भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 705

खण्ड १] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६५१ षोडशदल पद्मोंके ऊपर और वृत्तवृत्तोंके बीचमें श्रीसूक्तकी आधी-आधी ऋचा लिखे । ( अर्थात् अष्टदलके ऊपर और पहले भूपृत्तके अंदर 'अश्वपूर्वां रथमध्यां' इत्यादि ऋचाको, द्वादशदलके ऊपर तथा द्वितीय भूपृत्तके भीतर 'कां सोस्मिता हिरण्यप्राकाराम्' इत्यादि तथा षोडशारके ऊपर तथा तृतीय भूपृत्तके भीतर 'गन्धद्वारा दुराधर्षा' इत्यादि ऋचा लिखे ।) उसके बाहर निर्भूवृत्तमे 'य शुचि प्रयतो भूत्वा' इत्यादि फलश्रुतिरूप ऋचाको लिखकर षोडशारके मध्य और ऊपर अकारसे सकारतक मातृका वर्षोंको लिखे । ( क्रम यह है कि प्रत्येक मकार-पर्यन्त दलमे दो दो व्यञ्जन वर्ण तथा प्रत्येक दलके ऊपर भूपृत्तके नीचे क्रमशः अकारादि सोलह स्वर-वर्णोंको लिखे । इसी प्रकार द्वादशदलके दो दो दलोके पार्श्वमे क्रमशः 'ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नम' ये अक्षर लिखे तथा द्वादशदलके दलोमे 'ह्रीं श्रीं क्लीं' इन बीजोको दो दो करके लिखे । फिर भूपृत्तके नीचे अष्टदल कमलके दो दो दलों- के पार्श्वमे क्रमश 'ह' ओर 'क्ष' लिखे । अष्टदलके दलोंमे आ, ई, ऊ और ऋ अनुस्वारसहित लिखकर षट्कोणके कोणों- मे 'श्रीं ह्रीं क्लीं' बीजोंको क्रमशः दो दो वार लिखे और प्रणवद्वारा षट्कोणको घेर दे ।) सबके ऊपर निर्भूवृत्तमे थपड्युक्त त्वरिता- बीजके साथ श्रीबीजको लिखे । इस प्रकार इस अङ्गोवाला श्रीचक्र अर्थात् प्रणव, षट्कोण, भूपृत्त एव अष्टदल, भूपृत्त, द्वादशदल, भूपृत्त, षोडशदल, भूपृत्त एव निर्भूवृत्त बनाये । 'श्रा हृदयाय नम' इत्यादि अङ्गमन्त्रोंसे प्रथम आवरण- पूजा होती है । पद्म आदि निधियोंसे द्वितीय आवरण पूजा होती है । लोकपालो अर्थात् इन्द्र आदि देवताओसे तृतीय आवरण-पूजा होती है। उनके वज्रादि आयुधोंमे चतुर्थ आवरण- पूजा होती हे । श्रीसूक्तके अन्तर्गत ऋचाओंद्वारा आवाहनादि अर्थात् आवाहन, सनिधापन, सग्रोवन, सम्मुखीकरण आदि कार्य होते हैं । (फेली हुई अञ्जलिमें दोनों अनामिकाओके मूलमे अङ्गुष्ठके सिरोंको रखनेसे आवाहनी मुद्रा होती है । दोनों अङ्गुष्ठोंको ऊपर उठा दोनों मुष्टियोंको सयुक्त करनेसे मनिधापनी मुद्रा होती है । इन दोनों अङ्गुष्ठोंको मुष्टियोंमे प्रवेश करानेमे सम्बोधनी मुद्रा होती हे । दोनों मुष्टियोंको उत्तान करके मिलाये रखनेसे सम्मुखीकरणी मुद्रा होती है और आवाहनी मुद्राको अधोमुख करनेसे स्थापनी मुद्रा होती है ।) इसके पश्चात् (देवीकी षोडशोपचार पूजा करके) पुरश्चरणके लिये षोडश सहस्र मन्त्र-जप करे । (यहाँतक श्रीमहालक्ष्मी पूजाका क्रम बताया गया ।)

