा, तुम चिन्ता न करो। तुमसे अथवा ब्रह्माजीके मुखसे जो यहाँ षडक्षर मन्त्रकी दीक्षा लेते हैं, वे जीते जी तो मन्त्रसिद्ध होते हैं और मृत्युके बाद जन्म- मरणसे मुक्त हो मुझे प्राप्त कर लेते हैं। शिवजी ! जिस किसी भी मरणासन प्राणीके दाहिने कानमें तुम स्वयं मेरे मन्त्रका उपदेश करोगे, वह निश्चय ही मुक्त हो जायगा।' इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा वरदानसे अनुगृहीत अविमुक्तक्षेत्रका जो दर्शन करता है, वह जन्मान्तरके दोषोंको उ० अ० ६९-७०-
५४६ * श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड १ दूर कर देता है तथा वह जन्मान्तरके पापोंका नाश कर डालता है ॥ ४ ॥ तदनन्तर उन प्रसिद्ध याज्ञवल्क्यजीसे भरद्वाजने पूछा— 'भगवन् ! किन मन्त्रोंद्वारा स्तुति करनेपर भगवान् श्रीराम प्रसन्न होते हैं और अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं? उन मन्त्रोंका आप हमें उपदेश करें।' तब वे प्रसिद्ध महर्षि याज्ञवल्क्यजी बोले—'ब्रह्मन् ! जिस प्रकार भगवान् शङ्करको वरदान देते हुए श्रीरामजीने काशीका महत्त्व बताया था, उसी प्रकार किसी समय ब्रह्माजीको भी उन्होंने वैसा ही उपदेश दिया था। उनके द्वारा ऐसा उपदेश पाकर ब्रह्माजीने निम्नाङ्कित गद्यमयी गाथासे उन्हें नमस्कार किया। जो सम्पूर्ण विश्वके आधार और महाविष्णुरूप हैं, रोग- शोकसे रहित नारायण हैं, परिपूर्ण आनन्द-विज्ञानके आश्रय हैं और परम प्रकाशरूप हैं, उन परमेश्वर श्रीरामका मन ही- मन स्तवन करते हुए ब्रह्माजीने उनकी इस प्रकार स्तुति की—
ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवानद्वैतपरमानन्दात्मा यत् परं ब्रह्म भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्चाखण्डैकरसात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च ब्रह्मानन्दामृत भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यत् तारक ब्रह्म भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यो ब्रह्मा विष्णुरीश्वरो य सर्वदेवात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् ये सर्वे वेदा साङ्गाः सशाखाः सपुराणा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यो जीवात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान्यः सर्वभूतान्तरात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान्ये देवासुरमनुष्यादि- भावा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् ये मत्स्यकूर्माद्यवतारा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १० ॥
ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च प्राणो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ११ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् योऽन्त करणचतु- ष्टयात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च यमो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्चान्तको भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च मृत्युर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यच्चामृतं भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यानि पञ्चमहाभूतानि भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यः स्थावरजङ्गमात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १८ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् ये च पञ्चाग्नयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या सप्तमहा- व्याहृतयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २० ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या विद्या भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २१ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या सरस्वती भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या लक्ष्मीर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या गौरी भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या जानकी भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यच्च त्रैलोक्यं भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यः सूर्यो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यः सोमो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २८ ॥
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४७ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यानि च नक्षत्राणि भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् ये च नवग्रहा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ३० ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् ये चाष्टौ लोकपाला भूर्भुवं स्वस्तस्मै वै नमो नम.॥ ३१ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् ये चाष्टौ वसवो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् ये चैकादश रुद्रा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् ये च द्वादशादित्या भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम.॥ ३४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् यच्च भूतं भव्यं भविप्यद् भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् यश्च ब्रह्माण्डस्यान्तर्बहि- र्व्याप्नोति विराट् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यो हिरण्यगर्भो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् या प्रकृतिर्भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३८ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् यश्चोङ्कारो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यश्चतस्रोऽर्द्धमात्रा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४० ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् य परमपुरुषो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४१ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यश्च महेश्वरो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ४२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यश्च महादेवी भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम.॥ ४३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् य ओं नमो भगवते वासुदेवाय यो महाविष्णुर्भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम. ॥४४॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् य परमात्मा भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यो विज्ञानात्मा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम. ॥ ४६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यः सच्चिदानन्दैक-रसात्मा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४७ ॥ 