भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 709

खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६५५ (सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद्में वर्णित श्रीसूक्त) अथ श्रीसूक्तप्रारम्भः हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥ १ ॥ वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः । हे जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव ! सुवर्णके-से रगवाली, तस्य फलानि तपसा नुदन्तु किञ्चित् हरितवर्णविशिष्टा, सोने और चाँदीके हार पहननेवाली, या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६ ॥ चन्द्रवत् प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवीको मेरे लिये हे सूर्यके समान प्रकाशस्वरूपे ! तुम्हारे ही तपसे आवाहन करो ॥ १ ॥ वृक्षोंमें श्रेष्ठ मङ्गलमय विल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ । उसके फल हमारे तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । बाहरी और भीतरी दारिद्रयको दूर करें ॥ ६ ॥ यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥ २ ॥ उपैतु मा देवसखः अग्ने ! उन लक्ष्मीदेवीको, जिनका कभी विनाश नहीं कीर्तिश्च मणिना सह । होता तथा जिनके आगमनसे मैं सोना, गौ, घोडे तथा प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् पुत्रादिको प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आवाहन करो ॥ २ ॥ कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७ ॥ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् । देवि ! देवसखा कुवेर और उनके मित्र मणिभद्र श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥ ३ ॥ तथा दक्ष प्रजापतिकी कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों । अर्थात् जिन देवीके आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं मुझे धन और यशकी प्राप्ति हो । मैं इस राष्ट्रमे—देशमें तथा जो हस्तिनादको सुनकर प्रमुदित होती हैं, उन्हीं श्रीदेवीका उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें ॥ ७ ॥ मैं आवाहन करता हूँ, लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों ॥ ३ ॥ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥ ८ ॥ ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । लक्ष्मीकी ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रताकी अधिष्ठात्री पद्मेस्थितां पद्मवर्णां देवी) का, जो क्षुधा और पिपासासे मलिन—क्षीणकाय तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥ ४ ॥ रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ । देवि ! मेरे घरसे सब प्रकारके जो साक्षात् ब्रह्मरूपा, मन्द-मन्द मुसकरानेवाली, सोनेके दारिद्र्य और अमङ्गलको दूर करो ॥ ८ ॥ आवरणसे आवृत्त, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, भक्तानु- गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ग्रहकारिणी, कमलके आसनपर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ९ ॥ उन लक्ष्मीदेवीका मैं यहाँ आवाहन करता हूँ ॥ ४ ॥ जो दुराधर्षा तथा नित्यपुष्टा हैं, तथा गोबरसे (पशुओंसे) युक्त चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं गन्धगुणवती पृथिवी ही जिनका स्वरूप है, सब भूतोंकी स्वामिनी श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । उन लक्ष्मीदेवीका मैं यहाँ—अपने घरमें आवाहन करता तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये- हूँ ॥ ९ ॥ ऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५ ॥ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि । मैं चन्द्रके समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥ यशसे दीप्तिमती, स्वर्गलोकमें देवगणोंके द्वारा पूजिता, मनकी कामनाओं और सङ्कल्पकी सिद्धि एव वाणीकी सत्यता उदारशीला, पद्मस्तहा लक्ष्मीदेवीकी शरण ग्रहण करता हूँ । मुझे प्राप्त हों, गौ आदि पशुओं एव विभिन्न अन्नों—भोग्य मेरा दारिद्र्य दूर हो जाय । मैं आपको शरण्यके रूपमें वरण पदार्थोंके रूपमें तथा यशके रूपमें श्रीदेवी हमारे यहाँ करता हूँ ॥ ५ ॥ आगमन करें ॥ १० ॥