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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६५५ (सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद्में वर्णित श्रीसूक्त) अथ श्रीसूक्तप्रारम्भः हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥ १ ॥ वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः । हे जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव ! सुवर्णके-से रगवाली, तस्य फलानि तपसा नुदन्तु किञ्चित् हरितवर्णविशिष्टा, सोने और चाँदीके हार पहननेवाली, या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६ ॥ चन्द्रवत् प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवीको मेरे लिये हे सूर्यके समान प्रकाशस्वरूपे ! तुम्हारे ही तपसे आवाहन करो ॥ १ ॥ वृक्षोंमें श्रेष्ठ मङ्गलमय विल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ । उसके फल हमारे तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । बाहरी और भीतरी दारिद्रयको दूर करें ॥ ६ ॥ यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥ २ ॥ उपैतु मा देवसखः अग्ने ! उन लक्ष्मीदेवीको, जिनका कभी विनाश नहीं कीर्तिश्च मणिना सह । होता तथा जिनके आगमनसे मैं सोना, गौ, घोडे तथा प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् पुत्रादिको प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आवाहन करो ॥ २ ॥ कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७ ॥ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् । देवि ! देवसखा कुवेर और उनके मित्र मणिभद्र श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥ ३ ॥ तथा दक्ष प्रजापतिकी कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों । अर्थात् जिन देवीके आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं मुझे धन और यशकी प्राप्ति हो । मैं इस राष्ट्रमे—देशमें तथा जो हस्तिनादको सुनकर प्रमुदित होती हैं, उन्हीं श्रीदेवीका उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें ॥ ७ ॥ मैं आवाहन करता हूँ, लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों ॥ ३ ॥ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥ ८ ॥ ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । लक्ष्मीकी ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रताकी अधिष्ठात्री पद्मेस्थितां पद्मवर्णां देवी) का, जो क्षुधा और पिपासासे मलिन—क्षीणकाय तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥ ४ ॥ रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ । देवि ! मेरे घरसे सब प्रकारके जो साक्षात् ब्रह्मरूपा, मन्द-मन्द मुसकरानेवाली, सोनेके दारिद्र्य और अमङ्गलको दूर करो ॥ ८ ॥ आवरणसे आवृत्त, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, भक्तानु- गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ग्रहकारिणी, कमलके आसनपर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ९ ॥ उन लक्ष्मीदेवीका मैं यहाँ आवाहन करता हूँ ॥ ४ ॥ जो दुराधर्षा तथा नित्यपुष्टा हैं, तथा गोबरसे (पशुओंसे) युक्त चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं गन्धगुणवती पृथिवी ही जिनका स्वरूप है, सब भूतोंकी स्वामिनी श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । उन लक्ष्मीदेवीका मैं यहाँ—अपने घरमें आवाहन करता तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये- हूँ ॥ ९ ॥ ऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५ ॥ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि । मैं चन्द्रके समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥ यशसे दीप्तिमती, स्वर्गलोकमें देवगणोंके द्वारा पूजिता, मनकी कामनाओं और सङ्कल्पकी सिद्धि एव वाणीकी सत्यता उदारशीला, पद्मस्तहा लक्ष्मीदेवीकी शरण ग्रहण करता हूँ । मुझे प्राप्त हों, गौ आदि पशुओं एव विभिन्न अन्नों—भोग्य मेरा दारिद्र्य दूर हो जाय । मैं आपको शरण्यके रूपमें वरण पदार्थोंके रूपमें तथा यशके रूपमें श्रीदेवी हमारे यहाँ करता हूँ ॥ ५ ॥ आगमन करें ॥ १० ॥

६५६ * सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् * [ खण्ड ३ कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातर पद्ममालिनीम् ॥११॥ लक्ष्मीके पुत्र कर्दमकी हम संतान हैं। कर्दम ऋषि ! आप हमारे यहाँ उत्पन्न हो तथा पद्मोंकी माला धारण करनेवाली माता लक्ष्मीदेवीको हमारे कुलमें स्थापित करें ॥ ११ ॥ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥ जल स्निग्ध पदार्थोंकी सृष्टि करे। लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत ! आप भी मेरे घरमे वास करें और माता लक्ष्मीदेवीका मेरे कुलमे निवास करायें ॥ १२ ॥ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥१३॥ अग्ने ! आर्द्रस्वभावा, कमलहस्ता, पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मोंकी माला धारण करनेवाली, चन्द्रमाके समान शुभ्र कान्तिसे युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवीका मेरे यहाँ आवाहन करें ॥ १३ ॥ आर्द्रां य करिणां यष्टि सुवर्णां हेममालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥१४॥ अग्ने ! जो दुष्टोंका निग्रह करनेवाली होनेपर भी कोमल- स्वभावकी हैं, जो मङ्गलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करनेवाली यष्टिरूपा, सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यरस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं, उन लक्ष्मीदेवीका मेरे लिये आवाहन करें ॥१४॥ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥१५॥ अग्ने ! कभी नष्ट न होनेवाली उन लक्ष्मीदेवीका मेरे लिये आवाहन करें, जिनके आगमनसे बहुत-सा धन, गौएँ, दासियाँ, अश्व और पुत्रादिको हम प्राप्त करें ॥ १५ ॥ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥ जिसे लक्ष्मीकी कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्निमें घीकी आहुतियाँ दे तथा इन पन्द्रह ऋचाओंवाले श्रीसूक्तका निरन्तर पाठ करे ॥ १६ ॥ ॥ श्रीसूक्त समाप्त ॥ सङ्गका त्याग ही मोक्ष है भावभावे पदार्थानां हर्षामर्षविकारदा । मलिना वासना यैषा सा सङ्ग इति कथ्यते ॥ दुःखैर्न ग्लानिमायासि हृदि हृष्यसि नो सुखैः । आशावैवश्यमुत्सृज्य निदाघासङ्गतां व्रज ॥ सङ्गत्‍यागं विदुर्मोक्षं सङ्गत्यागादजन्मन्ता । सङ्गं त्यज त्वं भावानां जीवन्मुक्तो भवानघ ॥

  • ( अन्नपूर्णोपनिषद् ) पदार्थोंके होनेमें हर्ष और न होनेमें शोकरूपी विकार उत्पन्न करनेवाली जो मलिना वासना है, उसे सङ्ग कहते हैं। निदाघ ! तुम दुःखोंमें ग्लानिका अनुभव मत करो और सुखोंसे हृदयमे हर्षित मत होओ। यों आशाओंकी परवशताको छोड़कर असंगावस्थाको प्राप्त करो। हे निष्पाप ! सङ्गके त्यागको ही मोक्ष कहते हैं, सङ्गके त्यागसे जन्म-( मरण ) से छुटकारा मिलता है। अतएव समस्त पदार्थोंमें सङ्गका त्याग करके जीते ही मुक्त हो जाओ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय सीतोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीसीताजीके स्वरूपका तात्त्विक वर्णन

एक बार देवताओोंने प्रजापति ब्रह्माजीसे पूछा कि 'श्रीसीता- जी कौन हैं ! उनका क्या स्वरूप है ?' तब उन प्रजापतिने बतलाया कि “वे शक्तिरूपा ही श्रीसीताजी हैं। मूल प्रकृति- स्वरूपा होनेके कारण वे सीताजी ही प्रकृति कहलाती हैं। वे श्रीसीताजी प्रणवकी प्रकृतिस्वरूपा होनेसे भी प्रकृति कही जाती हैं। 'सीता' यह उनका नामात्मक रूप तीन वर्णोंका है और वे साक्षात् योगमायास्वरूपा हैं। सम्पूर्ण जगत्-प्रपञ्च- के भगवान् विष्णु बीज हैं और उनकी योगमाया 'ईकार' रूपा हैं। 'सकार' सत्य, अमृत, प्राप्ति* नामक ऐश्वर्य अथवा सिद्धि एवं चन्द्रका वाचक कहा गया है। दीर्घरूप-मात्रायुक्त 'तकार' महालक्ष्मीका स्वरूप, प्रकाशमय एव विस्तारकारी (जगत्स्रष्टा) कहा गया है। वे 'ईकार'रूपिणी अव्यक्तरूपा महामाया अपने चन्द्रसन्निभ अमृतमय अवयवों एव दिव्य अलकार, माला, मुक्तामालादि आभूषणोंसे अलकृत स्वरूपमें व्यक्त होती हैं। उनके तीन स्वरूप हैं, जिनमें अपने प्रथम स्वरूपसे वे शब्दब्रह्ममयी हैं। वे बुद्धिरस्वरूपा स्वाध्यायकालमें प्रसन्न होनेपर बोधको प्रकट करती हैं। अपने दूसरे स्वरूपमें वे पृथ्वीपर महाराज सीरध्वज जनककी यज्ञभूमिमें हलाग्रसे उत्पन्न हुईं। अपने तीसरे स्वरूपमें वे 'ईकार' रूपिणी अव्यक्तस्वरूपा रहती हैं। इन्हीं तीनों रूपोंको सीता कहा जाता है। शौनकीय तन्त्रमें निम्नलिखित भावके श्लोक मिलते हैं— “श्रीसीताजी श्रीरामकी नित्य सन्निधिके कारण जगदानन्द- कारिणी हैं। समस्त शरीरधारियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और सहार करनेवाली हैं। श्रीसीताजीको मूलप्रकृति कही जाने- वाली षडैश्वर्यसम्पन्ना भगवती जानना चाहिये। प्रणव- स्वरूपा होनेके कारण ब्रह्मवादी उन्हें प्रकृति बतलाते हैं। ब्रह्मसूत्रके 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस सूत्रमें उन्हींका प्रति- पादन है। वे श्रीसीताजी सर्ववेदमयी, सर्वदेवमयी, सर्वलोक- मयी, सर्वकीर्तिमयी, सर्वधर्ममयी, सबकी आधारभूता, कार्य एवं कारणरूपा, चेतन एवं जड दोनोंकी स्वरूपभूता, ब्रह्मा- जीसे लेकर जड पदार्थोंतककी आत्मभूता, इन सबके गुण एव कर्मके भेदसे सबकी शरीररूपा, देवता, ऋषि, मनुष्य एव गन्धर्वोंकी स्वरूपभूता, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच प्रभृति प्राणियोंकी शरीररूपा; पञ्चमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन एवं प्राणरूपा अर्थात् समस्त विश्वरूपा महालक्ष्मी देवताओंके भी स्वामी भगवान्‌से भिन्न एव अभिन्नस्वरूपा जानी जाती हैं। “वे श्रीसीताजी शक्त्यासना—शक्तिस्वरूपा होकर इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति एव साक्षात् शक्ति—इन तीन रूपोंमें प्रकट होती हैं। इच्छाशक्तिमय उनका स्वरूप भी त्रिविध होता है— श्रीदेवी, भूमिदेवी एवं नीलादेवीके रूपमें कल्याणरूपा, प्रभाव