'ॐ जो जगत्-प्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे निश्चय ही भगवान् (षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न) हैं, अद्वितीय परमानन्द-स्वरूप हैं। जो सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म तथा भूर्भुवः स्वः—ये तीनों लोक हैं, वह सब भी वे ही हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सर्वत्र विख्यात श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे निश्चय ही भगवान् हैं, तथा जो अखण्डैकरसस्वरूप परमात्मा एव भू', भुवः, स्वः—ये तीनों लोक हैं, वह सब भी वे ही हैं। निश्चय ही उन्हें मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे निश्चय ही भगवान् हैं, तथा जो आनन्दमय, अमृतमय ब्रह्म तथा भू आदि तीनों लोक हैं, वह सब भी उन्हींका स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो तारक ब्रह्म और भूः, भुव, स्व. नामसे प्रसिद्ध तीनों लोक हैं, वह सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं, जो सर्वदेवमय परमात्मा हैं और जो भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद, उनकी शाखाएँ, पुराण तथा भू आदि तीनों लोक हैं, उन सबके रूपमें भी वे ही हैं। उन भगवान्को निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो जीवात्मा और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान्को निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध ,श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंका अन्तरात्मा और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो देवता, असुर और मनुष्य आदि भाव १ सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैराग्य—इन छ का नाम भग है। जिन पूर्णतम परमेश्वरमें ये छहों परिपूर्णरूपसे नित्य-निरन्तर स्थित रहते हैं, वे 'भगवान्' कहे गये हैं।
५४८ * श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड १
(जातियाँ) तथा भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो मत्स्य, कच्छप आदि अवतार और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। निश्चय ही उन भगवान् श्रीरामको मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो प्राण और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार—इन चार प्रकारके अन्तःकरणोंमें अवस्थित चेतन आत्मा और भू आदि तीनों लोक हैं, वे सब भी उन्हींके स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो यम और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो 'अन्तक' एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो मृत्यु एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है ॥ १-१५ ॥ 'ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो अमृत एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो पाँच महाभूत और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो स्थावर-जङ्गमके आत्मा (अथवा चराचरस्वरूप) एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो आहवनीय आदि पाँच अग्नि एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान्
हैं; तथा जो भू आदि सात महान्व्याहृतियाँ और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो विद्या तथा भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सरस्वती और भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप ह। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो लक्ष्मी एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप ह। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो गौरी एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो भगवती जनकनन्दिनी एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो त्रिलोकी- भूः, भुवः और स्वः है, वह सब भी उन्हींका स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सूर्यदेव और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो चन्द्रमा एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो नक्षत्रगण एव भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो नवग्रह और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है ॥ १६-३० ॥ 'ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४९ भगवान् हैं, तथा जो आठ लोकपाल और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो आठ वसु और भू,- भुव. आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है । ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो ग्यारह रुद्र और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं । उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है । ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो बारह आदित्य और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं । उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो भूत, वर्तमान और भविष्यत्काल एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो विराट् परमेश्वर इस ब्रह्माण्डके भीतर-बाहर व्याप्त हैं, वे और भू आदि तीनों लोक भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो प्रकृति एव भूः-भुव आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है । ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो ॐकार और भू भुव आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो चार अर्धमात्राएँ और भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो परम पुरुष एव भूः भुवः आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो महेश्वर और भूः भुवः- स्व.-तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो महादेव एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्रसे नमस्कार करने योग्य महाविष्णु एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप ह । उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो परमात्मा एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो विज्ञानात्मा एवं भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सच्चिदानन्दैकरसात्मा एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है' ॥३१-४७॥ जो ब्रह्मवेत्ता इन (मन्त्रराजके ४७ अक्षरोंके अनुसार) सैंतालीस मन्त्रोंसे प्रतिदिन भगवान् श्रीरामका स्तवन करता है, उसके ऊपर इस स्तुतिसे भगवान् प्रसन्न होते हैं। अतः जो इन मन्त्रोंसे प्रतिदिन भगवान्की स्तुति करता है, वह भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन करता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ तदनन्तर, भरद्वाजने याज्ञवल्क्यकी सेवामें उपस्थित होकर प्रार्थना की- 'भगवन् ! श्रीराम-मन्त्रराजके माहात्म्यका वर्णन कीजिये ।' तब उन प्रसिद्ध महात्मा याज्ञवल्क्यने कहा- स्वयंप्रकाश, परम ज्योतिर्मय तथा केवल अपने ही अनुभवद्वारा गम्य अद्वितीय चिन्मात्रस्वरूप जो परमात्मा है, वही श्रीरामचन्द्रजीके षडक्षर मन्त्रका प्रथम अक्षर ('रा' बीज ) माना गया है । मन्त्रका मध्यभाग जो 'रामाय' पद है, वह अखण्डैकरसानन्दस्वरूप तारक ब्रह्मका वाचक है, उसे सच्चिदानन्दस्वरूप ही समझना चाहिये । मन्त्रका अन्तिम
५५० ⁓ श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् ⁓ [ खण्ड १ भाग जो 'नम' पद है, उसे भी पूर्णानन्दैकविग्रह परमात्म- ज्ञात होता है। वह मानो सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा भगवान्का स्वरूप ही जानना चाहिये। सम्पूर्ण देवता और मुमुक्षु पुरुष यजन कर लेता है। उसके द्वारा इतिहास-पुराणोंका तथा सदा अपने हृदयमें उसको नमन करते रहते हैं। रुद्र-मन्त्रोंका लक्ष बार जप सम्पन्न हो जाता और उसका फल भी जो श्रीरामचन्द्रके इस षडक्षर मन्त्रराज ('रां रामाय नमः') उसे मिलता है। प्रणवका तो मानो वह सौ अरब जप कर लेता का प्रतिदिन नियमपूर्वक जप करता है, वह अग्निमें तपाकर है। वह अपने पूर्वकी तथा भावी दस दस पीढ़ियोंको पवित्र शुद्ध किया हुआ हो जाता है। वह वायु, सूर्य, चन्द्रमा, कर देता है। वह (समस्त पापोंसे छूटकर) पङ्क्तिपावन बन ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र देवताके द्वारा भी पवित्र कर दिया जाता है। वह महान् हो जाता है और वह अमृतत्वको प्राप्त जाता है। वह सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा 'ब्रह्मवेत्ता' रूपसे होता है।
॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
रोग और मृत्युको तप समझनेसे महान् लाभ एतद् वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परमं हैव लोकं जयति, य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद। (बृहदारण्यक० ५ । ११ । १) ज्वरादि व्याधियोंसे जो कष्ट होता है, उसको निश्चय ही परम तप समझे। जो ऐसा जानता है, वह परम लोक- को ही जीत लेता है। (तपकी भावनाके कारण शारीरिक कष्ट होते हुए भी दुःख नहीं होता और तपका फल प्राप्त होता है।) मृत मनुष्यको जो वनमें जलानेके लिये ले जाते हैं, उसको निश्चय ही परम तप समझे, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको जीत लेता है। मृतक मनुष्यको जो अग्निमें जलाते हैं वह भी निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। (मृत्युमें तपकी भावनासे मरण-कष्ट नहीं होता और अन्तमें मनमें तपरूप परमात्मा- की स्मृति रहनेसे दिव्य धाम या परमात्माकी प्राप्ति होती है।)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ अथर्ववेदीय गोपालपूर्व ाप न्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम उपनिषद् श्रीकृष्णका परब्रह्मत्व, उनका ध्यान करनेयोग्य रूप तथा अष्टादशाक्षर मन्त्र ॐ कृषिर्भूवाचक शब्दो नश्च निर्वृत्तिवाचकः । लेनेसे यह सब कुछ पूर्णतः ज्ञात हो जाता है । ‘स्वाहा’ इस तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥ माया-शक्तिसे ही प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण विश्व आवागमनके ॐ सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे । चक्रमें पड़ा रहता है” ॥ ३ ॥ नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥ १ ॥ तब मुनियोंने पूछा—‘श्रीकृष्ण कौन हैं ? और वे गोविन्द ॐ ‘कृष्’ शब्द सत्ताका वाचक है और ‘न’ शब्द कौन हैं ? गोपीजन वल्लभ कौन हैं ? और वह स्वाहा आनन्दका। इन दोनोंकी जहाँ एकता है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप कौन है ?’ ॥ ४ ॥ परब्रह्म ही ‘कृष्ण’ इस नामसे प्रतिपादित होता है। ॐ अनायास ही सब कुछ कर सकनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप यह सुनकर ब्रह्माजीने उन मुनियोंसे कहा—‘‘पापोंका श्रीकृष्णको, जो वेदान्तद्वारा जानने योग्य, सबकी बुद्धिके अपकर्षण ( अपहरण ) करनेवाले ‘कृष्ण’, गौ, भूमि तथा साक्षी तथा सम्पूर्ण जगत्के गुरु हैं, सादर नमस्कार है ॥ १ ॥ वेदवाणीके ज्ञातारूपसे प्रसिद्ध सर्वज्ञ ‘गोविन्द’, गोपीजन ( जीव समुदाय ) की अविद्या-कलाके निवारक अथवा अपनी ही हरिः ॐ । एक समयकी बात है, मुनियोंने सुप्रसिद्ध अन्तरङ्गा शक्तिरूप व्रज सुन्दरियोंमें सब ओरसे सम्पूर्ण विद्याओं देवता ब्रह्माजीसे पूछा—‘कौन सबसे श्रेष्ठ देवता है ? किससे एव चौसठ कलाओंका ज्ञान भर देनेवाले ‘गोपीजनवल्लभ’ मृत्यु भी डरती है ? किसके तत्त्वको भलीभाँति जान लेनेसे तथा इनकी मायाशक्ति ‘स्वाहा’—यह सब कुछ वह परब्रह्म सब कुछ पूर्णत ज्ञात हो जाता है ? किसके द्वारा प्रेरित होकर ही है। इस प्रकार उस श्रीकृष्ण नामसे प्रसिद्ध परब्रह्मका जो यह विश्व आवागमनके चक्रमें पड़ा रहता है ?’ ॥ २ ॥ ध्यान करता है, जप आदिके द्वारा उनके नामामृतका रसास्वादन करता है तथा उनके भजनमें लगा रहता है, वह अमृत- इन प्रश्नोंके उत्तरमें वे प्रसिद्ध ब्रह्माजी इस प्रकार बोले— स्वरूप होता है, अमृतस्वरूप होता है ( अर्थात् भगवद्भावको “निश्चय ही ‘श्रीकृष्ण’ सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। ‘गोविन्द’से मृत्यु ही प्राप्त हो जाता है )” ॥ ५-६ ॥ भी डरती है। ‘गोपीजन-वल्लभ’के तत्त्वको भलीभाँति जान
५५२ * गोपालपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २
तब उन मुनियोंने पुन. प्रश्न किया—'भगवन् ! श्रीकृष्ण- का ध्यान करनेयोग्य रूप कैसा है ? उनके नामामृतका रसास्वादन कैसे होता है ? तथा उनका भजन किस प्रकार किया जाता है ? यह सब हम जानना चाहते हैं, अतः हमें बताइये' ॥ ७ ॥ तब वे हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी स्पष्ट शब्दोंमें उत्तर देते हुए बोले, 'भगवान्का ध्यान करनेयोग्य रूप इस प्रकार है— ग्वाल-बालका सा उनका वेष है, नूतन जलधरके समान श्याम वर्ण है, किशोर अवस्था है तथा वे दिव्य कल्पवृक्षके नीचे विराज रहे हैं।' इसी विषयमे यहाँ ये श्लोक भी हैं—॥ ८ व ९ ॥ सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रितम् । दिव्यालङ्करणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ कालिन्दीजलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयन्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृते ॥ भगवान्के नेत्र विकसित श्वेत कमलके समान परम सुन्दर हैं, उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मेघके समान श्याम है, वे विद्युत्- के सदृश तेजोमय पीताम्बर धारण किये हुए हैं, उनकी दो भुजाएँ हैं, वे ज्ञानकी मुद्रामें स्थित हैं, उनके गलेमें पैरौतक लबी वनमाला शोभा पा रही है, वे ईश्वर हैं—ब्रह्मा आदि देवताओंपर भी शासन करनेवाले हैं, गोपों तथा गोप सुन्दरीयों- द्वारा वे चारों ओरसे घिरे हुए हैं, कल्पवृक्षके नीचे वे स्थित हैं, उनका श्रीविग्रह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित है, रत्न सिंहासन- पर रत्नमय कमलके मध्यभागमें वे विराजमान हैं। कालिन्दी- सलिलसे उठती हुई चञ्चल लहरोंको चूमकर बहनेवाली शीतल-मन्द सुगन्ध वायु भगवान्की सेवा कर रही है। इस रूपमे भगवान् श्रीकृष्णका मनमे चिन्तन करनेवाला भक्त संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ १०-१२ ॥ अब पुन उनके नामामृतके ग्नास्वादन तथा मन्त्र-जपका प्रकार बतलाते हैं—॥ १३ ॥ जलवाचक 'क्', भूमिता बीज 'ल्', 'ई', तथा चन्द्रमा- के समान आकार धारण करनेवाला अनुस्वार—इन सबका समुदाय है—'क्लीं', यही काम बीज है। इसके आदिमे रखकर 'कृष्णाय' पदका उच्चारण करे। यह 'क्लीं कृष्णाय' सम्पूर्ण मन्त्रका एक पद है। 'गोविन्दाय' यह दूसरा पद है। 'गोपीजन' यह तीसरा पद है। 'वल्लभाय' यह चौथा पद है और 'स्वाहा' यह पाँचवाँ पद है। पाँच पदोका यह 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' मन्त्र 'पञ्चपदी' कहलाता है। आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि— इन सबका प्रकाशक अथवा स्वरूप होनेके कारण यह चिन्मय मन्त्र पाँच अङ्गोंसे युक्त है। अतः— क्लीं कृष्णाय दिवात्मने हृदयाय नम । गोविन्दाय भूम्यात्मने शिरसे स्वाहा। गोपीजनसूर्यात्मने शिखायै वषट् । वल्लभाय चन्द्रात्मने कवचाय हुम्। स्वाहा अग्न्यात्मनेऽस्त्राय फट् । —इस प्रकार पञ्चाङ्गन्यास करके इस पाँच पद और पाँच अङ्गोवाले मन्त्रका जप करनेवाला साधक मन्त्रात्मक होनेसे परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होता है, परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होता है॥ १४ ॥
द्वितीय उपनिषद् श्रीकृष्णोपासनाकी विधि तथा यन्त्र-निर्माणका प्रकार
