कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 706, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६५२ ॐ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् ॐ [ खण्ड २
अग्नि आदि कोणोंमे क्रमशः मद्रक—नव शाक विशेष, सलिल, गुग्गुल एव कुरुण्टक—पुष्पविशेषकी पूजा करे। देवीके दक्षिणमे शङ्खनामक निधि और वसुधाकी तथा वाममें पद्म-नामक निधि और वसुमतीकी पूजा करे ।) इस प्रकार द्वितीय आवरणकी पूजा होती है। फिर बालक्षी आदि अर्थात् बालकी, विमला, कमला, वनमालिका, विभीषिका, मालिका, शाङ्करी और वसुमालिकाकी पूजा करे। इस प्रकार तृतीय आवरणकी पूजा होती है। इसके पश्चात् इन्द्र आदि देवताओं तथा उनके वज्र आदि आयुधोंकी पूजासे चतुर्थ आवरणकी पूजा होती है। पुरश्चरणके लिये बारह लाख मन्त्र-जप करना चाहिये। (इस प्रकार एकाक्षरी सौभाग्यलक्ष्मीकी पूजा-विधि समाप्त हुई।)
(अब 'श्रीं ह्रीं श्रीं' रूप त्र्यक्षरी विद्याकी पूजा-विधि बतायी जाती है। इसका पूजा क्रम एकाक्षरीके पूजा क्रमके समान ही है। केवल तृतीय आवरणकी पूजामें कुछ विशेषता है।) यहाँ आदिमे प्रणव और अन्तमे नमः लगाकर प्रत्येक नामका चतुर्थी विभक्तिसहित प्रयोग करते हुए (जैसे, 'ॐ श्रियै नम इत्यादि) श्री, लक्ष्मी, वरदा, विष्णुपत्नी, वसुप्रदा, हिरण्यरूप्रा, स्वर्णमालिनी, रजतस्रजा, स्वर्णप्रभा, स्वर्णप्राकारा, पद्मवासिनी, पद्महस्ता, पद्मप्रिया, मुक्तालङ्कारा, चन्द्रसूर्या, विल्वप्रिया, ईश्वरी, भुक्ति, मुक्ति, विभूति, ऋद्धि, समृद्धि, कुष्टि, पुष्टि, धनदा, धनेश्वरी, श्रद्धा, भोगिनी, भोगदा, सावित्री, धात्री, विधात्री प्रभृति नाम मन्त्रोंके द्वारा शक्ति की पूजा करे। एकाक्षर मन्त्रके समान ही अङ्गादिके द्वारा पीठ पूजा करे। पुरश्चरणके लिये एक लाख मन्त्र-जप करे। जपका दशांश तर्पण, तर्पणका दशांश हवन और हवनका दशांश ब्राह्मणभोजन करावे (तथा ब्राह्मण भोजनका दशांश अभिषेक अर्थात् मार्जन करे)। निष्काम उपासना करनेवालेको ही श्रीविद्याकी सिद्धि होती है। सकाम उपासना करनेवालोको कदापि सिद्धि नही होती । इस प्रकार सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद्का श्रीक्रम नामक प्रथम खण्ड समाप्त हुआ ॥ १ ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
योगसम्बन्धी उपदेश
इसके बाद आदिनारायणमे देवताओंने कहा—भगवन् ! तुरीया मायाके द्वारा निर्दिष्ट तत्त्वके विषयमे हमसे कहिये। 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् आदिनारायणने उपदेश आरम्भ किया—
'योगसे योगको जानना चाहिये, योगसे योग बढता है। जो योगी योगमे सदा सावधान रहता है, वह योगी चिरकालतक—अनन्तकालतक आनन्दोपभोग करता है। मितभोगी अर्थात् शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न वस्त्रादिका उपभोग करनेवाला साधक राग द्वेष मोहरूपी कषाय—मलके परिपक्व हो जानेपर, निद्रा—आलस्य त्यागकर, प्रपञ्चके ब्रह्मत्वकी प्राप्तिमे बाधक होनेके कारण एकान्त स्थानमें (संसारके कोलाहलसे रहित प्रदेशमे ) जाकर साधन करता है—आत्माको परमात्मामे लगानेका अभ्यास करता है। वह या तो शीतोष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित होनेके लिये राजयोगमें प्रवृत्त होता है अथवा गुरूपदिष्ट मार्गपर चलता हुआ प्राणायामके द्वारा हठयोगका अवलम्बन करता है। तात्पर्य यह कि राजयोग और हठयोगके भेदसे योग द्विविध है । प्राणायामका अभ्यास करनेवाले पहले मुखसे वायुको खींचकर भीतर भरते हैं और नाभि प्रदेशसे अपानवायुको जठराग्निके कोष्ठमें खींचकर मुखके द्वारा खींची हुई वायुके साथ उसका सयोग कराते अँगूठे, अँगुलियों तथा दोनों हथेलियोंके द्वारा दो नेत्र तथा नासा पुटोंको बन्द करके प्राणायामके द्वारा तथा प्रणवका नाना प्रकारसे ध्यान करके उसीमे त योगीजन चैतन्यस्वरूप आत्माका साक्षात्कार करते हें
'अभ्यासकी एक और विधि है—जो कान, मुख, नासाछिद्रोंको बन्द करके ही की जाती है । वह सुषुम्णा नाडीमे प्रणवके विशुद्ध अनाहत नामक ना सुनना । अनाहतचक्रमे ध्वनिको सुननेपर नाना विचित्र घोष सुने जाते हैं, और इस साधनाके द्वार तेजस्वी हो जाता है, उसके शरीरसे दिव्य गन्ध आ है और स्वस्थ होकर वह दिव्यदेह प्राप्त करता है मे अर्थात् सुषुम्णा नाडीमें पूरे मनोयोगके सा सुनते रहनेसे आरम्भमें ही—जहाँसे वह सुषुम् आरम्भ होती है, उस मूलाधारचक्रमें ही साधक योग जाता है अर्थात् दीपशिखाके आकारके जीवात्माव पुण्डरीकसे मूलाधारचक्रमें लाकर सुषुम्णा नाडीसे स देता है। इस प्रकार इच्छाशक्तिकी प्रेरणासे जब सुषुम्णा मार्गपर चलने लगता है, तब द्वितीय अर्थात् स्व