  • अणिमादि अष्टविध ऐश्वर्यमें 'प्राप्ति' नामक सिद्धिका भी वर्णन आता है। प्राप्ति कहते हैं सर्वत्र गमनकी शक्तिको। उ० अ० ८३—

६५८ * सीतोपनिषद् *


रूपा तथा चन्द्र, सूर्य एव अग्निरूपा वे होती हैं। चन्द्रस्वरूपमे वे ओषधियोंका पोषण करती हैं। कल्पवृक्ष, पुष्प, फल, लता एव गुल्मो (झाड़ियों), ओषधियों एव दिव्य ओषधियोंकी स्वरूपभूता होती हैं तथा उसी चन्द्रके अमृतस्वरूपमें देवताओंके लिये 'महस्तोम' नामक यज्ञके फलको देनेवाली होती हैं। अमृतके द्वारा देवताओंको, अन्नके द्वारा पशुओं (प्राणियों) को तथा तृणके द्वारा उसपर अवलम्बित रहनेवाले जीवोंको—इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंको वे तृप्त करती हैं।

"वे सूर्यादि समस्त भुवनोंको-लोकोंको प्रकाशित करनेवाली हैं। दिन, रात्रि, निमेषसे लेकर घड़ी प्रभृति कालकी कलाएँ, आठ पहरोंसे युक्त दिन-रात्रिके भेदसे पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा संवत्सरके भेदसे मनुष्योंकी सौ वर्षकी आयुकी कल्पनाके द्वारा वे स्वयं ही प्रकाशित होती हैं। विलम्ब तथा शीघ्रतासे उपलक्षित निमेषसे लेकर परार्धपर्यन्त कालचक्र तथा जगच्चक्रादि प्रकारसे चक्रके समान घूमनेवाले कालके सभी विशेष-विशेष विभाग उन्हींके स्वरूप हैं, जो प्रकाशरूपा एव कालरूपा हैं।

"वे अग्निरूपा होकर प्राणियोंके लिये अन्न एव जलादि-पानके लिये क्षुधा एव पिपासारूपसे, देवताओंके लिये मुखरूपसे (देवता अग्निमें होमे हुए पदार्थ ही पाते हैं), वनौषधियोंके लिये शीतोष्णरूपसे, तथा काष्ठके बाहर एव भीतर नित्य एव अनित्य दोनों प्रकारसे (नित्यरूपमे व्याप्त अग्नितत्त्व एव अनित्यरूपमे प्रज्वलिताग्नि प्रभृति रूपोंमें) स्थित हैं।

"वे श्रीसीताजी अपने श्रीदेवीरूपमें तीन प्रकारका रूप धारण करके श्रीभगवान्के संकल्पानुसार सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये व्यक्त होती हैं। वे लोकरक्षणार्थ श्री तथा लक्ष्मीरूपमें लक्षित होती हैं, यों जाना जाता है। भूदेवी सम्पूर्ण जलमय समुद्रोंसहित सातों द्वीपवाली पृथिवीके रूपमें भूः भुवः आदि चौदहों भुवनोंकी आधार एव आधेयभूता प्रणवस्वरूपा होकर व्यक्त होती है। विद्युन्मालाके समान मुखवाली नीलादेवी भी सम्पूर्ण ओषधियों एव समस्त प्राणियोंके पोषणके लिये सर्वरूपा हो जाती है। समस्त भुवनोंके अधोभागमे जलाकारस्वरूप, मण्डूकमयी तथा भुवनोंकी आधाररूपा वही आदिशक्ति जानी जाती है।

"उन श्रीसीताजीका क्रियाशक्ति-रूप श्रीहरिके मुखसे नादके रूपमें व्यक्त हुआ। उस नादसे बिन्दु प्रकट हुआ। बिन्दुसे ॐकारका आविर्भाव हुआ। ॐकारसे परे राम-वैखानस नामका पर्वत है। उस पर्वतकी कर्म एव ज्ञानात्मिका अनेक शाखाएँ व्यक्त हैं। उसी पर्वतपर वेदत्रयीस्वरूप सर्वार्थको प्रकट करनेवाला आदि-शास्त्र है। तात्पर्य यह कि श्रीराम वैखानस पर्वत ही नित्य वेदस्वरूप हैं और लोकमें वह वेदोंके रूपमे व्यक्त होता है। उस आदि शास्त्रको ऋक्, यजुः एव सामात्मक होनेसे त्रयी कहा जाता है। कार्य-सिद्धिके लिये चार नामोसे उसका वर्णन होता है। अर्थात् देवस्वरूप वर्णनके मन्त्र, यज्ञ विधि निर्देशक मन्त्र तथा यज्ञमें गानके मन्त्र—ये ही तीन प्रकारके मन्त्र होनेसे वेदोंको त्रयी कहते हैं; किंतु यज्ञमे ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु एव उद्गाताके कार्यकी दृष्टिसे वेदोंको चार नामोंसे सम्बोधित किया जाता है—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्वाङ्गिरमवेद। यज्ञकर्ममें चातुर्होत्र प्रधान है और उसमे देवस्वरूपादि तीनका ही उपयोग होनेसे वेदोंको त्रयी कहते हैं। अथर्वाङ्गिरस वेद साम, ऋक् एव यजुःस्वरूप ही है। आभिचारिक कर्मोंकी समानतासे इन चारोंका पृथक्-पृथक् निर्देश होता है।

"ऋग्वेदकी इक्कीस शाखाएँ कही गयी हैं। यजुर्वेदीयोंकी एक सौ नौ शाखाएँ हैं। सामवेदकी एक सहस्र शाखाएँ हैं और अथर्ववेदकी पाँच शाखाएँ। इन वेदोंमें प्रथम (सर्वश्रेष्ठ) वैखानस मत है, जो प्रत्यक्ष दर्शन है। इसलिये मुनियोंद्वारा नित्य परम वैखानस (श्रीरामरूप) का स्मरण किया जाता है। कल्प, व्याकरण, शिक्षा, निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्द—ये छः वेदाङ्ग हैं। अयन, मीमांसा और न्यायशास्त्रका विस्तार—ये वेदोंके उपाङ्ग हैं। धर्मज्ञ पुरुषोके सेवनके लिये चारों वेद तथा वेदोंसे अधिक ये अङ्ग-उपाङ्गादि हैं। सभी वैदिक शाखाओंमें उनके समयाचार (साम्प्रदायिक आचरण) की शास्त्रके साथ सगति लगानेके लिये निबन्ध हैं। धर्मशास्त्रों (स्मृतियो) को महर्षियोंने अपने अन्त:करणके दिव्य ज्ञानसे पूर्ण किया है। मुनियोंने इतिहास-पुराण, वास्तुवेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा आयुर्वेद—ये पाँच उपवेद बताये हैं। इन सबके साथ दण्ड, नीति और व्यापार-विद्या तथा परतत्त्वमें प्राणजय करके स्थिति—इस प्रकार इक्कीस भेदयुक्त यह स्वत:प्रकाश—स्वयं प्रकटित शास्त्र है।

"पूर्वकालमे वैखानस ऋषिके हृदयमें भगवान् विष्णुकी वाणी प्रकट हुई। उसी वाणीको वेदत्रयीके रूपमें इस प्रकार कल्पित करके देहधारी अपनी उन्नति करता है। वैखानस ऋषिने अपने हृदयमे प्रकट उस भगवद्वाणीको सख्यारूपमे सङ्कल्प करके पहले जिस प्रकार प्रकट किया, उसी प्रकार वह