इस विषयमें यह श्लोक (मन्त्र) है—"जो उपासक 'क्लीं' इस कामबीजको आदिमें रखकर 'कृष्णाय' इस पदका, 'गोविन्दाय' इस पदका तथा 'गोपीजनवल्लभाय' इस पदका 'स्वाहा' सहित एक ही साथ उच्चारण करेगा, उसे शीघ्र ही श्रीकृष्ण-मिलनरूपा सद्गति प्राप्त होगी। उसके लिये दूसरी गति नहीं है।” इन श्रीकृष्ण भगवान्की भक्ति ही भजन है। उस भजनका स्वरूप है—इस लोक तथा परलोकके समस्त भोगोंकी कामनाका सर्वथा परित्याग करके इन श्रीकृष्णमें ही इन्द्रियोंसहित मनको लगा देना। यही नैष्कर्म्य (वास्तविक सन्यास) भी है। उन सचिदानन्द- मय भगवान् श्रीकृष्णका वेदज्ञ ब्राह्मण नाना प्रकारसे यजन करते हैं, 'गोविन्द' नामसे प्रसिद्ध उन भगवान्की अनेक प्रकारसे आराधना करते हैं। वे 'गोपीजनवल्लभ' (जीवमात्रके अकारण सुहृद् एव प्रियतम तथा गोप सुन्दरियोके प्राणाधार) श्यामसुन्दर ही सम्पूर्ण लोकोका पालन करते हैं और सम्यग्- रूप उत्तम वीर्यवाले उन भगवान्ने ही 'स्वाहा' (अपनी माया- शक्ति) का आश्रय लेकर जगत्को उत्पन्न किया है। जैसे सम्पूर्ण विश्वमे फैला हुआ एक ही वायुतत्त्व प्रत्येक शरीरके भीतर प्राण आदि पाँच रूपोंसे अभिव्यक्त हुआ है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण एक होते हुए भी इस उपर्युक्त मन्त्रमें
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उपनिषद् २ ] ·· महन्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति · ५५३ भिन्न भिन्न नाममे पाँच नामवाले प्रतीत होते हैं—वास्तवमे 'कृष्ण' आदि पाँच नामोंद्वारा एक ही भगवान्का प्रतिपादन होता है ॥ ४-५ ॥ तत्पश्चात उन मुनियोंने कहा—'सम्पूर्ण जगत्के आश्रयभूत परमात्मा गोविन्दकी उपासना कैसे होती है ? इसका उपदेश दीजिये ॥ ६ ॥ तब ब्रह्माजीने उन प्रसिद्ध मुनियोंमे भगवान्का जो पीठ है, उसका वर्णन करते हुए कहा—पीठपर सुवर्णमय अष्टदल कमल बनाये । उसके मध्यभाग ( कर्णिका ) मे दो त्रिकोण लिखे, जो एक दूसरेसे सम्पुटित हों । इस प्रकार छ कोण होंगे। इन कोणोंके मध्यभागमें स्थित जो कर्णिका है, उसमें आदि अक्षररूप कामबीजका, जो सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिका अमोघ साधन है, उल्लेख करे । फिर प्रत्येक कोणमें 'क्लीं' बीजसहित 'कृष्णाय नमः' मन्त्रके एक एक अक्षरका अङ्कन करे। तत्पश्चात् ब्रह्म-मन्त्र अर्थात् अष्टादशाक्षर गोपाल विद्या एव काम-गायत्रीका यथावत उल्लेख करके आठ वज्रोंसे घिरे हुए भूमण्डलका उल्लेख करे। तत्पश्चात् उक्त मन्त्रोके अङ्ग, वासुदेवादि, रुक्मिणी आदि स्वशक्ति एवं इन्द्र आदि, वसुदेव आदि, पार्थ आदि तथा निधि आदि आठ आवरणोंसे आवेष्टित करके उसकी पूजा करे ।* धारणेके लिये यन्त्र
- यन्त्रकी स्पष्ट विधि इस प्रकार समझना चाहिए । अपने घरपर गोबर और जलसे भूमिको लीप दे । फिर उस शुद्ध भूमिमें धोया हुआ पाठा स्थापित करके उसके ऊपर सुवर्णमय अष्टदल कमलकी स्थापना करे अथवा घिसे हुए चन्दनमें रोली या केसर मिलाकर उससे अष्टदल कमलका रेखाचित्र बना दे । तदनन्तर उस अष्टदल कमलके मध्यभाग (बीचकी कर्णिका) में परस्पर सम्पुटित दो त्रिकोण रचाये । इस प्रकार छ कोण बन जायँगे । इन कोणोंके मध्यभागमें आदि अक्षररूप कामबीज ( क्लीं ) का, जो सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिका थान है, उल्लेख करे । साथ ही साध्य व्यक्तिका तथा उसके कार्यका भी उल्लेख करे ( यथा—'अमुकस्य अमुकं कार्यं सिद्धयतु' ) । ऐसा उल्लेख तभी आवश्यक है, जब धारण करनेके लिये यन्त्र बनाया गया हो । पूजाके लिये निर्मित यन्त्रमें साध्य और कार्यका नाम आवश्यक नहीं है । इसके बाद जो छहों कोण हैं, उनमें 'क्लीं कृष्णाय नमः' इस मन्त्रके एक-एक अक्षरका उल्लेख करे । तत्पश्चात् कोणोंके मध्यभाग अर्थात् कर्णिकामें लिखे हुए पूर्वाक्त मूर्द्धा बीजके चारों ओर अष्टादशाक्षर मन्त्रको इस प्रकार लिखे, जिससे वह उसके द्वारा आवेष्टित हो जाय । तदनन्तर छहों कोणोंमेंसे जो पूर्व, नैर्ऋत्य और वायव्यवाले कोण हैं, उनमें श्रीबीज ( श्रीं ) का उल्लेख करे तथा पश्चिम, अग्निकोण और ईशानवाले कोणोंमें माया-बीज ( ह्रीं ) को अङ्कित करे । फिर अष्टदलोंके केशरोंमें तीन-तीन अक्षरके क्रमसे चौबीस अक्षरोंकी काम-गायत्रीका उल्लेख करे । कामगायत्री इस प्रकार है—'कामदेवाय विद्महे, पुष्पबाणाय धीमहि, तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ।' इसके बाद प्रत्येक दलमें छ-छ अक्षरके क्रमसे अड़तालीस अक्षरवाले काम-मालामन्यका लेखन करे । वह मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ कामदेवाय मन्मथप्रियाय सर्वजनमोहनाय ज्वल ज्वल प्रज्वल सर्वजनस्य हृदयं मम वशं कुरु कुरु स्वाहा ।' इसके बाद अष्टदलोंके बाहर गोल रेखा खींचकर उसके ऊपर अकारादि क्षयान्त अक्षरोंका पूरा वर्णमालाको इस प्रकार लिखे, जिससे सम्पूर्ण अष्टदल-कमल घिर जाय । फिर इस समन करके बाह्यभाग चौकोर भूमण्डल बनाये । उनके पूर्वादि दिशाओंमें तो श्रीबीज ( श्रीं ) का उल्लेख करे और कोणोंमें मायाबीज ( ह्रीं ) लिखे । तत्पश्चात् इस भूमण्डलकी आठ दिशाओंमें आठ वज्र अङ्कित करे । वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा और शूल—यह वज्रादि-अष्टक ही आठ वज्र कहे गये हैं । इस प्रकार जो यन्त्र बनेगा, वह धारण करनेयोग्य होगा । इसमें पूर्वकथित साध्य और कार्यका उल्लेख आवश्यक है । इसके धारणकी विधि यों है—यन्त्रधारणके समय पहले देव-पूजन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक एक सहस्र घीकी आहुतियाँ अग्निमें डाले । प्रत्येक आहुतिका हुतशेष घृत यन्त्रपर ही डाले । आहुतियाँ समाप्त होनेपर यन्त्रका मार्जन करे । फिर दस सहस्र बार अष्टादशाक्षर मन्त्रका जप करके इस उत्तम यन्त्रको धारण करना चाहिये । इसे विधिपूर्वक धारण करनेवाले पुरुषको त्रिभुवन- का ऐश्वर्य मिल सकता है तथा वह देवताओंके लिये भी आदरणीय हो जाता है । पूजनके लिये यन्त्र जब पूजाके लिये यन्त्र-निर्माण किया जाय, तब भी यन्त्रका स्वरूप तो वैसा ही रहेगा, केवल साध्य और कार्यका नाम नहीं रहेगा । इसके सिवा यन्त्र-पूजाके पहले पीठकी विभिन्न दिशाओंमें कुछ देवताओंका पूजन कर लेना आवश्यक होगा तथा पीठस्थ यन्त्रके चारों ओर आवरण-देवताओंकी भी स्थापना और पूजा आवश्यक होगी। यहाँ पहले पीठके सब ओर पूजित होनेवाले देवताओंका क्रम बताया जाता है— पहले पीठके उत्तर भागम वायव्यकोणसे लेकर ईशानकोणतक चतुर्विध गुरुओंका पूजन करे, यथा—'ॐ गुरुभ्यो नम, परमगुरुभ्यो नम, परात्परगुरुभ्यो नम, परमेष्ठिगुरुभ्यो नम ।' फिर पीठके दक्षिण भागमें गणेशका आवाहन-पूजन करे । तत्पश्चात् यन्त्रगत अष्टदल
५५४ * गोपालपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २ ──────────────────────────────────────────────────────────────────────────── उक्त आवरणोंसे परिवेष्टित श्रीकृष्णचन्द्रका तीनों इस विषयमें ये श्लोक हैं— संध्याओंके समय ध्यान करके षोडश आदि उपचारोंद्वारा एको वशी सर्वग कृष्ण ईड्य सदा उनका पूजन करना चाहिये । इस प्रकार पूजा करनेसे एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति । उपासकको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सब कुछ प्राप्त हो तं पीठस्थं येऽनुयजन्ति धीरा- जाता है, सब कुछ प्राप्त हो जाता है ॥ ७ ॥ स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ ८ ॥ ──────────────────────────────────────────────────────────────────────────── कमलकी कर्णिकाके निम्नभागमें—आधारशक्ति, प्रकृति, कमठ, शेष, पृथ्वी, क्षीरसागर, श्वेतद्वीप, रत्नमण्डप तथा कल्पवृक्ष-इन नौकी पूजा करे। यह-पूजा भावनाद्वारा कर्णिकामें ही कर ली जायगी। फिर पीठ (चौकी) के पायोंमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यकी पूजा करे। क्रम इस प्रकार होगा—अग्निकोणमें धर्म, नैर्ऋत्यकोणमें ज्ञान, वायव्यकोणमें वैराग्य तथा ईशानकोणमें ऐश्वर्यकी पूजा होगी । इसी प्रकार पीठके पूर्वादि अवयवोंमें भी क्रमश धर्म आदिकी पूजा होगी । इसके बाद कर्णिकामें ही क्रमश 'अनन्ताय नम', 'पद्माय नम', 'अ द्वादशकलाव्याप्तसूर्यमण्डलात्मने नम', 'ॐ षोडशकलाव्याप्तचन्द्रमण्डलात्मने नम', 'म दशकलाव्याप्तवह्निमण्डलात्मने नम', 'स सत्त्वाय नम', 'र रजसे नम', 'त तमसे नम', 'आ आत्मने नम', 'अ अन्तरात्मने नम', 'प परमात्मने नम', 'ज्ञाँ ज्ञानात्मने नम'—इन मन्त्रोंद्वारा पूजा करे । फिर अष्टदल कमलके प्रत्येक दलमें क्रमश 'विमलायै नम', 'उत्कर्षिण्यै नम', 'ज्ञानायै नम', 'क्रियायै नम', 'योगायै नम', 'प्रह्वयै नम', 'सत्यायै नम', 'ईशानायै नम'—इन मन्त्रोंसे विमला आदि आठ शक्तियोंकी पूजा करके पुन कर्णिकामें 'अनुग्रहायै नम' इस मन्त्रसे नवीं शक्तिकी पूजा करे । तत्पश्चात् 'ॐ नमो विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगार्थ पद्मपीठात्मने नम' इस पीठमन्त्रका अष्टदल कमलके ऊपर विन्यास करके पीठकी पूजा करे । फिर पीठपर भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन और ध्यान करके षोडशोपचारसे पूजन करना चाहिये । भगवान्का ध्यान इस प्रकार करे— सस्मेरं वृन्दावने रम्ये मोदयन्तं मनोरमम् । गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं गोपकन्या सहस्रशः ॥ आत्मनो वदनाम्भोजप्रेरिताक्षिमधुव्रता । पीडिता कामगानेन निरूपाश्लेषलोत्सुका ॥ मुक्ताहारलसत्पीनतुङ्गस्तनभरान्विता । सन्ताधम्मिल्लयसना मद्रसल्लितभूषणा. ॥ दन्तपङ्क्तिप्रभोद्भासिस्पन्दमानाथराञ्चिता । विलोभयन्त्यो विविधैर्विभ्रमैर्भावगर्भितै ॥ फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । गोपीनां नयनोत्पलाञ्चिततनुं गो-गोपसङ्घावृतं गोविन्दं कलवेणुनादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे ॥ तत्पश्चात् आवरण-पूजा करनी चाहिये । यह आवरण पूजा अष्टदल कमलम् ही करनी चाहिये । इसका प्रथम आवरण इस प्रकार है । छ कोणोंमेंसे आग्नेयकोणमें 'हृदयाय नम', नैर्ऋत्यकोणमें 'शिरसे स्वाहा', वायव्यकोणमें 'शिखायै वषट्', ईशानकोणमें 'कवचाय हुम्', अग्रभागमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा पूर्व आदि चारों दिशाओंमें 'अस्त्राय फट्' इस प्रकार मन्त्रोच्चारणपूर्वक पूजन करे । द्वितीय आवरण—पूर्वदिशामें 'वासुदेवाय नम', दक्षिणमें 'सकर्षणाय नम', पश्चिममें 'प्रद्युम्नाय नम', उत्तरमें 'अनिरुद्धाय नम'—इन मन्त्रोंसे पूजा करके अग्निकोणमें 'शस्त्यै नम', नैर्ऋत्यकोणमें 'श्रियै नम', वायव्यकोणमें 'सरस्वत्यै नम' तथा ईशान- कोणमें 'रत्यै नम'—इन मन्त्रोंद्वारा शक्ति आदिका पूजन करे । तृतीय आवरण—फिर कमलके आठ दलोंमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे रुक्मिणी आदि आठ पटरानियोंकी स्थापना और पूजा करे— यथा रुक्मिण्यै नम, सत्यभामायै नम, जाम्बवत्यै नम, नाग्नजित्यै नम, मित्रविन्दायै नम, कालिन्द्यै नम, लक्ष्मणाथै नम, सुशीलायै नम । चतुर्थ आवरण—यहाँ पूर्वमें पीतवर्ण वसुदेव, अग्निकोणमें श्यामवर्णा देवकी, दक्षिणमें कर्पूरगौरवर्ण नन्द, नैर्ऋत्यमें कुङ्कुम-सदृश गौरवणां यशोदा, पश्चिममें शङ्ख, कुन्द एव चन्द्रके समान उज्ज्वल वर्णवाले बलदेव, वायव्यकोणमें मयूरपिच्छतुल्य श्यामवर्णा सुभद्रा, उत्तरमें गोपगण तथा ईशानकोणमें गोपाङ्गनाओंकी क्रमश पूजा करनी चाहिये । इनके नामको चतुर्थ्यन्त करके 'नम' लगा देनेसे पूजाका मन्त्र हो जाता है । पञ्चम आवरण—कमलके मध्यभागमें क्रमश अर्जुन, निशठ, उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन, सात्यकि, गरुड़, नारद तथा पर्वतकी पूजा नाम-मन्त्रोंसे ही करे ।
उपनिषद् ३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५५५
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तं पीठगं येऽनुयजन्ति धीरा- स्तेषां सिद्धिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ ९ ॥ एतद् विष्णोः परमं पदं ये नित्योद्युक्ताः संयजन्ते न कामात् । तेषामसौ गोपरूपः प्रयत्नात् प्रकाशयेदात्मपदं तदैव ॥ १० ॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो विद्यास्तस्मै गापयति स्म कृष्णः । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणममुं व्रजेत् ॥ ११ ॥ ॐकारान्तरितं ये जपन्ति गोविन्दस्य पञ्चपदं मनुं तम् । तेषामसौ दर्शयेदात्मरूपं तस्मान्मुमुक्षुरभ्यसेन्नित्यशान्त्यै ॥ १२ ॥ 'एकमात्र सबको वशमें रखनेवाले सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा स्तवन करने योग्य हैं। वे एक होते हुए भी अनेक रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं। जो धीर भक्तजन पूर्वोक्त पीठपर विराजमान उन भगवान्का प्रतिदिन पूजन करते हैं, उन्हींको शाश्वत सुख प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं। जो नित्योंके भी नित्य हैं, चेतनोंके भी परम चेतन हैं और एक ही सबकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको पूर्वोक्त पीठमें स्थापित करके जो धीर पुरुष निरन्तर उनका पूजन करते हैं, उन्हींको सनातन सिद्धि प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। जो नित्य उत्साहपूर्वक उद्यत रहकर श्रीविष्णुके परमपदस्वरूप इस मन्त्रकी विधिपूर्वक पूजा करते हैं तथा भगवान्के सिवा दूसरी किसी वस्तुकी कामना नहीं करते, उनके लिये वे गोपालरूपधारी भगवान् श्यामसुन्दर अपना स्वरूप तथा अपना परम धाम तत्काल ही प्रयत्नपूर्वक प्रकाशित कर देते हैं। जो श्रीकृष्ण सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं तथा निश्चय ही जो उनको वेदविद्या- का उपदेश करके उनसे उसका गान करवाते हैं, समस्त जीवोंकी बुद्धिको प्रकाश (ज्ञान) देनेवाले उन भगवान्की शरणमें मुमुक्षु पुरुष अवश्य जाय। जो साधक भगवान् गोविन्दके उस पाँच पदवाले सुप्रसिद्ध अष्टादशाक्षर मन्त्रको ॐकारसे सम्पुटित करके जपते हैं, उन्हींको वे भगवान् शीघ्र अपने स्वरूपका साक्षात्कार कराते हैं, अतः संसार-बन्धनसे छूटनेकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य नित्य शान्तिकी प्राप्तिके लिये अवश्य ही उक्त मन्त्रका जप करे' ॥ ८-१२ ॥ 'इस पाँच पदवाले मन्त्रसे ही और भी दशाक्षर आदि मन्त्र उत्पन्न हुए हैं, जो मनुष्योंके लिये कल्याणकारी हैं। उन दशाक्षर आदि मन्त्रोंको भी ऐश्वर्यकी इच्छावाले इन्द्र आदि देवता न्यास, ध्यान आदि यथावत् विधिके साथ जपते रहते हैं ॥ १३ ॥
तृतीय उपनिषद् अष्टादशाक्षरका अर्थ 'यदि ऐसी बात है तो इन भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप- भूत मन्त्रका अर्थ (अभिप्राय और प्रयोजन) क्या है? यह आप अपनी वाणीद्वारा समझाइये।' इस प्रकार उन सनकादि मुनियोंने पूछा। तब सब लोकोंमें विख्यात ब्रह्माजीने उनके उस प्रश्नके उत्तरमें इस प्रकार कहा-'मुनिवरो! सुनो, मुझ ब्रह्माकी जो दोपरार्धकी आयु होती है, उसे व्यतीत करता हुआ मै पूर्वकालमें भगवान्का निरन्तर ध्यान और स्तवन करता रहा। इस प्रकार जब एक परार्ध बीत गया, तब भगवान्का
षष्ठ आवरण-पूर्वमें 'इन्द्रनिधये नम', अग्निकोणमें 'नीलनिधये नम', दक्षिणमें 'स्कन्दाय नम', नैर्ऋत्यकोणमें 'मकराय नम', पश्चिममें 'आनन्दाय नम', वायव्यकोणमें 'कच्छपाय नम', उत्तरमें 'शङ्खाय नम' तथा ईशानकोणमें 'पद्मनिधये नम'-इस प्रकार पूजन करे। सप्तम आवरण-पूर्वमें पीतवर्ण इन्द्र, अग्निकोणमें रक्तवर्ण अग्नि, दक्षिणमें नीलोत्पलवर्ण यम, नैर्ऋत्यकोणमें कृष्ण- वर्ण राक्षसाधिपति निर्ऋति, पश्चिममें शुक्लवर्ण वरुण, वायव्यमें धूम्रवर्ण वायु, उत्तरमें नीलवर्ण कुवेर तथा ईशानकोणमें श्वेतवर्ण ईशानका नाम-मन्त्रद्वारा ही पूजन करे। अष्टम आवरण-पूर्व और ईशानके मध्यमें गोरोचनवर्ण ब्रह्मा, नैर्ऋत्यकोण और पश्चिमके मध्यमें शुक्लवर्ण शेषनाग, पूर्व दलमें पीतवर्ण वज्र, अग्निकोणवाले दलमें शुक्लवर्णा शक्ति, दक्षिण दलमें नीलवर्ण दण्ड, नैर्ऋत्य दलमें श्वेतवर्ण खड्ग, पश्चिम दलमें विद्युद्वर्ण पाश, वायव्य दलमें रक्तवर्ण ध्वज, उत्तर दलमें नीलवर्णा गदा तथा ईशान दलमें शुक्लवर्ण त्रिशूलकी नाम-मन्त्रद्वारा ही पूजा करे।