(इसके बाद सौभाग्यलक्ष्मी-पूजाका क्रम लिखा जाता है—) एकाक्षर सौभाग्यलक्ष्मी मन्त्र 'श्रीं' के भृगु ऋषि हैं, 'नीवृद्गायत्री' छन्द है और श्री देवता है। 'श्रीं' बीज है। 'श्रां' इत्यादिके द्वारा अङ्गन्यास करे। जैसे— श्रां हृदयाय नम । श्रीं शिरसे स्वाहा। श्रूं शिखायै वषट् । श्रैं कवचाय हुम् । श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । श्रः अस्त्राय फट् । इसके पश्चात् नीचे लिखे अनुसार ध्यान करे— भूयाद्भूयो द्विपद्माभयवरदकरा तप्तकार्तस्वराभा शुभ्राभ्रामेभयुग्मद्वयकरधृतकुम्भाद्भििरासिच्यमाना। रक्तौघायद्बमौलिर्विमुलतरदुकूलातंवालेपनाढ्या पद्माक्षी पद्मनाभोरसिकृतवसति पद्माग्रा श्री श्रियै न ॥ 'जिन्होंने अपने दोनों हाथोंमें दो पद्म तथा शेष दोमे वर और अभय मुद्राएँ धारण कर रक्खी हैं, तप्त काञ्चनके समान जिनके शरीरकी कान्ति है, शुभ्र मेघकी सी आभासे युक्त दो हाथियोंकी सूँड़ोंमे धारण किये हुए कलशोंके जलसे जिनका अभिषेक हो रहा है, रक्तवर्णके माणिक्यादि रत्नोंका मुकुट जिनके सिरपर सुशोभित है, जिनके वस्त्र अत्यन्त स्वच्छ हैं, ऋतुके अनुकूल चन्दनादि आलेपनके द्वारा जिनके अङ्ग लिप्त हैं, पद्मके समान जिनके नेत्र हैं, पद्मनाभ अर्थात् क्षीरशायी विष्णुभगवान्के उरःस्थलमें जिनका निवास है, वे कमलके आसनपर विराजमान श्रीदेवी हमारे लिये परम ऐश्वर्यका विधान करें।' (इस प्रकार ध्यान करके एक पीठयन्त्र अङ्कित करे ।) वह पीठयन्त्र तीन वृत्तोंमे युक्त अष्टदल पद्म, द्वादश रागिखण्ड तथा चतुष्कोण—इस आकारका रमापीठ होता है । अष्टदल- की कर्णिका अर्थात् बीजकोषमे साध्यसहित श्रीबीज (श्रीं ) लिखना चाहिये—जैसे 'श्रीं श्रीर्मां देवीं जुषताम्।' (इसके पश्चात् प्रात कृत्य, पीठन्यास एव ऋष्यादिन्यास करके) आदिमे प्रणव और अन्तमे 'नमः' जोड़कर प्रत्येक नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए (जैसे—'ॐ विभूत्यै नमः' इत्यादि) विभूति, उन्नति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति, सनति, व्युष्टि, सत्कृति एव ऋद्धि--इन नौ शक्तियोंकी पूजा करे । (इसके बाद 'श्रीमत्पद्मासनाय नम.' कहकर आसनका न्यास करे, और) अङ्गन्यासके द्वारा प्रथम आवरणकी पूजा करे । ('श्रा हृदयाय नम' इत्यादिके द्वारा अग्नि आदि कोणमे स्थित केशरोंमे तथा दिशाओंमे पूजा करके पूर्वादि दिशाओंमे) क्रमशः वासुदेव, सकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको पूजे (तथा

कल्याण: उपनिषद् अङ्क · पृष्ठ 705, कुल 832 में से · BharatKosha