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *- ६५९ सब मैं बतलाता हूँ; सुनो। जो सनातन ब्रह्ममय रूपधारिणी क्रियाशक्ति कही गयी है, वह भगवान्‌की साक्षात् शक्ति है। भगवान्‌के स्मरणमात्र (संकल्पमात्र) से वे जगत्‌के रूपोंको प्रकट करती तथा दृश्य-जगत्‌मे स्वय व्यक्त होती ह। वे शासन एव कृपास्वरूपा, शान्ति तथा तेजोरूपा, व्यक्त (प्राणियों) की, अव्यक्त (देवादि) की कारणभूता एव उनके चरणादि समस्त अवयव तथा मुख एवं वर्ण (रूपादि) भेदस्वरूपा, भगवान्‌के साथ चलनेवाली (उनके सकल्पसे ही गति करनेवाली), भगवान्‌से कभी विलग न होनेवाली एव अविनाशिनी, निरन्तर भगवान्‌के साथका ही आश्रय करनेवाली, कहे हुए और न कहे हुए सभी स्वरूपोंवाली, निमेष-उन्मेषसे लेकर सृष्टि, स्थिति, सहार, तिरोधान, अनुग्रह आदि समस्त सामर्थ्यांस युक्त होनेके कारण साक्षात् शक्तिरूपमे वर्णित होती है। “श्रीसीताजीका इच्छाशक्ति रूप भी तीन प्रकारका है। प्रलयके समय विश्रामके लिये भगवान्‌के दाहिने वक्षःस्थलपर श्रीवत्सकी आकृति धारण करके जो विश्राम करती हैं, वे योगशक्ति हैं। भोगशक्ति भोगरूपा है। वे कल्पवृक्ष, कामधेनु, चिन्तामणि तथा शङ्ख, पद्म (तथा मकर, कच्छप) आदि नौ निधियोंमे निवास करती ह और भगवद्भक्तोंकी कामनाके अनुसार अथवा उनकी कामनाके बिना भी नित्य नैमित्तिक कर्मके द्वारा, अग्निहोत्रादिसे अथवा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधिसे-किसी भी निमित्तसे भगवान्‌की उपासना करनेवालोंके उपभोगके लिये बड़े-बड़े भोगोंसे, विशाल द्वार एव प्राकारवाले भवनोंसे, विमानोंसे अथवा भगवद्विग्रहके अर्चन पूजनादिकी सामग्रियोंसे अर्चनरूपमें, स्नानादि (तीर्थस्नानादि) रूपमें, पितृपूजा आदिके रूपमे, अन्न (भोज्य पदार्थ) एव पीने योग्य रस आदिसे, यह भगवान्‌को प्रसन्न करनेके लिये है—यो कहकर वे सब उपभोग-सामग्रियोंका सम्पादन करती हैं। “श्रीसीताजीकी वीरशक्ति चतुर्भुजा हैं। उनके हाथोंमें अभय एव वरदानकी मुद्राएँ तथा दो कमठ हैं। किरीट एव आभूषणोंसे वे भूषिता हैं। सम्पूर्ण देवताओंसे घिरी हुई, कल्पवृक्षके मूलमें चार श्वेत हाथियोंद्वारा रत्नजटित कलशोंके अमृत-जलसे अभिषिक्त होती हुई वे आसीन है। ब्रह्मादि समस्त देवता उनकी वन्दना करते हैं। अणिमादि अष्ट ऐश्वर्यंसे वे युक्त हैं और उनके सम्मुख खड़ी होकर कामधेनु उनकी स्तुति करती हैं। वेद और शास्त्र आदि भी मूर्त्तिमान् होकर उनकी स्तुति करते हैं। जया आदि अप्सराएँ एव देवनारियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। सूर्य एव चन्द्र दीपक बनकर वहाँ प्रकाश कर रहे हैं। तुम्बुरु एव देवर्षि नारद आदि उनका गुणगान कर रहे हैं। राका और सिनीवाली नामकी देवियाँ उनपर छत्र लगाये हैं। ह्लादिनी एव माया उनके दोनों ओर चँवर डुला रही हैं। स्वाहा एव स्वधा उनपर पखे झलती हैं। भृगु और पुण्य आदि महात्मा उनकी पूजा कर रहे हैं। दिव्य सिंहासनपर अष्टदलपद्मके ऊपर आसीन वे महादेवी समस्त कारणों एव कार्योंको निर्मित करनेवाली हैं। इस प्रकार भगवती लक्ष्मीके भगवान्‌से पृथक् निवासका ध्यान करना चाहिये। उन्होंने अपनेको अनुरूप दिव्य आभूषणोंसे अलकृत किया है। वे स्थिर होकर प्रसन्न नेत्रोंसे समस्त देवताओंद्वारा पूजित वीरमक्ष्मी कही जाती हैं।” ॥ अथर्ववेदीय सीतोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीराधि । पनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रुतियोंद्वारा श्रीराधिकाजीकी उपासना और स्तुति किसी समय उपासनाओंके स्वरूप एव लक्ष्यका विचार ( तात्पर्य यह कि विशुद्ध हृदयसे ही श्रीराधिकाजीकी उपासना करते समय ब्रह्मवेत्ताओं (-वेदज्ञों ) ने परस्पर यह विचार सम्भव है, अतः यजनसे आत्मशुद्धि करके तब प्रणाम करती करना प्रारम्भ किया कि श्रीराधिकाजीकी उपासना किस हैं) ॥ ३ ॥ लिये होती है । इस विचारमें प्रवृत्त होनेपर उनपर भगवान् 'जिनके दिव्य शरीरकी कान्तिके पड़नेसे ( जिन योगमाया- आदित्य ( वेदोंके अधिष्ठाता प्रकाशमय ज्ञानके रूपमें ) रूपके आश्रयसे) इन्द्रनीलमणिके समान वर्णवाला (इन्द्रियातीत अत्यन्त कृपालु हुए । अर्थात् प्रकाशस्वरूप वैदिक ज्ञान उनमें नीलिमाव्यञ्जक ) देवाधिदेव श्रीकृष्णचन्द्रका शरीर भी गौर प्रकट हुआ । (उन्होंने श्रीराधिकाजीकी उपासनाके सम्बन्धमें जान पड़ने लगता है ( घनसत्त्व होकर आविर्भूत होता है ) श्रुतियोंको इस प्रकार सलग्न पाया—) ॥ १ ॥ तथा जिनकी कान्ति पड़नेसे भौंरे, कौए और कोयल ( विषय- श्रुतियाँ कहती हैं—'सम्पूर्ण देवताओंमें जो देवत्व रस-लोलुप, कटुभाषी पापी एव मधुरभाषी, पर स्वरूपसे कृष्ण ( शक्ति ) है, वह श्रीराधिकाजीकी ही है । समस्त प्राणी अर्थात् योग-ज्ञानादि साधक, जिनका बाह्यरूप नीरस एव श्रीराधिकाजीके द्वारा ही अवस्थित हैं । अर्थात् देवतासे अनाकर्षक है ) भी ( रासमण्डलमें ) गौरवर्णके ( सत्त्वगुणी लेकर क्षुद्र प्राणियोंतक सभी जीव श्रीराधिकाजीकी शक्तिसे एव भक्तियुक्त ) हो जाते हैं, उन विश्वकी पालिका श्रीराधिका- स्थित एव चेष्टायुक्त हैं और उन्हींसे अभिव्यक्त हुए हैं। इसलिये जीको हम नमस्कार करती हैं ॥ ४ ॥ हम सब श्रुतियाँ उन श्रीराधिकाजीको नमस्कार करती हैं ॥२॥ 'हम सब श्रुतियाँ, सांख्य-योग शास्त्र तथा उपनिषद् जिन 'देवताओंके निवास पञ्चभूत, इन्द्रियों आदिमें श्रीराधिका- परब्रह्मकी अभिन्न शक्तिकी अगम्यताका प्रतिपादन करती हैं, जीकी प्रेरणासे ही कम्पन ( चेष्टा ) होती है । तथा उन्हींकी जिनको स्वरूपतः भली प्रकार पुराण भी नहीं जानते, उन प्रेरणासे वे हँसते ( उल्लास प्राप्त करते ) और नाचते ( क्रिया- देवताओंकी पालिका श्रीराधिकाजीको हम नमस्कार करती हैं॥५॥ शील होते ) हैं । सबकी अधिदेवता श्रीराधिकाजी ही हैं सम्पूर्ण संसारके अधीश्वर त्रिभुवनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र ( सब उनके वशमें हैं ) । अतएव अपने सम्पूर्ण पापोंके जिन्हें प्राणसे भी अधिक प्रिय मानते हैं, वृन्दावनमें नाशके लिये व्याहृतियों ( भूः-भुवः-स्वः या श्रीं-क्लीं-ह्रीं )- स्थित अपनी ( श्रुतियोंकी ) इष्ट—आराध्य-देवी उन श्रीवृन्दा द्वारा हवन करके फिर श्रीराधिकाजीको हम प्रणाम करती हैं ।

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६१

[बायाँ स्तम्भ]

वनकी पालिका—अधिष्ठात्री देवी श्रीराधिकाजीको हम नित्य नमस्कार करती हैं ॥ ६ ॥ 'विश्वभर्ता श्रीकृष्णचन्द्र एकान्तमें अत्यन्त प्रेमार्द्र होकर जिनकी पदधूलि अपने मस्तकपर धारण करते हैं और जिनके प्रेममें निमग्न होनेपर हाथसे गिरी वंशी एवं बिखरी अलकों- का भी स्मरण उन्हें नहीं रहता, तथा वे क्रीतकी भाँति जिनके वशमें रहते हैं, उन श्रीराधिकाजीको हम नमस्कार करती हैं ॥ ७ ॥ 'श्रीरासमण्डलमें जिनकी रासक्रीड़ा देखकर चन्द्रमा एवं विवशा देवपत्नियोंको अपने शरीरका भी भान नहीं रह जाता और श्रीवृन्दावनके समस्त जड एवं जङ्गम भी अपने स्वरूपको भूल जाते हैं अर्थात् जड पाषाण, तरु प्रभृति सचित होने लगते हैं और जङ्गम (चर) प्राणी विमुग्ध—स्थिर हो जाते हैं, श्रीरासमण्डलमें भावावेशयुक्ता उन श्रीराधिकाजीको हम नमन करती हैं ॥ ८ ॥ 'जिनके अङ्कमें लेटे हुए श्रीकृष्णचन्द्र अपने शाश्वत विहारस्थान गोलोकका स्मरणतक नहीं करते, कमलोद्भवा लक्ष्मी और श्रीपार्वतीजी जिनकी अंशरूपा हैं, उन समस्त शक्तियोंकी अधिष्ठात्री श्रीराधिकाजीको हम प्रणाम करती हैं॥९॥ '(श्रीललितादि) सखियोंके साथ (ऋषभ, गान्धारादि) स्वरोंसे (तार, मध्य और मन्द्र—इन) तीनों ग्रामोंसे तथा (अनेक) मूर्च्छनाओं (स्वरके चढ़ाव-उतारों) से गाते हुए, प्रेमविवश होकर जिन्होंने (श्रीरासक्रीड़ाके समय) श्रीवृन्दावनमें एकमात्र अपनी ही शक्तिसे ब्राह्मी निशा (एक


[दायाँ स्तम्भ]

मासपर्यन्त दीर्घरात्रि) का विस्तार (प्रादुर्भाव) किया, उन श्रीराधिकाजीको हम नमस्कार करती हैं ॥ १० ॥ 'किसी समय दो भुजाओंवाली (चतुर्भुजी नहीं) श्रीकृष्ण- की मूर्तिबनकर अर्थात् स्वयं द्विभुज श्रीकृष्ण-वेश धारण करके वंशीके छिद्रोंको श्रीराधिकाजीने स्वरसे भर दिया। (तात्पर्य यह कि श्रीकृष्ण-वेश धारण करके किसी दिन श्रीराधिकाजीने वेणु-वादनका प्रयत्न किया और वे केवल वंशी-छिद्रोंसे (गायन- रहित) ध्वनि निकाल पायीं।) इससे अत्यन्त उल्लसित होकर देव-देव श्रीकृष्णचन्द्रने कुन्द एवं कल्हारवृक्षके पुष्पोंकी माला बनाकर उनका श्रृङ्गार करके उन्हें प्रसन्न किया ॥ ११ ॥ 'जिनका इस उपनिषद्में वर्णन हुआ है, वे श्रीराधिकाजी और आनन्द-सिन्धु श्रीकृष्णचन्द्र वस्तुतः एक ही शरीर एवं परस्पर नित्य अभिन्न हैं। केवल लीलाके लिये वे दो स्वरूपोंमें व्यक्त हुए हैं। अतएव जिस लीलाके लिये उन परम रस- सिन्धुका श्रीविग्रह दो रूपोंमें शोभित हुआ, उस लीलाको जो सुनता या पढ़ता है, वह उन परम प्रभुके विशुद्ध धाम (गोलोक) में जाता है' ॥ १२ ॥ इस उपनिषद्को पूर्वकालमें वशिष्ठजीने मधुरभाषी बृहस्पतिजीको पढ़ाया। बृहस्पतिजीने अपने यजमान इन्द्रको उपदेश किया और तभीसे यह उपनिषद् बार्हस्पत्यके नामसे प्रसिद्ध हुआ। प्रणवस्वरूप परमपुरुषको नमस्कार ! प्रणवके स्मरणके साथ आद्या परमशक्तिका शक्तिको नमस्कार ! नमस्कार !!