५५६ * गोपालपूर्वतपनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ५ ध्यान मेरी ओर आकृष्ट हुआ, फिर वे दया करके गोपवेष-धारी श्यामसुन्दर पुरुषोत्तमके रूपमे मेरे सामने प्रकट हुए। तब मैने भक्तिपूर्वक उनके चरणोमे प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने दयार्द्र-हृदयसे मुझपर अनुग्रह करके सृष्टि-रचनाके लिये अपने स्वरूपभूत अष्टादशाक्षर मन्त्रका मुझे उपदेश दिया और तत्काल अन्तर्धान हो गये । फिर जब मेरे हृदयमे सृष्टिकी इच्छा हुई, तब अष्टादशाक्षर मन्त्रके उन सभी अक्षरोमे भावी जगत्के स्वरूपका दर्शन कराते हुए वे पुनः मेरे सम्मुख प्रकट हो गये। तब मैने इस मन्त्रमे जो 'क' अक्षर है, उससे जलकी, 'ल्' अक्षरसे पृथ्वीकी, 'ई' से अग्नि तत्त्वकी, अनुस्वारसे चन्द्रमाकी तथा इन सबके समुदाय-रूप 'क्लीं' से सूर्यकी रचना की। मन्त्रके द्वितीय पद 'कृष्णाय' से आकाशकी और आकाशमे वायुकी सृष्टि की। उसके बादवाले 'गोविन्दाय' पदमे कामधेनु गो तथा वेदादि विद्याओको प्रकट किया। उसके पश्चात् जो 'गोपीजनवल्लभाय' पद है, उससे स्त्री पुरुष आदिकी रचना की तथा सबसे अन्तमे जो 'स्वाहा' पद है, उसमे इस समस्त जड़-चेतनमय, चराचर जगत्को उत्पन्न किया ॥ १-२ ॥
चतुर्थ उपनिषद्
गोपाल-मन्त्रके जपकी महिमा, उससे गोलोक-धामकी प्राप्ति
इन भगवान् श्रीकृष्णके ही पूजन तथा उनके ॐकारसे सम्पुटित अष्टादशाक्षर मन्त्रके ही जपमे पूर्वकालमे राजर्षि चन्द्रध्वज मोहरहित होकर आत्मज्ञान प्राप्त करके असङ्ग हो गये ॥ १ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके उस परमधाम गोलोकको ज्ञानी एवं प्रेमी भक्तजन सदा देखते है। आकाशमे सूर्यकी भाँति वह परम व्योममें सब ओर व्याप्त तथा प्रकाशमान है। उस परम धामकी प्राप्ति पूर्वोक्त अष्टादशाक्षरमन्त्रके जपसे ही होती है, इसलिये इसका नित्य जप करे ॥ २-३ ॥
पञ्चम उपनिषद्
श्रीकृष्णका स्वरूप एवं उनका स्तवन
उक्त मन्त्रके विषयमें कुछ मुनिगण यों कहत ह—'जिसके प्रथम पद (क्लीं) से पृथ्वी, द्वितीय पद (कृष्णाय) से जल, तृतीय पद (गोविन्दाय) से तेज, चतुर्थ पद (गोपीजनवल्लभाय) से वायु तथा अन्तिम पाँचवें पद (स्वाहा) से आकाशकी उत्पत्ति हुई है, वह वैष्णव पञ्चमहाव्याहृतियो-वाला अष्टादशाक्षरमन्त्र श्रीकृष्णके स्वरूपको प्रकाशित करनेवाला है। उसका मोक्ष प्राप्तिके लिये सदा ही जप करते रहना चाहिये' ॥ १ ॥ इस विषयमे यह गाथा प्रसिद्ध है— जिस मन्त्रके प्रथम पदसे पृथ्वी प्रकट हुई, द्वितीय पदसे जलका प्रादुर्भाव हुआ, तृतीय पदसे तेजस्तत्त्वका प्राकट्य हुआ, चतुर्थ पदसे अग्नितत्त्व आविर्भूत हुआ तथा पञ्चम पदसे आकाशकी उत्पत्ति हुई, एकमात्र उसी अष्टादशाक्षर मन्त्रका निरन्तर अभ्यास (जप) करे। उसीके जपसे राजर्षि चन्द्रध्वज भगवान् श्रीकृष्णके अविनाशी परमधाम गोलोकको प्राप्त हो गये ॥ २-३ ॥ अत वह जो परम विशुद्ध, विमल, शोकरहित, लोभ आदिसे शून्य, सब प्रकारकी आसक्ति एव वासनासे वर्जित गोलोकधाम है, वह उक्त पाँच पदोंवाले मन्त्रसे अभिन्न है; तथा वह मन्त्र साक्षात् वासुदेवस्वरूप ही है, जिस वासुदेवसे भिन्न दूसरा कुछ भी नहीं है। वे एकमात्र भगवान् गोविन्द पञ्चपद मन्त्रस्वरूप है। उनका श्रीविग्रह सच्चिदानन्दमय है। वे वृन्दावनमे कल्पवृक्षके नीचे रत्नमय सिंहासनपर सदा विराजमान रहते हैं। मै मरुद्गणोंके साथ रहकर (इन) उत्तम स्तुतियोंद्वारा उन भगवान्को सतुष्ट करता हूँ ॥ ४-५ ॥ ॐ नमो विश्वरूपाय विश्वस्थित्यन्तहेतवे। विश्वेश्वराय विश्वाय गोविन्दाय नमो नम ॥ ६॥ नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे। कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ ७ ॥ नम कमलनेत्राय नम कमलमालिने । नम कमलनाभाय कमलापतये नम ॥ ८ ॥
उपनिषद् ५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५५७
[वाम स्तम्भ]
बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे । रमामानसहंसाय गोविन्दाय नमो नम ॥ ९ ॥ कंसवंशविनाशाय केशिचाणूरघातिने । वृषभध्वजवन्द्याय पार्थसारथये नम ॥ १० ॥ वेणुवादनशीलाय गोपालायाहिमर्दिने । कालिन्दीकूललीलाय लोलकुण्डलधारिणे ॥ ११ ॥ वल्लवीनयनाम्भोजमालिने नृत्यशालिने । नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमो नमः ॥ १२ ॥ नम पापप्रणाशाय गोवर्द्धनधराय च । पूतनाजीवितान्ताय तृणावर्तासुहारिणे ॥ १३ ॥ निष्कलाय विमोहाय शुद्धयाशुद्धवैरिणे । अद्वितीयाय महते श्रीकृष्णाय नमो नम ॥ १४ ॥ प्रसीद परमानन्द प्रसीद परमेश्वर । आधिव्याधिभुजङ्गेन दष्टं मामुद्धर प्रभो ॥ १५ ॥ श्रीकृष्ण रुक्मिणीकान्त गोपीजनमनोहर । संसारसागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ॥ १६ ॥ केशव क्लेशहरण नारायण जनार्दन । गोविन्द परमानन्द मा समुद्धर माधव ॥ १७ ॥
'सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो विश्वके पालन और सहारेके एकमात्र कारण हैं तथा जो स्वयं ही विश्वरूप और इस विश्वके अधीश्वर हैं, उन भगवान् गोविन्दको बारंबार नमस्कार है। जो विज्ञानस्वरूप और परमानन्दमयविग्रह हैं तथा जो जीवमात्रको अपनी ओर आकृष्ट कर लेनेवाले हैं, गोपसुन्दरियोंके प्राणनाथ उन भगवान् गोविन्दको प्रणाम है, प्रणाम है। जो नेत्रोंमें कमलकी शोभा धारण करते और कण्ठमें कमलपुष्पोंकी माला पहनते हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है तथा जो कमला—लक्ष्मी, लक्ष्मीरूपा गोपाङ्गनाओं-के तथा श्रीराधाके प्राणेश्वर हैं, उन भगवान् श्यामसुन्दरको नमस्कार है, नमस्कार है। मस्तकपर मोरपखका मुकुट धारण करके जो परम सुन्दर दिखायी देते हैं, जिनमें सबका मन रमण करता है, जिनकी बुद्धि एव स्मरणशक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती, तथा जो लक्ष्मी, गोपसुन्दरीगण तथा श्रीराधाके मानसमें विहार करनेवाले राजहंस हैं, उन भगवान् गोविन्दको बारंबार प्रणाम है। जो कंसके वंशका विध्वंस करनेवाले तथा केशी और चाणूरके विनाशक हैं, भगवान् शङ्करके भी जो वन्दनीय हैं, उन पार्थ-सारथि भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है । अधरोंपर बाँसुरी रखकर उसे बजाते
[दक्षिण स्तम्भ]
रहना जिनका स्वाभाविक गुण है, जो गौओंके पालक तथा कालियनागका मान-मर्दन करनेवाले हैं, कालिन्दीके रमणीय तटपर कालियह्रदमें नागके फणोंपर चञ्चलगतिसे जिनकी अविराम लास्य-लीला हो रही है, अतएव जिनके कानोंमें धारण किये हुए कुण्डल हिलते हुए झलमला रहे हैं, सहस्रों गोपसुन्दरियोंके निर्निमेष नेत्र जिनके श्रीअङ्गोंमें प्रतिबिम्बित होकर विकसित कमल पुष्पोंकी मालासदृश शोभा पा रहे हैं तथा जो नृत्यमें संलग्न होकर अतिशय शोभायमान दिखायी देते हैं, उन शरणागत जनोंके प्रतिपालक भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम है, प्रणाम है। जो पाप और पापात्मा असुरोंके विनाशक हैं, ब्रजवासियोंकी रक्षाके लिये हाथपर गोवर्धन धारण करते हैं, पूतनाके प्राणान्तकारक तथा तृणावर्त असुरके प्राण संहारक हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो कला (अवयव) से रहित हैं, जिनमें मोहका सर्वथा अभाव है, जो स्वरूपसे ही परम विशुद्ध हैं, अशुद्ध-(स्वभाव तथा आचरणवाले) असुरोंके शत्रु हैं, तथा जिनसे बढ़कर या जिनके समान भी दूसरा कोई नहीं है, उन सर्वमहान् परमात्मा श्रीकृष्णको बारंबार नमस्कार है। परमानन्दमय परमेश्वर ! मुझपर प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये ! प्रभो ! मुझे आधि (मानसिक व्यथा) और व्याधि (शारीरिक व्यथा) रूपी सर्पोंने डस लिया है, कृपया मेरा उद्धार कीजिये। हे कृष्ण ! हे रुक्मिणीवल्लभ ! हे गोपसुन्दरियोंका चित्त चुरानेवाले श्यामसुन्दर ! मैं संसार-समुद्रमें डूब रहा हूँ। जगद्गुरो ! मेरा उद्धार कीजिये। हे केशव ! क्लेशहारी नारायण ! जनार्दन ! परमानन्दमय गोविन्द ! माधव ! मेरा उद्धार कीजिये' ॥ ६-१७ ॥
