भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 707

खण्ड ३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६५३


चक्रको विघटित करके—भेदकर उसीके मध्यस्थित छिद्रमेसे होकर प्राणवायु मध्यगा होती है अर्थात् सुषुम्णामें प्रवेश कर जाती है ॥ ४-६ ॥

पद्मासनादिपर स्थित हुए योगीका आसन दृढ होता है । उसके बाद विष्णुग्रन्थि अर्थात् मायाको, जो तृतीय मणिपूरक नामक चक्रमें रहकर अनेक कामनाओंका विस्तार करती रहती है, विच्छिन्न कर देनेपर परमानन्दकी प्राप्ति सम्भव हो जाती है । शून्य अर्थात् मायाको लाँघकर उठता हुआ प्राणवायु जब नाड़ीके साथ सङ्घर्षणको प्राप्त होता है, तब उससे भेरीके समान ध्वनि सुन पड़ती है और तृतीय मणिपूरक चक्रको भेदकर चलनेपर प्राणवायुसे मर्दल-ध्वनि अर्थात् मृदङ्ग-जैसी ध्वनि होती है । इसके आगे अन्य चक्रोंको भेदता हुआ वह महाशून्य अर्थात् आज्ञाग-चक्रमें जाता है, जहाँ सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । उसके बाद प्राणवायु तालुचक्रसे चित्तको जयकर तालुचक्रको भेदता है, जहाँ चित्तगत सम्पूर्ण आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥ ७-९ ॥

इस साधनाकी समाप्तिमें वैष्णवशब्द—प्रणव शब्दायमान होता है, शब्दके रूपमे स्वय प्रकट होता है । उस प्रणव-ध्वनिमें चित्त विलीन हो जाता है, इस प्रकार सनकादि मुनियोंने कहा है । उस महाशून्य चक्रमें स्थित होकर साधक अन्त अर्थात् जीवमे अनन्त—परमात्माका समारोप करता है, मायाग्रस्त स्वरूप—अग्ररूप आत्मामें निरंश परमात्माको समर्पितकर तथा आत्माकी सर्वव्यापक प्रकृतिका ध्यान करके कृतकृत्य हो जाता है, अमृतस्वरूप हो जाता है । सम्प्रज्ञात योगको असम्प्रज्ञात योगसे जीते और भाव अर्थात् सविचार समाधिका निरोध अभाव—निर्विचार समाधिसे करे, उसके बाद निर्विकल्प समाधिको प्राप्त करके साधक परमतत्त्व—कैवल्यमें स्थित होता है । निर्विकल्प समाधिमे स्थित साधकका अहम्भाव छूट जाता है और आत्मतत्त्वमे अध्यस्त मायात्मक जगत्का भी लोप हो जाता है । ऐसा विद्वान् पुनः 'यह मै हूँ और यह मेरा है' इत्यादि चिन्तामे नहीं पड़ता ॥ १०-१३ ॥

'जिस प्रकार पानीमें नमक मिलानेसे वह उसमे घुल मिल जाता है, उसी प्रकार मनका आत्मामें विलीन हो जाना समाधि कहलाता है। जब प्राणायामके अभ्याससे प्राणवायु सम्यक्रूपसे क्षीण होकर कुम्भकमे स्थिर हो जाता है, और मानसिक वृत्तियाँ अत्यन्त विलीन हो जाती हैं, उस समय तैलधारावत् चित्तका आत्माके साथ एकीभाव समाधि कहलाता है । जीवात्मा और परमात्माका समत्व होनेपर जब सारे सङ्कल्प नष्ट हो जाते हैं, उस स्थितिको समाधि कहते हैं । प्रभा अर्थात् जागतिक बोधसे शून्य जिस स्थितिमें मन और बुद्धि पूर्णत. विलीन हो जाते हे, जिसमें कुछ आभासित नहीं होता—सब शून्याकार प्रतीत होता है, वह निरामय—भवरोगकी निवृत्तिकी अवस्था समाधि कहलाती है । शरीरके इधर-उधर चलनेपर भी देही अर्थात् जीवात्मा जब निश्चल, नित्य स्वयम्प्रकाश स्वरूपमें स्थित रहता है, उसे समाधि कहना चाहिये। उस समय साधकका मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ वहाँ परमपदकी प्राप्ति होती है । उसके लिये सर्वत्र परब्रह्म समवस्थित होता है । सर्वत्र परब्रह्म समवस्थित होता है' ॥ १४-१९ ॥

॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥


तृतीय खण्ड

नवचक्र-विवेक

पश्चात् भगवान् आदिनारायणसे देवताओने निवेदन किया—'भगवन् ! आप कृपया हमारे लिये नवचक्रविवेकके विषयमे उपदेश कीजिये ।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान्ने उपदेश आरम्भ किया—

'मूलाधारमें ब्रह्मचक्र है, वह योनिके आकारमें तीन घेरोंसे युक्त है, वहाँ कर्णिकाके मूलमें कुण्डलिनी शक्ति सोये हुए सर्पके आकारमें स्थित है । तप्त अग्निके रूपमे उसका तबतक ध्यान करना चाहिये, जबतक वह जाग्रत् न हो जाय । वहीं भगवती त्रिपुराका स्थान कामरूप नामक पीठ है, जिसकी उपासना करनेसे सारे भोगोंकी प्राप्ति होती है। इतना आधारनामक प्रथम चक्रके विषयमें हुआ ॥ १ ॥

'दूसरा छः दलोका स्वाधिष्ठान-चक्र है । उस षट्दल पद्मके कर्णिकापीठमें पश्चिमाभिमुख एक शिवलिङ्गका, जो मूँगेके अङ्कुरके समान लाल वर्णका है, ध्यान करे । वहाँ उड्डयानपीठ है, उसकी उपासना करनेसे जगत्को आकर्षित करनेकी सिद्धि प्राप्त होती है । तीसरा नाभिचक्र सर्पके समान कुटिल आकारका ओर पाँच घेरोंसे आवृत है। उस चक्रमे कोटि-कोटि बालसूर्यौंकी-सी प्रभासे युक्त तथा तड़ित्के समान क्षीण