॥ अथर्ववेदीय श्रीराधिकातापनीयोपनिषद् समाप्त ॥


शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ ऋग्वेदीय श्रीराधोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीराधाजीके स्वरूप तथा नामोंका वर्णन


[बायाँ स्तम्भ] ॐ एक बार ऊर्ध्वरेता सनकादि महर्षियोंने भगवान् श्रीब्रह्माजीकी स्तुति करके पूछा, 'देव ! सर्वप्रधान देवता कौन हैं और उनकी कौन कौन-सी शक्तियाँ हैं तथा उन शक्तियोंमें सृष्टिका सर्वश्रेष्ठ कारण कौन-सी शक्ति है ?' यह सुनकर श्रीब्रह्माजी बोले—'पुत्रो ! सुनो, किंतु इस अति गोपनीय रहस्यको तुम किसीसे प्रकट न करना—तुम इसे किसी ऐरे-गैरेको मत दे डालना । हाँ, जो स्नेही हों, ब्रह्मवादी हों, गुरुभक्त हों, उन्हें अवश्य देना । उनके अतिरिक्त और किसीको देनेसे महान् पाप लगेगा । भगवान् हरि श्रीकृष्ण ही परमदेव हैं । वे छहों ऐश्वर्योंसे पूर्ण भगवान् गोप और गोपियोंके सेव्य, श्रीवृन्दा ( तुलसी ) देवीसे आराधित और श्रीवृन्दावनके अधीश्वर हैं । वे ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं । उन्ही श्रीहरिके एक रूप नारायण भी हैं जो कि अखिल ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर हैं । ये श्रीकृष्ण प्रकृतिसे भी पुरातन और नित्य हैं। उनकी आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञान, इच्छा और क्रिया आदि बहुत-सी शक्तियाँ हैं । उनमें आह्लादिनी सर्वप्रधान हैं । ये ही परम अन्तरङ्गभूता श्रीराधा है। कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिये ये राधा है, अथवा ये सर्वदा कृष्णकी आराधना करती है; इसलिये राधिका कहलाती हैं । श्रीराधाको गान्धर्वा भी कहते हैं, ब्रजकी गोपाङ्गनाएँ, द्वारकाकी समस्त श्रीकृष्ण महिषियाँ और


[दायाँ स्तम्भ] श्रीलक्ष्मीजी इन्हीं श्रीराधिकाजीकी कायव्यूह (अंशरूपा) हैं। ये राधा और श्रीकृष्ण रस सागर एक होते हुए ही शरीरसे क्रीड़ाके लिये दो हो गये हैं। ये श्रीराधिकाजी भगवान् हरिकी सर्वेश्वरी, सम्पूर्ण सनातनी विद्या हे और श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं । वेद एकान्तमे इनकी ऐसी ही स्तुति किया करते हैं । इनकी महिमाका मैं अपनी सम्पूर्ण आयुमें भी वर्णन नहीं कर सकता । जिसपर इनकी कृपा होती है, परमधाम उनके हाथमें आ जाता है । इन श्रीराधिकाजीको न जानकर जो श्रीकृष्णकी आराधना करना चाहता है, वह महामूर्ख है, मूढ़तम है । श्रुतियाँ इनके इन नामोंका गान करती है— १ राधा, २ रासेश्वरी, ३ रम्या, ४ कृष्णमन्त्राधिदेवता, ५ सर्वाद्या, ६ सर्ववन्द्या, ७ वृन्दावनविहारिणी, ८ वृन्दारोध्या, ९ रमा, १० अशेषगोपीमण्डलपूजिता, ११ सत्या, १२ सत्यपरा, १३ सत्यभामा, १४ श्रीकृष्णवल्लभा, १५ वृषभानुसुता, १६ गोपी, १७ मूल प्रकृति, १८ ईश्वरी, १९ गान्धर्वा, २० राधिका, २१ आरम्या, २२ रुक्मिणी, २३ परमेश्वरी, २४ परात्परतरा, २५ पूर्णा, २६ पूर्णचन्द्रनिभानना, २७ भुक्तिमुक्तिप्रदा तथा २८ भवव्याधिविनाशिनी । इन अट्ठाईस नामोंका जो पाठ करते है, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं। यों भगवान् श्रीब्रह्माजीने कहा है* ।


[पाद-टिप्पणी श्लोक]

  • राधा रासेश्वरी रम्या कृष्णमन्त्राधिदेवता । सर्वाद्या सर्ववन्द्या च वृन्दावनविहारिणी ॥ वृन्दारोध्या रमाशेषगोपीमण्डलपूजिता । सत्या सत्यपरा सत्यभामा श्रीकृष्णवल्लभा ॥ वृषभानुसुता गोपी मूलप्रकृतिरीश्वरी । गान्धर्वा राधिकाऽऽरम्या रुक्मिणी परमेश्वरी ॥ परात्परतरा पूर्णा पूर्णचन्द्रनिभानना । भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्यं भवव्याधिविनाशिनी ॥
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६३ '(इस प्रकार भगवान्‌की आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीका और जड है। (जड होनेके कारण भगवान्‌की दृष्टि पड़नेसे) यह वर्णन हुआ, अब उनकी सन्धिनी-शक्तिका विवरण सुनो।) अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना करती है तथा यही माया और यह सन्धिनी-शक्ति धाम, भूषण, शय्या और आसनादि तथा अविद्यारूपसे जीवका बन्धन करती है। क्रियाशक्तिको ही मित्र और भृत्यादिके रूपमें परिणत होती है और मृत्युलोकमे लीलाशक्ति कहते हैं। अवतार लेनेके समय माता-पिताके रूपमें परिणत हो जाती 'जो इस उपनिषद्‌को पढते हैं, वे अव्रती भी व्रती हो है। यही अनेक अवतारोंकी कारण है। ज्ञानशक्तिको ही जाते हैं तथा वे अग्निपूत, वायुपूत और सर्वपूत हो जाते है। क्षेत्रज्ञशक्ति कहते हैं और इच्छाशक्तिके अन्तर्भूत माया- वे श्रीराधाकृष्णके प्रिय होते हैं और जहाँतक दृष्टिपात करते शक्ति है। यह सत्त्व, रज और तमोगुणारूपा है तथा बहिरङ्ग हैं, वहाँतक सबको पवित्र कर देते हैं। ॐ तत्सत्।' ॥ ऋग्वेदीय श्रीराधोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! एकमात्र श्रीकृष्ण ही भजनीय हैं एको वशी सर्वगः कृष्ण ईड्य एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति तं पीठस्थं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां सिद्धिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तं पीठगं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (गोपालपू० ता०) एकमात्र सबको वशमें रखनेवाले, सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा स्तवन करने योग्य हैं। वे एक होकर भी बहुत रूपोंमें प्रकाशित हैं। जो धीर भक्त उन पीठस्थ भगवान्‌को भजते हैं, उन्हींको सनातनी सिद्धि मिलती है, दूसरोंको नहीं। जो नित्योंके भी नित्य हैं, चेतनोंके भी परम चेतन हैं, जो एक ही बहुतोंकी कामना पूर्ण करते हैं, उन पीठस्थ श्रीभगवान्‌को जो धीर भक्त भजते हैं, उन्हींको सनातन सुख मिलता है, दूसरोंको नहीं।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यन्तरण दिया गया है:

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय बिन्दू नि षद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मनके लयका साधन, आत्माका स्वरूप तथा ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय

ॐ । मन दो प्रकारका बताया गया है, एक तो शुद्ध मन और दूसरा अशुद्ध । जिसमें कामनाओं—विषय-भोगोंके सङ्कल्प उठते रहते हैं, वह अशुद्ध मन है, तथा जिसमें कामनाओंका सर्वथा अभाव हो गया है, वही शुद्ध मन है। मनुष्योंका मन ही उनके बन्धन और मोक्षका कारण है। विषयासक्त मन बन्धनका और विषय-सङ्कल्पसे रहित मन मोक्षका कारण माना गया है। क्योंकि विषय-सङ्कल्पसे शून्य होनेपर ही इस मनका लय होता है, इसलिये मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाला साधक अपने मनको सदा विषयोंसे दूर रक्खे। जब मनसे विषयासक्ति निकल जाती है और वह हृदयमें स्थिर होकर उन्मनीभावको प्राप्त (संकल्प विकल्पसे रहित) हो जाता है, तब वही परम पद है। मनको तभीतक रोकनेका प्रयत्न करना चाहिये, जबतक कि वह हृदयमें ही विलीन नहीं हो जाता । मनका हृदयमें लय हो जाना—यही ज्ञान और मोक्ष है; इसके सिवा जो कुछ है, वह ग्रन्थका विस्तारमात्र है। जब न तो कोई चिन्तनीय रह जाय और न अचिन्तनीय ही रह जाय, चिन्तनीय तथा अचिन्तनीय दोनोंमेंसे किसीके प्रति भी मनका पक्षपात न रह जाय, उस समय यह साधक ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। स्वर अर्थात् प्रणवके साथ परमात्माकी एकता करे और फिर प्रणवसे अतीत परम तत्त्वकी भावना (चिन्तन) करे। प्रणवातीत तत्त्वकी उस भावनाके द्वारा भावरूप परमात्माकी ही उपलब्धि होती है, अभावकी नहीं। अर्थात् उसके बिना समाधि शून्यरूप ही होती है। वही कलाओंसे रहित अर्थात् अवयवहीन, विकल्पशून्य एव निरञ्जन—मायारूप मलरहित ब्रह्म है। 'वह ब्रह्म मैं हूँ' यों जानकर मनुष्य निश्चय ही ब्रह्म

