कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 708, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६५४ ॱ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् ॱ [ खण्ड ३ अङ्गोंवाली कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करे । यह शक्ति जाग्रत् होनेपर सामर्थ्यवती होती है और सब प्रकारकी सिद्धियों- को प्रदान करती है । मणिपूरक चक्र हृदयचक्र है । वह अष्टदल पद्मके आकारका नीचेकी ओर मुख किये रहता है । उस चक्रमें ज्योतिर्मय लिङ्गका ध्यान करना चाहिये । वही ज्योतिर्मय लिङ्ग हस्रम्लाके नामसे विख्यात है, जो सर्वप्रिय है, उसके जाग्रत् होनेपर समस्त लोकोंको वशमें करनेकी शक्ति प्राप्त होती है । कण्ठमें जो चक्र है, वह चार अङ्गुल प्रमाणका है, उसमें बायीं ओर इडा अर्थात् चन्द्रनाड़ी और दाहिनी ओर पिङ्गला अर्थात् सूर्यनाड़ी है । इन दोनोंके बीचमें श्वेतवर्णकी सुषुम्णा नाड़ीका ध्यान करे । जो इसको जानता है, उसका अनाहत चक्र सिद्धि प्रदान करता है । इसके आगे तालुचक्र है, जहाँ निरन्तर अमृतकी धार प्रवाहित होती रहती है । तालुचक्रमे दश अथवा बारह दल होते हैं । घण्टीके चिह्नकी जड़में तथा आगेके दाँतोंकी जड़तक फैला हुआ जो चक्रके आकारका रन्ध्र—छिद्र है, उसीमे तालु- चक्र स्थित है । उस चक्रमे शून्यका ध्यान करे । इससे चित्त शून्यमें विलीन हो जाता है। सातवाँ भ्रूचक्र अँगूठेके परिमाणका है, उस द्विदल पद्ममे निवातदीपशिखाके आकारमें ज्ञान- नेत्रका ध्यान करे। इस चक्रके जाग्रत् होनेपर कपालकुन्द अर्थात् अष्टकके कारणभूत कर्मोंकी वाक्सिद्धि अर्थात् उनके विषयका सारा ज्ञान हो जाता है । आठवाँ आज्ञाचक्र है, उसे ब्रह्मरन्ध्र अथवा निर्वाणचक्र भी कहते हैं । वह रन्ध्र सूईकी नोकके परिमाणका है । वहाँ गतिशील धूम्रशिखाके आकारका ध्यान करे । वहाँ जालन्धर पीठ है । उसकी उपासना करनेसे मुक्तिलाभ होता है । अतएव इसे परब्रह्म- चक्र भी कहते हैं । नवाँ आकाशचक्र है । वहाँ षोडशदल पद्म ऊपरकी ओर मुख किये स्थित है । उनके बीचकी कर्णिका त्रिगुणांकी जननी होनेके कारण तीन शिखरोंवाले पर्वतके आकारकी कही गयी है । उसके बीचमें ऊपरकी ओर झुकी हुई शक्ति है । उसको देखते हुए ध्यान करे । वहाँ ही पूर्णगिरि पीठ है, जिसकी उपासना करनेसे सब प्रकारकी कामनाओंकी सिद्धि होती है ॥ २-९ ॥ 'इस सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद्को जो नित्य पढता है, वह अग्निपूत होता है, वह वायुपूत होता है । वह सब प्रकारके धन धान्य, स्त्री पुत्र, हाथी घोड़े, गाय भैंस, दास दासीमे युक्त योगी और ज्ञानी होता है । अन्तमे वह परमपदको प्राप्त करता है—जहाँसे फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १० ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ ऋग्वेदीय सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यूतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! 'न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः ।' ( कठोपनिषद् १ । १ । २७ ) 'धनसे मनुष्य कभी तृप्त होनेवाला नहीं है ।'