'मुनिवरो ! जिस प्रकार मैं इन प्रसिद्ध स्तुतियोंद्वारा भगवान्की आराधना करता हूँ, उसी प्रकार तुमलोग भी पाँच पदोंवाले पूर्वोक्त मन्त्रका जप और श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए उनकी आराधनामें लगे रहो। इसके द्वारा संसार-समुद्रसे तर जाओगे।' इस प्रकार ब्रह्माजीने उन सनकादि मुनियोंको उपदेश दिया ॥ १८ ॥
जो इस पूर्वोक्त पञ्चपद-मन्त्रका सदा जप करता है, वह अनायास ही भगवान्के उस अद्वितीय परमपदको प्राप्त हो जाता है। भगवान्का वह परमपद गतिशील नहीं—नित्य स्थिर है, फिर भी वह मनसे भी अधिक वेगवाला है।
॥ अथर्ववेदीय गोपालपूर्वतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ अथर्ववेदीय गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣲसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! राधा आदि गोपियोंका दुर्वासासे संवाद, दुर्वासाके द्वारा श्रीकृष्णके स्वरूपका वर्णन एक समयकी बात है, सदा श्रीकृष्ण-मिलनकी ही अभिलाषा रखनेवाली व्रजकी गोपसुन्दरियाँ उनके साथ रात्रि व्यतीत करके प्रातःकाल उन सर्वेश्वर गोपालसे बोलीं तथा वे श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण भी उनसे बोले ॥ १ ॥ उनमें इस प्रकार बातचीत हुई—'प्यारे श्यामसुन्दर ! तुम हमे बताओ, हमे अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये किस ब्राह्मण- को इस समय भोजन देना चाहिये ?' गोपियोंका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्णने उत्तर दिया—'महर्षि दुर्वासाको भोजन देना उचित है' ॥ २ ॥ गोपियोंने पूछा—'प्यारे ! जहाँ जानेसे हमारा कल्याण होगा, वह मुनिवर दुर्वासाका आश्रम तो उस पार है । यमुनाका अगाध जल पार किये बिना हम वहाँ कैसे जायेंगी ?' ॥ ३ ॥ भगवान् बोले—तुमलोग यमुनाजीके तटपर जाकर कहना—'श्रीकृष्ण नामसे प्रसिद्ध हमारे श्यामसुन्दर पूर्ण ब्रह्मचारी हैं।' यों कहनेपर यमुनाजी तुम्हें पार जानेके लिये मार्ग दे देंगी । वह हूँ, जिससे सबकी उन्नति होती है । मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करनेसे अथाहकी भी थाह मिल जाती है। मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके अपवित्र भी पवित्र हो जाता है । मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके व्रतहीन भी व्रतधारी हो जाता है । मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके निष्काम आत्माराम भी सकाम (परम प्रेमी) हो जाता है। तथा मैं वह हूँ, जिसका स्मरण करके वेद-ज्ञानसे रहित पुरुष भी वेदज्ञ हो जाता है ॥ ४ ॥ कहते हैं, भगवान्का यह कथन सुनकर गोपसुन्दरियाँ महादेवजीके अगंभूत दुर्वासाका स्मरण करके—उन्हींको लक्ष्य करके वहाँसे चलीं, और श्रीकृष्णके वचनको दुहराकर सूर्यकन्या यमुनाके पार हो मुनिके परम पवित्र आश्रम- पर जा पहुँचीं । फिर उन सर्वश्रेष्ठ मुनिको, जो रुद्रके ही अंश थे, प्रणाम करके उन ब्राह्मणदेवताको दूध और घीके बने हुए मीठे और प्रिय पदार्थ देकर गोपाङ्गनाओं- ने सन्तुष्ट किया । प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासाने भोजन करके उच्छिष्ट अन्नका यथास्थान त्याग करके गोपियोंको यथेष्ट आशीर्वाद दे घर लौट जानेके लिये आज्ञा दी । तब गोप- सुन्दरियोंने पूछा—'हम सूर्यकन्या यमुनाको कैसे पार करके जायेंगी ?' ॥ ५-७ ॥ तब वे सुप्रसिद्ध मुनि बोले—मैं केवल दूबका ही भोजन करनेवाला हूँ, इस रूपमें मेरा स्मरण करनेसे यमुनाजी तुम्हें मार्ग दे देंगी ॥ ८ ॥ उन गोपसुन्दरियोंमें सुन्दर गुण और स्वभावकी दृष्टिसे सबसे श्रेष्ठ थीं गान्धर्वी—श्रीराधा । उन्होंने वहाँ आयी हुई उन सभी गोपियोंके साथ विचार करके मुनिवर दुर्वासासे इस प्रकार पूछा—'हमारे साथ नित्य विहार करनेवाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण कैसे ब्रह्मचारी हैं ? और अभी-अभी इतना पकवान
भोजन करनेवाले महर्षि दुर्वासा किस प्रकार केवल दूर्वा ही खाते हैं ?' ॥ ९-१० ॥ श्रीराधाको ही प्रधान बनाकर और उन्हें ही आगे करके अन्य गोपाङ्गनाएँ उन्हींके पीछे चुपचाप खड़ी हो गयी थीं ॥ ११ ॥ दुर्वासाने कहा—सुनो, आकाश शब्द-गुणसे युक्त है, परंतु परमात्मा शब्द और आकाश दोनोंसे भिन्न हैं। फिर भी वे उक्त गुणवाले आकाशमे उसके अन्तर्यामी आत्मा होकर निवास करते हैं । वह शब्दवान् आकाश उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता, वही परमात्मस्वरूप आत्मा मै हूँ, फिर मैं भोजन करनेवाला कैसे हो सकता हूँ। वायु स्पर्श-गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा स्पर्श और वायु दोनोंसे भिन्न हैं, फिर भी वे वायुमें उसके अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं । वह स्पर्शवान् वायुतत्त्व उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता । वही विशुद्ध आत्मा मैं भी हूँ, अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ । यह तेज रूप-गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा रूप और तेज दोनोंसे भिन्न हैं। फिर भी वे अग्निमे उनके अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं । वह अग्नि उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता । वही विशुद्ध आत्मा मैं हूँ। अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ। जल रस-गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा रस और जल दोनोंसे भिन्न हैं। तथापि वे उस जलमे अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं। जल उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानता । वही विशुद्ध आत्मा मैं भी हूँ, अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ । यह पृथिवी गन्ध गुणसे युक्त है, किंतु परमात्मा गन्ध एव पृथिवी दोनोंसे भिन्न है । तथापि वे भूमिमे उसके अन्तर्यामी आत्मारूपसे निवास करते हैं । भूमि उन अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जानती । वही विशुद्ध आत्मा मैं हूँ, अतः मैं भोक्ता कैसे हो सकता हूँ । यह मन ही उन आकाश आदिके विषयमें सङ्कल्प-विकल्प करता है, यही उन विषयोंको ग्रहण करता है । जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया है, वहाँ किस विषयका आश्रय लेकर यह मन सङ्कल्प विकल्प करे अथवा किस विषयकी ओर जाय ? इसलिये मैं वही विशुद्ध आत्मा हूँ, फिर कैसे भोक्ता हो सकता हूँ ॥१२-१८॥ ये श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, जो तुम्हारे प्रियतम हैं, व्यष्टि और समष्टिके स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरोंके कारण हैं । सदा साथ रहनेवाले दो पक्षियोंकी भाँति जीवात्मा और परमात्मा एक दूसरेके नित्य सहचर हैं । इनमें जो परमात्माका अंश- भूत इतर जीव है, वह तो भोक्ता होता है, और उससे भिन्न साक्षात् परमात्मा ( श्रीकृष्ण ) साक्षीमात्र होते हैं । वृक्षके समान धर्मवाले नाशवान् शरीरमें वे दोनों रहते हैं । इनमें एक भोक्ता है और दूसरा अभोक्ता । पहला ( जीवात्मा ) तो भोक्ता है और दूसरा स्वतन्त्र ईश्वर ही अभोक्ता है । यह अभोक्ता परमेश्वर ही श्रीकृष्ण हैं । जिनमें मोक्ष और बन्धन देनेवाली विद्या और अविद्याका अस्तित्व हम नहीं जानते, जो विद्या और अविद्या दोनोंसे विलक्षण हैं तथा जो विद्यामय हैं, वे श्रीकृष्ण विषयी कैसे हो सकते हैं ? ॥ १९-२१ ॥ जो कामना ( विषयासक्ति ) से नाना प्रकारके भोगोंकी अभिलाषा करता है, वही कामी होता है, परंतु जो निश्चय- पूर्वक कामनाके बिना ही केवल प्रेमी भक्तोंके प्रेमवश उनके द्वारा अर्पित भोगोंको ग्रहण करनेकी इच्छा करता है, वह अकामी होता है—उसे कामना और आसक्तिसे दूर माना जाता है । ये श्रीकृष्ण जन्म और जरा ( बुढ़ापा ) आदि शारीरिक धर्मोंसे रहित हैं। ये स्थिर हैं—नित्य हैं, इनका छेदन नहीं हो सकता । वे जो सूर्यमण्डलमें विराजमान हैं, जो गोपोंमें रहते हैं, जो गौओंकी रक्षा करते हैं, जो ग्वालोंके भीतर हैं, जो सम्पूर्ण देवताओंमें भी अन्तर्यामीरूपमे स्थित हैं, सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा जिनकी महिमाका गान किया जाता है, जो समस्त चराचर भूतोंमे व्याप्त होकर स्थित हैं तथा जो भूतोंकी सृष्टि भी करते हैं, वे भगवान् ही तुम्हारे स्वामी हैं ॥२२-२३॥ यह सुनकर वे गान्धर्वी नामसे प्रसिद्ध श्रीराधाजी बोलीं—'महर्षे ! ऐसे अद्भुत, अचिन्त्य महिमावाले गोपाल श्रीकृष्ण हमलोगोंके यहाँ कैसे प्रकट हो गये ? तथा आपने उन श्रीकृष्णका तत्त्व कैसे जाना? उनकी प्राप्तिका साधनभूत मन्त्र कौन सा है ? उन भगवान्का निवास स्थान कहाँ है ? वे देवकीजीके गर्भसे किस प्रकार उत्पन्न हुए ? इनके बड़े भैया बलरामजी कौन हैं ? तथा कैसे इन गोपालकी पूजा होती है ? प्रकृतिसे परे जो ये साक्षात् परमात्मा गोपाल हैं, किस प्रकार इस भूमिपर अवतीर्ण हुए ? यह सब स्पष्टरूपमे बताइये' ॥ २४ ॥ तब उन प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासाने श्रीराधासे कहा— यह बात सबको विदित है कि सृष्टिके आदिमे एकमात्र भगवान् नारायण ही विराजमान थे, जिनमें ये सम्पूर्ण लोक ओतप्रोत हैं । उनके मानसिक सङ्कल्पसे नाभिमे जो कमल प्रकट हुआ था, उससे कमलयोनि ब्रह्माजीकी उत्पत्ति हुई । भगवान् नारायणने ब्रह्माजीसे तपस्या करवाकर उन्हें वरदान दिया ॥ २५-२६ ॥
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५६१ [ स्तम्भ १ ] ब्रह्माजीने इच्छानुसार प्रश्न पूछनेका ही वरदान माँगा और भगवान् नारायणने वैसा वर उन्हें दे दिया ॥ २७ ॥ तदनन्तर उन विश्वविख्यात ब्रह्माजीने पूछा—'भगवन् ! समस्त अवतारोंमें कौन सा अवतार सबसे श्रेष्ठ है, जिससे सब लोक सन्तुष्ट हों, सम्पूर्ण देवता भी सन्तुष्ट हों, जिसका स्मरण करके मनुष्य इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं ? तथा इस श्रेष्ठ अवतारकी परब्रह्मरूपता कैसे सिद्ध हो सकती है ?' ॥२८॥ यह प्रश्न सुनकर उन प्रसिद्ध भगवान् नारायणने उन ब्रह्माजीसे कहा—'वत्स ! जैसे मेरु शिखरपर ( यमातिरिक्त सात लोकपालोंकी ) सात पुरियाँ हैं, जिन्हें सकामभावसे पुण्य करनेवाले पुरुष प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार इस भूगोल चक्रमें भी सात पुरियाँ हैं, जो निष्काम तथा सकाम—सभी प्रकारके लोगोंद्वारा सेवन करनेयोग्य हैं । ( सकाम भाववाले पुरुषोंकी कामना पूर्ण करनेके कारण वे 'सकाम्या' हैं, और निष्काम पुरुषोंको मोक्ष देनेवाली होनेके कारण 'निष्काम्या' हैं ।) उन सबके मध्यमे साक्षात् परब्रह्मरूप गोपालकी पुरी मथुरा है, अतः वह सम्पूर्ण देवताओं तथा समस्त भूतोंके लिये भी सकाम्या ( कामना पूर्ण करनेवाली ) और निष्काम्या ( मोक्षदायिनी ) है ॥ २९ ॥ निश्चय ही जिस प्रकार सरोवरमें कमल होता है, उसी प्रकार भूतलपर यह पुरी स्थित है । ( कमलकी कर्णिकाके स्थानपर तो यह पुरी है और दलोंके स्थानपर मधुवन आदि वन हैं ।) अवश्य ही मथुरापुरी भगवान् गोपालके चक्रद्वारा सुरक्षित है, इसलिये वह गोपाल पुरीके नामसे प्रसिद्ध है । विशाल बृहद्वन ( महावन ), मधुदैत्यके नामपर प्रसिद्ध मधुवन, ताड़के वृक्षोंसे सुशोभित तालवन, कमनीय श्रीकृष्णकी विहारस्थली काम्यवन ( कामवन ), कृष्ण प्रिया बहुलाके नामसे प्रसिद्ध बहुलावन, कुमुद-वृक्षोंसे उपलक्षित कुमुदवन, खदिर- वृक्षोंकी अधिकताके कारण प्रसिद्ध खदिरवन, जहाँ बलभद्रजी विचरते है—वह भद्रवन, 'भाण्डीर' नामक वटसे उपलक्षित भाण्डीरवन, लक्ष्मीका निवासभूत श्रीवन, लोहगन्धकी तपस्याका स्थान लोहवन, वृन्दादेवीसे सनाथ हुआ वृन्दावन—इन ( कमलदलोंके समान सुशोभित ) बारह वनोंसे वह मथुरापुरी घिरी हुई है । उस मथुरामण्डलके अन्तर्गत उपर्युक्त वनोंमें ही देवता, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और किन्नर ( श्रीकृष्ण- प्रेमसे उन्मत्त हो ) गाते और नृत्य करते हैं । उन बारह [ पाद-टिप्पणी ] १. वे सात पुरियाँ हैं--अयोध्या, मथुरा, माया ( हरिद्वार ), काशी, काञ्ची, अवन्ती ( उज्जयिनी ) तथा द्वारकापुरी । उ० अ० ७१— [ स्तम्भ २ ] वनोंमें बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, सप्त ऋषि, ब्रह्मा, नारद, पाँच गणेश एव वीरेश्वर, रुद्रेश्वर, अम्बिकेश्वर, गणेश्वर, नीलकण्ठ, विश्वेश्वर, गोपलेश्वर तथा भद्रेश्वर आदि चौबीस शिवलिङ्गोंका निवास है । दो प्रमुख वन हैं— कृष्णवन और भद्रवन । इनके बीचमें ही पूर्वोक्त बारह वन हैं, जो परम पवित्र एव पुण्यमय है । उन्हींमें देवता रहते हैं । वहीं सिद्धगण तपस्या करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं । वहीं वलरामजीकी रमणीय राममूर्ति, प्रद्युम्न की प्रद्युम्नमूर्ति, अनिरुद्ध- की अनिरुद्धमूर्ति तथा श्रीकृष्णकी श्रीकृष्णमूर्ति विराजती है । इस प्रकार मथुरामण्डलके बारह वनोंमें भगवान्के बारह अर्चा विग्रह विराजमान हैं । इनमेंसे प्रथम मूर्तिका पूजन रुद्रगण करते हैं । दूसरी मूर्तिका पूजन स्वय ब्रह्माजी करते हैं । तीसरीकी पूजा ब्रह्माजीके पुत्र सनकादि मुनि करते हैं । चौथे विग्रहकी आराधना मरुद्गण करते हैं । पाँचवें स्वरूपकी अर्चना विनायकगण करते हैं । छठे विग्रहकी पूजा वसुगण करते हैं । सातवेंकी आराधना ऋषि करते हैं । आठवी मूर्तिकी पूजा गन्धर्व करते हैं । नवें विग्रहका पूजन अप्सराएँ करती हैं । दसमी मूर्ति आकाशमें गुप्तरूपसे स्थित है । ग्यारहवीं अन्तरिक्षमें स्थित है और बारहवीं भूगर्भमें विराजती है । अर्चा-विग्रहोंका जो लोग पूजन करते हैं, वे मृत्युसे तर जाते हैं, मोक्ष पा लेते हैं, गर्भवास, जन्म, जरावस्था, मृत्यु तथा आध्यात्मिक आदि त्रिविध तापके दुःखको लाँघ जाते है ॥ ३०-३८ ॥ इस विषयमे श्लोक भी है, जिनका भाव इस प्रकार है— जो ब्रह्मा आदि देवताओंसे सदा सेवित है, भगवान्के शङ्ख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग-धनुष निरन्तर जिसकी रक्षामें रहते हैं, जो बलभद्रजीके मुसल आदि शस्त्रोंसे भी सदा सुरक्षित है, उस परम रमणीय मथुरापुरीमें पहुँचकर ( भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे) । यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अपने अन्य तीन विग्रह— बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धके साथ एव अपनी अन्तरङ्गा शक्ति श्रीरुक्मिणीजीके साथ सदा समाहित ( भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सतत सावधान ) रहते हैं । भगवान् श्रीकृष्ण एकमात्र पूर्ण परमात्मा हैं, तो भी वे प्रणवकी मात्राओंके भेदसे चार नामोंसे प्रसिद्ध होते हैं । ( ॐकारकी चार मात्राएँ हैं—अ, उ, म् तथा अर्धमात्रा ।) इनमें अकारात्मक विश्वरूप तो बलरामजी है, उकारात्मक तैजसरूप प्रद्युम्न हैं, मकारात्मक प्राज्ञरूप अनिरुद्धजी हैं तथा अर्ध- मात्रात्मक तुरीयरूप भगवान् वासुदेव हैं ॥ ३९-४० ॥