हो जाता है। विकल्प-शून्य, अनन्त, हेतु और दृष्टान्तसे रहित, अप्रमेय तथा अनादि परम कल्याणमय ब्रह्मको जानकर विद्वान् पुरुष अवश्य ही ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ १-९ ॥ न सहार है न सृष्टि; न बन्धन है न उससे छूटनेका उपदेश; न मुक्तिकी इच्छा है न मुक्ति। ऐसा निश्चय होना ही परमार्थबोध (यथार्थ ज्ञान) है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंमें एक ही आत्माका सम्बन्ध मानना चाहिये। जो इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत हो गया है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तर्यामी आत्मा प्रत्येक प्राणीके भीतर स्थित है। पृथक् पृथक् जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति वही एक और अनेक रूपोंमें दृष्टिगोचर होता है। घटमें आकाश भरा है, किन्तु घटके फूट जानेपर जैसे केवल घड़ेका ही नाश होता है, उसमें भरे हुए आकाशका नहीं, उसी प्रकार देहधारी जीव भी आकाशके ही समान है—शरीरके नाशसे आत्माका नाश नहीं होता। जीवोंका यह भिन्न-भिन्न प्रकारका शरीर घटके ही सदृश है, जो बार-बार फूटता या नष्ट होता रहता है। यह नष्ट होनेवाला जड शरीर अपने भीतर परिपूर्ण चिन्मय ब्रह्मको नहीं जानता, परन्तु वह सर्वसाक्षी परमात्मा सब शरीरोंको सदा ही जानता रहता है। जीवात्मा जबतक नाममात्रका अस्तित्व रखनेवाली मायासे आवृत्त है, तबतक हृदय-कमलमें बद्धकी भाँति स्थित रहता है, जब अज्ञानमय अन्धकारका नाश हो जाता है, तब ज्ञानके आलोकमें विद्वान् पुरुष जीवात्मा और परमात्माकी नित्य एकताका ही दर्शन करता है ॥ १०-१५ ॥

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६५ शब्दब्रह्म (प्रणव) भी अक्षर है और परब्रह्म भी अक्षर है। इनमेंसे जिसके क्षीण होनेपर जो अक्षय बना रहता है, वह (परब्रह्म) ही वास्तवमे अक्षर (अविनाशी) है। विद्वान् पुरुष यदि अपने लिये शान्ति चाहे तो उस अक्षर परब्रह्मका ही ध्यान करे । दो विद्याएँ जाननेयोग्य हैं—एक तो वह, जिसे 'शब्दब्रह्म' कहते हैं और दूसरी वह, जो 'परब्रह्म' के नामसे प्रसिद्ध है। 'शब्दब्रह्म' (वेद-शास्त्रोंके ज्ञान) से पारङ्गत होनेपर मनुष्य परब्रह्मको जान लेता है। बुद्धिमान् पुरुष ग्रन्थका अभ्यास करके उससे ज्ञान-विज्ञानके तत्त्वको ग्रहण कर ले, फिर समूचे ग्रन्थको त्याग दे—ठीक उसी तरह, जैसे धान्य—अन्न चाहने- वाला मनुष्य अन्नको तो ले लेता है और पुआलको खलिहानमें ही छोड़ देता है। अनेक रंग-रूपोंवाली गौओंका भी दूध एक ही रंगका होता है। इसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष विभिन्न साम्प्रदायिक चिह्नोंको धारण करनेवाले पुरुषोंके ज्ञानको भी गौओंके दूधकी भाँति एक-सा ही देखता है। बाह्य चिह्नोंके भेदसे ज्ञानमें कोई अन्तर नहीं आता। जैसे दूधमे घी छिपा रहता है, उसी प्रकार प्रत्येक प्राणीके भीतर विज्ञान (चिन्मय ब्रह्म) निवास करता है। जिस प्रकार घीके लिये दूधका मन्थन किया जाता है, वैसे ही विज्ञानमय ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये मनको मथानी बनाकर सदा मन्थन (चिन्तन और विचार) करते रहना चाहिये। तदनन्तर ज्ञानदृष्टि प्राप्त करके अग्निके समान तेजोमय ब्रह्मका इस प्रकार अनुभव करे कि 'वह कलाशून्य, निर्मल एव शान्त परब्रह्म मैं हूँ।' यही विज्ञान माना गया है। जिसमें सम्पूर्ण भूतोंका निवास है, जो स्वयं भी सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें निवास करता है तथा सबपर अहैतुकी दया करनेके कारण प्रसिद्ध है, वह सर्वात्मा वासुदेव मैं हूँ, वह सर्वात्मा वासुदेव मैं हूँ। इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥ १६–२२ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय ब्रह्मविन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! निश्चयके अनुसार ब्रह्मकी प्राप्ति सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्माऽन्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माऽऽह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः । (३।१४।४) शाण्डिल्य ऋषिके ये वचन हैं—जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, समस्त विश्वमें सर्वत्र व्याप्त, वाक्रहित ओर संभ्रमशून्य है, वह मेरा आत्मा हृदयमें सदा विराजमान है। यही ब्रह्म है। इस शरीरको छोड़कर जानेपर मैं इसी परब्रह्मको प्राप्त हो जाऊँगा। जिसका ऐसा दृढ़ विश्वास है, जिसको इसमें कोई संदेह भी नही है (उसे इसी ब्रह्मकी प्राप्ति होती है)। उ० अं० ८४-

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय ध्या बिन्दूपनि ष द् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ध्यानयोगकी महिमा तथा स्वरूप यदि बहुयोजनविस्तीर्ण पर्वतके समान भी भारी पाप- राशि हो, तो भी वह ध्यानयोगके द्वारा नष्ट हो जाती है। (ऐसे महापाप) और किसी साधनसे कभी नष्ट नहीं होते ॥ १ ॥ बीज (कारणभूत) अक्षर (मकार) से परे बिन्दु है और बिन्दुसे परे भी नाद स्थित है, जिससे सुन्दर शब्दका उच्चारण होता है। शक्तिरूप प्रणव नादसे भी परे स्थित है तथा अकारसे लेकर शक्तिपर्यन्त प्रणवरूप अक्षरके क्षीण होने- पर जो शब्दहीन स्थिति होती है, वही 'शान्त' नामसे प्रसिद्ध परम पद है। जो अनाहत (बिना आघातके उत्पन्न, ध्यानमें सुनायी पड़नेवाला, मेघ-गर्जनके समान प्रकृतिका आदि शब्द) है, उस शब्दका भी जो परम कारण-शक्ति है, उसके भी परमकारण सच्चिदानन्दस्वरूप शान्तपदको जो योगी प्राप्त कर लेता है, उसके समस्त संदेह नष्ट हो जाते हैं ॥ २-३ ॥ बालकी नोकके पचास हजार भाग किये जायें, फिर उस भागके भी सहस्र भाग करनेपर उस भागका भी जो अर्द्ध- भाग है, उसके समान सूक्ष्मातिसूक्ष्म वह निरञ्जन (विशुद्ध) ब्रह्म है—यो जानना चाहिये। तात्पर्य यह कि वह अत्यन्त दुर्लक्ष्य परमतत्त्व है। जैसे पुष्पमें गन्ध व्याप्त रहती है, जैसे दूधमें घृत अलक्षित रहता है, जैसे तिलमे तेल अनुस्यूत रहता है, जैसे सोनेकी खानके पत्थरंामे सोना अव्यक्त रहता है, उसी प्रकार वह आत्मा समस्त प्राणियोंमें छिपा है। निश्चयात्मिका बुद्धिसे सम्पन्न, अशनारहित ब्रह्मवेत्ता (सूत्रकी) मणियोंमे सूत्रके समान आत्माको व्याप्त जानकर उसी ब्रह्मस्वरूपमें स्थित रहते हैं। जैसे तिलोंमें तेल व्याप्त है, जैसे फूलोंमें सुगन्ध व्याप्त है, वैसे ही पुरुषके शरीरके बाहर एव भीतर सब ओर आत्मतत्त्व व्याप्त होकर स्थित है ॥ ४-७ ॥ जैसे वृक्ष अपनी पूरी कलाके साथ रहता है और उसकी छाया वृक्षकी कलासे हीन रहती है, वैसे ही आत्मा अपने कलात्मक (स्व-सच्चिदानन्द) स्वरूपसे और निष्कल (छाया- स्थानीय जगद्रूप) भावसे सर्वत्र व्याप्त होकर अवस्थित है ॥८॥ (उपर्युक्त आत्मस्वरूपकी उपलब्धि—अनुभूतिके लिये साधन निर्देश करते हैं कि विधिवत् आसनपर अवस्थित होकर) पूरकके द्वारा श्वासको भीतर खींचते हुए नाभिस्यानमें अतसी-पुष्पके समान नीलवर्ण, चतुर्भुज महावीर (भगवान् विष्णु) का ध्यान करना चाहिये। कुम्भकके द्वारा— श्वासको भीतर रोके हुए हृदयस्थानमें लाल कमलकी कर्णिकापर विराजमान, लालवर्णके, चार मुखवाले लोकपितामह ब्रह्माजीका ध्यान करना चाहिये। रेचकके द्वारा श्वास छोड़ते समय ललाटमे विद्यास्वरूप, तीन नेत्रोंवाले, शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल रगके, कलारहित, पापविनाशक भगवान् शङ्करका ध्यान करना चाहिये ॥ ९-११ ॥ सुषुम्णापथमें उपर्युक्त तीनों कमलोंमेंसे नाभिस्यानका कमल आठ दलोका है। हृदयस्थानका कमल ऊपर नाल एव नीचे मुख करके अवस्थित है। ललाटमें अवस्थित कमल केलेके फूलके समान नीललोहित (बैगनी रगका) है। ये तीनों कमल सर्वदेवमय हैं। इन तीनोंसे ऊपर मूर्धदेशमें एक और कमल है। उसमें सौ दल हैं। उस खिले हुए कमलकी कर्णिका विस्तृत है।

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६६७ उस कर्णिकापर पहले सूर्य, फिर उनके ऊपर चन्द्रमा और चन्द्रके ऊपर अग्नि—इस प्रकार एकके ऊपर एकका क्रमशः चिन्तन करे। क्योंकि वह कमल सुप्त है; अतः सूर्य, चन्द्र एवं अग्निके धारणके लिये ध्यानके द्वारा उसे पहले जाग्रत्—विकसित कर लेना चाहिये। उस पद्मपर स्थित बीजों (पचास अक्षरों) का उच्चारण करके ही यह जीवात्मा बात- चीत आदि व्यवहारका निर्वाह करता रहता है ॥ १२-१४ ॥ (नाभि, हृदय एवं ललाट)—इन तीनों स्थानों तथा (अपनी उपासनाके पूरक, कुम्भक, रेचक)—रूप तीन मागोंवाले, विष्णु, ब्रह्मा एवं शिवरूपसे त्रिविध ब्रह्मस्वरूप, प्रणवरूपमें अकारादि तीन अक्षरोंवाले, उसी रूपमें अकार, उकार, मकार—इन तीन मात्राओंवाले तथा उनमें व्याप्त अर्धमात्रास्वरूप जो परमात्मा हैं, उनको जो जानता है, वही वेदके तात्पर्यका ज्ञाता है। इन तेलकी धाराके समान अविच्छिन्न, घण्टेकी अनुरणनरूप ध्वनिके समान दीर्घकालतक ध्वनित होनेवाला तथा विना वाणीके (प्राणोंद्वारा ही) उच्चरित विन्दुपर्यन्त प्रणवके बाद प्रकट होनेवाले नादको जो जानता है, वही वेदोंको ठीक जानता है ॥ १५-१६ ॥ प्रणव धनुष है, आत्मा ही बाण है एवं परब्रह्म परमात्मा उसके लक्ष्य हैं। प्रमादहीन साधकके द्वारा ही वह वेधा जाता है। अतः बाणकी भाँति उस लक्ष्यमे तन्मय हो जाना चाहिये। अपने शरीरको नीचेकी अरणि (यज्ञिय अग्निमन्थन-काष्ठ) बनावे और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनावे। ध्यानाभ्यासरूपी मन्थन-क्रियाके द्वारा साधक काष्ठमें व्याप्त हुई अग्निकी भाँति सबके भीतर व्याप्त परमदेव परमात्माका साक्षात्कार करे ॥ १७-१८ ॥ जैसे (बच्चे) कमलकी नालसे पानी धीरे-धीरे खींचते हैं, वैसे ही योगी योगावस्थामें स्थित होकर धीरे-धीरे प्राणोंको खींचे (अर्थात् स्वाधिष्ठान आदि चक्रोंका भेदन करते हुए प्राणको क्रमशः ऊर्ध्वभूमिकामें ले जाय)। जैसे किसान रस्सी- द्वारा कुएँसे जल निकालता है, उसी प्रकार प्रणवकी अर्धमात्रा (अव्यक्त नादोच्चारण) को रस्सी बनाकर हृदय-कमलरूपी कुएँसे नाल (सुषुम्णा)-मार्गके द्वारा जलरूपा कुण्डलिनीको भ्रूमध्यमे ले जाय। नासिकाकी जड़से लेकर दोनों भौंहोंके मध्यमे जो ललाट है, वहाँतक अमृत-स्थान समझना चाहिये। यही विश्वका महान् निवास-स्थान (परमात्मपद) है। यही विश्वका महान् निवासस्थान (परमात्मपद) है। ॥ कृष्णयजुर्वेदीय ध्यानविन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ब्रह्मज्ञानसे ब्रह्मत्वकी प्राप्ति स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ (बृहदारण्यक ४।४।२५) यह महान् आत्मा जन्मसे रहित, बुढ़ापेसे रहित, मृत्युसे रहित और भयसे रहित है। ब्रह्म अभय है, निश्चय ब्रह्म अभय है। जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही ब्रह्म हो जाता है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय तेजोबिन्दूपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रणवस्वरूप तेजोमय विन्दुके ध्यानकी महिमा तथा उसके अधिकारी एवं अनधिकारी ॐ मायिक जगत्से परे हृदयाकाशमें अवस्थित प्रणवस्वरूप तेजोमय बिन्दु का ध्यान ही परम ध्यान है। वह तेजोमय बिन्दुका ध्यान आणव (अत्यन्त सूक्ष्म उपायसे साध्य), शाम्भव (शिवरूपताकी प्राप्ति करानेवाला) एव शाक्त (गुरुकी शक्तिसे ही साध्य) है। इसी प्रकार स्थूल, सूक्ष्म तथा इन दोनोंसे परे सर्वातीत फलरूप भी है। बुद्धिमान् मुनियोंके लिये भी उस बिन्दुके ध्यानकी साधना बड़ी कठिन है, वह कठिनतासे आराधित (सिद्ध) होता है। वह दुर्दर्श है। उसका आश्रयण कठिनतासे हो पाता है। वह कठिनाईसे ही लक्षित होता है। वह दुस्तर है; उस ध्यानको अन्ततक निभा लेना अत्यन्त कठिन है ॥ १-२ ॥ आहारको जीतकर (मिताहारी होकर), क्रोधको वशमें करके, समस्त सङ्गोंसे तटस्थ होकर, इन्द्रियोंपर विजय करके, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित होकर, अहङ्कारको त्यागकर, समस्त आशाओंको छोड़कर एव सङ्ग्रहीन होकर, तथा दूसरोंको जो अगम्य है, उसे भी प्राप्त करनेके दृढ निश्चयसे युक्त होकर, केवल गुरुसेवाका ही प्रयोजन रखनेवाला साधक इस ध्यानका मुख्य अधिकारी है। इस तेजोमय बिन्दुके ध्यानमे साधकलोग वैराग्य, उत्साह एव गुरुभक्ति—ये तीन द्वार (प्रमुख साधन) उपलब्ध करते हैं; अतः यह हस (विशुद्धतत्त्व) त्रिधामा कहा जाता है ॥ ३-४ ॥ यह ध्यान करनेयोग्य तेजोबिन्दु परम गोपनीय एव अधिष्ठानरूप है। यह सबको प्रतीत न होनेके कारण अव्यक्त है, ब्रह्मस्वरूप है; इसका कोई अधिष्ठान नहीं। यह स्वय ही सबका आधार है। यह आकाशके समान व्यापक है, सूक्ष्मकलात्मक एव भगवान् विष्णुका प्रसिद्ध परमपद (परमधाम) भी यही है। यह तीनों लोकोंका पिता (उत्पत्तिस्थान), त्रिगुणमय, सबका आश्रय, त्रिभुवनस्वरूप, निराकार, गतिहीन, समस्त विकल्पोंसे रहित, बिना किसी आधार एवं आश्रयका—स्वप्रतिष्ठानस्वरूप है। यह समस्त उपाधियोंसे रहित, स्थिति, वाणी प्रभृति इन्द्रियों एव मनकी गतिसे परे, स्वभावकी भावना (अपने वास्तविक स्वरूपके चिन्तन)-द्वारा ही ग्राह्य तथा समष्टि और व्यष्टिवाचक पदोंसे भी अगम्य है ॥ ५-७ ॥ यह तेजोबिन्दु आनन्दस्वरूप, विषय-सुखोंसे परे, बड़ी कठिनाईसे साक्षात् होनेवाला, अजन्मा, अविनाशी, चित्तकी वृत्तियोंसे विनिर्मुक्त, शाश्वत, निष्कल तथा अस्खलित है। वही ब्रह्मस्वरूप है। वही अध्यात्मस्वरूप है। वही निष्ठा, परम मर्यादा और वही परम आश्रय है। वह शून्य न होनेपर भी शून्यके समान है और शून्यसे परे स्थित है। वह न ध्यान है, न ध्यान करनेवाला है और न ध्येय है; तथापि सदा ध्यान करनेयोग्य अथवा ध्येयस्वरूप ही है। वह सर्वरूप और सबसे परे है। शून्यस्वरूप है। उस परमतत्त्वसे परे कुछ भी नहीं है। वह परात्पर है। वह अचिन्त्य है। उसमें जागरण आदिका व्यापार नहीं है। उसे ज्ञानी महात्मा सत्यरूपसे ही जानते हैं। वह मुनियोंके योग्य (मुनियोंका आराध्य) तत्त्व है और देवता उसे परमतत्त्वरूप ही जानते हैं ॥८-११॥ लोभ, मोह, भय, अहङ्कार, काम और क्रोधके परायण तथा पापोंमें लगे हुए लोग, सर्दी-गर्मीके द्वन्द्वोंमें आसक्त, भूख-प्यासकी चिन्ता एव विविध सङ्कल्प-विकल्पोंमें संलग्न, ब्राह्मण (उच्च) वंशमें उत्पत्तिका गर्व रखनेवाले और मुक्ति- प्रतिपादक शास्त्रोंके केवल सङ्ग्रहमें आसक्त (केवल शास्त्र- ज्ञानी) उस तेजोबिन्दुको नहीं जान पाते। तथा वह भय, सुख-दुःख तथा मानापमानादिमें फँसे हुए लोगोंको भी नहीं प्राप्त होता। जो इन सारे (दूषित) भावोंसे छूटे हुए हैं, उन्हींके द्वारा यह परात्पर ब्रह्म प्राप्त होनेयोग्य है। उन्हींके द्वारा वह परात्पर ब्रह्म प्राप्त होनेयोग्य है ॥ १२-१३ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय तेजोविन्दूपनिषद् समाप्त ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदीय नादबिन्दूपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ॐकारकी हंसरूपमें ॐ। प्रणवरूपी हंसका अकार दक्षिण पक्ष (पाँख) और हृदयमें है, तपोलोक कण्ठदेशमें है। भौंहों और ललाटके बीचमें उकार उत्तर (बायों) पक्ष माना गया है। मकार ही उसकी पूँछ है सत्यलोक व्यवस्थित है । उपर्युक्त कथनके अनुमोदनमें तथा अर्द्धमात्रा सिर है। रजोगुण और तमोगुण उसके दोनों श्रुतिने संगतिरूपसे 'सहस्राक्ष्यम्'* यह मन्त्र प्रदर्शित किया पैर हैं और सत्त्वगुण शरीर कहलाता है। धर्म दक्षिण नेत्र है है। इस प्रकारसे वर्णित जो ॐकाररूपी हंस है, उसपर और अधर्म वाम नेत्र कहलाता है। भूलोक उसके दोनों आरूढ—उसके चिन्तनमें निमग्न हुआ हंसयोग-विचक्षण पैरोंमें है। भुवर्लोक उसके दोनों जानुओंमें है, स्वर्लोक उसके पुरुष—प्रणवकी ध्यान-विधिमें कुशल उपासक कर्मानुष्ठान कटिदेशमें है और महर्लोक नाभिदेशमें है। जनलोक उसके करते हुए कोटि-कोटि पापोंसे छूटकर बन्धन-मुक्त हो जाता है ॥ १–५ ॥ द्वितीय खण्ड ॐकारकी बारह मात्राएँ और उनमें प्राण-वियोगका फल अकार नामकी प्रथम मात्रा आग्नेयी है, अग्निमण्डल वायु उसके देवता हैं। उसके बाद मकार नामकी उत्तर-मात्रा सदृश उसका रूप है, अग्नि उसके देवता हैं। दूसरी उकार सूर्यमण्डलके सदृश है, सूर्य ही उसके देवता हैं। और चौथी नामकी मात्रा वायव्या है, वायुमण्डलसदृश रूपवाली है। अर्द्धमात्रा वारुणी है, उसके देवता वरुण हैं । उन चारों

  • पूरा मन्त्र और उसका अर्थ इस प्रकार है—'सहस्राक्ष्य विहितावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पतत स्वर्ग म् देवान् सर्वानुरस्यथदद्य सम्पश्यन् याति भुवनानि पश्य ।' अर्थात् सूर्यदेवके विचरण करनेयोग्य जो स्वर्ग—द्युलोक है, उसकी ओर उड़नेवाले श्रीविष्णुरूपी हंस (ॐकार) के दो पक्ष हैं— पूर्व और पश्चिमके आकाशस्वरूप, अकार और उकार—ये दो मात्राएँ। वह ॐकाररूप हंस सात्त्विक देवताओंको अपने सत्त्वमय हृदयमें स्थापित करके सम्पूर्ण लोकोंको प्रत्यक्ष देखता हुआ ब्रह्मलोकतक गमन करता है, उसपर आरूढ़ हुआ उपासक भी वहाँतक पहुँच जाता है।

६७० नादविन्दूपनिषद् [ अध्याय २

६७० नादविन्दूपनिषद् [ अध्याय २ मात्राओंमेंसे प्रत्येक मात्रा तीन तीन कलारूपी मुखसे सुशोभित का उत्क्रमण होनेपर वह महिमाशाली यक्ष होता है । तृतीया है । इस प्रकार द्वादशकलात्मक 'ॐकार' कहा गया है । मात्रामे विद्याधर, और चतुर्थीमे गन्धर्व होता है। यदि पञ्चमी धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा इसको जानना चाहिये । मात्रामें उसका प्राणोंसे वियोग होता है तो वह तुषित नामके उन द्वादश कलाओंमें प्रथमा मात्रा 'घोषिणी' कहलाती है, देवताओंके साथ रहता हुआ चन्द्रलोकमे सम्मानित होता है। षष्ठी द्वितीया 'विद्युन्माला', तृतीया 'पतङ्गी', चतुर्थी 'वायुवेगिनी', मात्रामें (मृत्यु होनेपर) इन्द्रका सायुज्य प्राप्त होता है । सप्तमी- पञ्चमी 'नामधेया' और षष्ठी मात्रा 'ऐन्द्री' कहलाती है । में भगवान् विष्णुक पद ( वैकुण्ठ-धाम ) को प्राप्त करता सप्तमीका नाम 'वैष्णवी' है और अष्टमी 'शाङ्करी' कहलाती है । अष्टमीमें रुद्रलोकमे जाकर पशुपति भगवान् शङ्करका है । नवमी 'महती', दशमी 'ध्रुवा', एकादशी 'मौनी' और सामीप्य लाभ करता है । नवमी मात्रामें महर्लोक, दशमी द्वादशी मात्रा 'ब्राह्मी' कहलाती है । यदि प्रथमा मात्रामें मात्रामे ध्रुवलोक, एकादशी मात्रामें तपोलोक तथा द्वादशी उपासकका प्राणान्त होता है तो वह भारतवर्षमें सार्वभौम मात्रामें प्राणका उत्क्रमण होनेपर उपासक शाश्वत ब्रह्मलोकमें चक्रवर्ती राजाके रूपमें जन्म लेता है । द्वितीया मात्रामें प्राणों- (ब्रह्माकी आयुपर्यन्त ) प्रतिष्ठित होता है ॥ १-१० ॥ तृतीय खण्ड योगयुक्त स्थितिका वर्णन इसकी अपेक्षा भी परतर—श्रेष्ठ, शुद्ध, व्यापक, निष्कल में ही आसक्त है, वह योगमार्गके द्वारा स्वस्थ होकर सब तथा कल्याणस्वरूप सदा उदित परब्रह्म-तत्त्व है; उसीसे प्रकारकी लौकिक आसक्तियोंसे मुक्त हो धीरे-धीरे शरीरमें अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि सभी प्रकारकी ज्योतियोंका उदय आत्माभिमानको त्याग दे । तब उसका संसार-बन्धन होता है । जब मन इन्द्रियातीत और सत्त्व आदि तीनों नष्ट हो जाता है; वह निर्मल, कैवल्य-प्राप्त और गुणोंके परे परतत्त्वमें लीन होता है, तब वह उपमारहित और परमात्मस्वरूप हो जाता है । और उसी ब्रह्मभावसे अभावरूप हो जाता है। उस स्थितिमें साधकको योगयुक्त परमानन्दको प्राप्त करता है, परमानन्दका उपभोग करता कहना चाहिये। जो परमात्माका भक्त है, जिसका मन परमात्मा- है ॥ १-४ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अध्याय प्रथम खण्ड ज्ञानीके लिये प्रारब्ध नहीं रह जाता हे महामते ! निरन्तर प्रयत्न करके आत्माके स्वरूपको प्रकार यह जाग्रत्-कालका शरीर भी अध्यासमात्र है । अध्यस्त जानकर उसीके चिन्तनमे अपना समय व्यतीत करो, समस्त पदार्थकी उत्पत्ति कहाँ होती है । और जिसकी उत्पत्ति नहीं प्रारब्धकर्मोंके भोगोंको भोगते हुए तुम्हे उद्विग्न नहीं होना हुई, उसकी स्थिति कहाँ । ( जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास चाहिये । आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्ध स्वयं नहीं छोड़ता। होनेपर रज्जुमें सर्प नहीं पैदा होता और न वहाँ सर्पकी परन्तु जब तत्त्वज्ञानका उदय होता है, तब ज्ञानीकी दृष्टिमे स्थिति ही होती है ।) इस प्रपञ्चका उपादान-कारण आत्मा प्रारब्धकर्मका उसी प्रकार अभाव हो जाता है, जिस प्रकार है, जिस प्रकार मिट्टीके पात्रोंका उपादान-कारण मिट्टी है । स्वप्नलोकके देहादिक असत् होनेके कारण जागनेपर नहीं वेदान्तके अनुसार यह प्रपञ्च अज्ञानके कारण आत्मामें भासता रह जाते । जन्मान्तरके लिये हुए जो कर्म हैं, वे ही प्रारब्ध है, यदि अज्ञान नष्ट हो जाय तो विश्वकी विश्वता कहाँ रहेगी। कहे गये हैं। परन्तु ज्ञानीके लिये तो जन्मान्तर भी नहीं है, जिस प्रकार भ्रमसे मनुष्य रज्जुबुद्धिका त्याग करके उसे सर्प- अत उसके लिये कभी भी प्रारब्ध नहीं रहता । जिस प्रकार बुद्धिसे ग्रहण करता है, उसी प्रकार अज्ञानी पुरुष सत्य स्वप्नकालीन देह देह नहीं होती अध्यासमात्र होती है, उसी (आत्मा)का ज्ञान न होनेके कारण प्रपञ्चको देखता है ।

खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७१ जब सामने रस्सीके टुकड़ेको अच्छी तरह पहचान लेनेपर शिवस्वरूप परमात्माका आविर्भाव होता है—ठीक वैसे ही, जैसे उसमें प्रतीत होनेवाला सर्परूप नहीं रह जाता, उसी जिस प्रकार मेघके दूर हो जानेपर सूर्यनारायण प्रकाशित हो प्रकार अधिष्ठानस्वरूप आत्माका ज्ञान होनेपर जब प्रपञ्च भी उठते हैं। योगी सिद्धासनसे बैठकर वैष्णवी मुद्रा¹ धारण करके शून्यताको प्राप्त हो जाता है, तब देह भी प्रपञ्चरूप ही दहिने कानके भीतर उठते हुए नाद ( अनाहत ध्वनि ) होनेके कारण उसके साथ ही शून्यतामें परिणत हो जाता है। को सदा सुनता रहे। इस प्रकार अभ्यासमें लाया हुआ नाद उस अवस्था मे प्रारब्धकी स्थिति कैसे रह सकती है। अज्ञानी- वाह्य ध्वनियोंको आवृत कर लेता है। इस प्रकार एक पक्ष जनोंको समझानेके लिये प्रारब्धकी बात कही जाती है। अर्थात् अकारको जीतकर दूसरे पक्ष उकारको जीते और तदनन्तर कालवश ही प्रारब्धके नष्ट हो जानेपर प्रणव और क्रमशः सम्पूर्ण प्रणवपर विजय प्राप्तकर तुर्यपद अर्थात् ब्रह्मकी एकताके चिन्तनसे नादरूपमें साक्षात् ज्योतिर्मय, आत्मसाक्षात्कारको प्राप्त होता है ॥ १-११ ॥ द्वितीय खण्ड नादके अनेक प्रकार अभ्यासके प्रारम्भमें यह नाद बहुत जोर-जोरसे और तथा नगारेकी ध्वनिके समान वह नाद सुनायी देता है और नाना प्रकारसे सुनायी देता है और अभ्यासके बढ़ जानेपर अन्तमें किङ्किणी, वंशी, वीणा तथा भ्रमरकी ध्वनिके समान वह सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर रूपमें सुनायी पड़ता है। प्रारम्भमें समुद्र, मधुर नाद सुन पड़ता है। इस प्रकार सूक्ष्म-से-सूक्ष्म होते हुए बादल, भेरी तथा झरनोंसे उत्पन्न ध्वनिके समान एव मृदङ्ग, घंटे नाना प्रकारके नाद सुनायी पड़ते हैं ॥ १-३ ॥ तृतीय खण्ड नादानुसंधान जब महान् भेरी आदिकी ध्वनि सुन पड़े, तब उसमे मन उस नादके साथ ही सहसा चिदाकाशमे विलीन हो जाता सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर नादका विचार करे—घने नादको छोड़कर है। इसलिये नाद-श्रवणसे अतिरिक्त विषयोंकी ओरसे उदासीन सूक्ष्म नादमे अथवा सूक्ष्म नादको छोड़कर घने नादमें रमते होकर सयमी पुरुष निरन्तर अभ्यासके द्वारा मनको तत्काल या जाते हुए मनको अन्यत्र न ले जाय। पहले जिस किसी अपने प्रति उत्सुक बनानेवाले नादका ही श्रवण एव चिन्तन भी सूक्ष्म या घन नादमें मन लगता है, वहीं-वहीं वह स्थिर होकर करता रहे। सारी चिन्ताओंका त्याग करके, सारी चेष्टाओंको उस नादके साथ ही विलीन हो जाता है। सारे वाह्य प्रपञ्चको छोड़कर नादका ही अनुसंधान करे; क्योंकि नादमें चित्त भूलकर दूधमें मिले हुए पानीके समान नादमे एकीभूत हुआ विलीन होता है, नादमे चित्त विलीन होता है ॥ १-५ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अध्याय प्रथम खण्ड नादके द्वारा मन कैसे वशीभूत होता है जिस प्रकार पुष्परसका पान करता हुआ भ्रमर पुष्पगन्ध- चित्तरूपी आन्तरिक सर्प नादको ग्रहण करनेपर उस सुन्दर की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार नादमें सदा आसक्त नादकी गन्धसे बँधकर तत्काल सारी चपलताओंका रहनेवाला चित्त विषयोंकी आकाङ्क्षा नहीं करता । यह परित्याग कर देता है। फिर ससारको भूलकर और १ 'अन्तर्लक्ष्य वहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता । एषा सा वैष्णवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ 'बाहरकी ओर निर्निमेष दृष्टि हो और भीतरकी ओर लक्ष्य हो—सब तन्त्रोंमें गूढ भावसे बतायी हुई वह वैष्णवी मुद्रा यही है।'

६७२ नादबिन्दूपनिषद् [ अध्याय ३

६७२ * नादबिन्दूपनिषद् * [ अध्याय ३ एकाग्र होकर इधर-उधर कहीं नहीं दौड़ता । विषयोंके यह नाद मनरूपी मृगके बाँधनेमें जालका काम करता उद्यानमे विचरनेवाले मनरूपी मतवाले हाथीको वशीभूत है । मनरूपी तरङ्गको रोकनेमे तट का काम करता करनेमे यह नादरूपी तीक्ष्ण अंकुश ही समर्थ होता है। है ॥ १-५ ॥ द्वितीय खण्ड नादमें मनका लय ' ब्रह्मस्वरूप प्रणवमें सलग्न नाद ज्योतिःस्वरूप होता है, मन भी अमन हो जाता है । सशब्द नाद अक्षर-ब्रह्ममें उँसमे मन लयको प्राप्त होता है । वही भगवान् विष्णुका क्षीण हो जाता है । उस निःशब्द नादको ही परम पद कहते परमपद है । जबतक शब्दोंका उच्चारण और श्रवण होता है, हैं। जब निरन्तर नादका अनुसन्धान करनेसे वासनाएँ तभीतक मनमे आकाशका सङ्कल्प रहता है । निःशब्द होनेपर सम्यक्रूपसे क्षीण हो जाती हैं, तब मन और प्राण निःसन्देह तो वह परम ब्रह्म परमात्मरूपमें ही अनुभूत होता है । जबतक निराकार ब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं । कोटि-कोटि नाद और नाद है, तबतक मन है । नादके सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर होनेपर कोटि-कोटि बिन्दु ब्रह्मप्रणवनादमें लीन हो जाते हैं ॥ १-५ ॥ तृतीय खण्ड मनके अमन हो जानेकी स्थितिका वर्णन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति प्रभृति सारी अवस्थाओंसे सम्यक्रूपसे त्याग कर देता है । योगीका चित्त जाग्रत्, स्वप्न, मुक्त हुआ तथा सारी चिन्ताओंको त्यागकर जो योगी सुषुप्ति आदि तीनो अवस्थाओंका कभी अनुसरण नहीं मृतवत् रहता है, वह मुक्त है—इसमें संशय नहीं है। वह करता । योगी जाग्रत् तथा स्वप्नावस्थासे मुक्त होकर अपने शङ्ख-दुन्दुभिनादको कदापि नहीं सुनता । जिसमें मन अमन स्वरूपमें अवस्थित होता है । बिना दृश्य वस्तुके ही जिसकी हो जाता है, उस अवस्थाके होनेपर मन इस देहमें दृष्टि स्थिर है, बिना प्रयत्नके ही जिसकी प्राणवायु स्थिर है, रहकर भी काष्ठवत् निश्चेष्ट प्रतीत होता है। वह न शीत बिना किसी अवलम्ब या आश्रयके ही जिसका चित्त स्थिर जानता है न उष्ण और न सुख जानता है न दुःख । न हो गया है, वह योगी ब्रह्ममय प्रणवके अन्तर्वर्ती तुरीय-तुरीय मान समझता है न अपमान । समाधिके द्वारा वह इन सबका स्वरूप नादरूपमे स्थित है । यह इतना उपनिषद् है ॥ १-५ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ ऋग्वेदीय नादबिन्दूपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यूतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अमृतनादोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रणवोपासना, योगके छः अङ्ग, प्राणायामकी विधि; योग-साधनका फल, पाँचों प्राणोंका रंग

बुद्धिमान् पुरुष शास्त्रोंका अध्ययन करके एवं बार-बार उनका अभ्यास करके ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके परम कारणभूत इस बिजलीकी चमकके समान क्षणप्रभायी जीवनको व्यर्थ नष्ट न करे । ॐकारके रथमें बैठकर और भगवान् विष्णुको सारथि बनाकर ब्रह्मलोकके यथार्थ पदका अन्वेषण करते हुए भगवान् रुद्रकी आराधनामें तत्पर होना चाहिये।* तबतक रथसे चले, जबतक रथसे चलने योग्य मार्गपर ही स्थिति हो । जब वह मार्ग पूरा हो जाता है, तब उस रथ-मार्गपर खड़े हुए रथको छोड़कर मनुष्य स्वतः आगे चला जाता है । तात्पर्य यह कि जबतक लक्ष्यकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक दृढ़तापूर्वक साधनमें संलग्न रहना चाहिये; लक्ष्य सिद्धिके पश्चात् अनावश्यक साधन स्वतः छूट जाते हैं। प्रणवकी जो अकार आदि मात्राएँ हैं, उनके लिङ्गभूत जो 'जागरितस्थान सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः' इत्यादि पद हैं, उनके आश्रयभूत विश्व, विराट् आदिके चिन्तनपूर्वक उनका त्याग करके स्वरहीन (केवल नादरूप) मकारके द्वारा उसके अर्थभूत मात्र ईश्वरका चिन्तन करनेसे साधक

  • यहाँ प्रणव तथा उसकी मात्राओंके चिन्तनकी बात कही गयी है । प्रणवकी तीन मात्राएँ हैं—अकार, उकार तथा मकार । अकार विष्णुका, उकार ब्रह्माका तथा मकार भगवान् रुद्रका वाचक है । इन तीन मात्राओंका क्रमश चिन्तन करना चाहिये । विष्णुको सारथि बनाना 'अकार' रूप प्रथम मात्राका चिन्तन करना है । ब्रह्मलोक-पदका अन्वेषण उकारका चिन्तन है और रुद्रका आराधनाका तात्पर्य मकारका चिन्तन है । उ० अ० ८५—

क्रमशः उस सूक्ष्मपद (तुरीयतत्त्व) में प्रवेश करता है, जो अकारादि स्वरों और ककारादि व्यञ्जनोंसे व्यवहृत होनेवाले सम्पूर्ण प्रपञ्चसे सर्वथा परे है । शब्द-स्पर्शादि पाँचों विषय, उन्हें ग्रहण करनेवाली इन्द्रियाँ तथा अत्यन्त चञ्चल मन--इनको सूर्यरूप अपने आत्माकी किरणोंके रूपमें देखे । अर्थात् आत्मप्रकाशसे ही मनकी सत्ता है और उसी आत्मप्रकाशकी बाह्य सत्तासे शब्दादि विषय भी सत्तावान् हैं, ऐसा चिन्तन करे । इस प्रकार अनात्मपदार्थोंकी ओरसे मन और इन्द्रियों- को समेटकर केवल आत्माके चिन्तनको 'प्रत्याहार' कहा जाता है। प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क (विचार) तथा समाधि—ये योगके छः अङ्ग बताये गये हैं ॥ १–६ ॥ जैसे पर्वतोंमें उत्पन्न स्वर्णादि धातुओंका मल उनको अग्निमें तपानेसे भस्म हो जाता है, वैसे ही इन्द्रियोंद्वारा लाये गये दोष प्राणोंके रोकने (प्राणायाम करने) से भस्म हो जाते हैं। प्राणायामके द्वारा दोषों (इन्द्रियोंमें आये हुए विकारों) को तथा धारणाके द्वारा पापों (इन्द्रिय लोलुपताके संस्कारों) को भस्म कर दे। इस प्रकार पापों तथा उनके संस्कारोंका नाश करके आराध्यके मनोहर स्वरूपका चिन्तन करे । आराध्यके उस मनोहर स्वरूपका चिन्तन करते हुए वायुको भीतर स्थिर रखना (कुम्भक करना), रेचक करना (श्वासको छोड़ना) तथा वायुको खींचना (पूरक करना)— इस प्रकार रेचक, पूरक तथा कुम्भकके रूपमें तीन प्रकारके प्राणायाम बताये गये हैं। प्राण शक्तिका विस्तार करनेवाला साधक (ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः, ॐ महः, ॐ जनः,

६७४ * अमृतनादोपनिषद् * ॐ तपः, ॐ सत्यम्-इस प्रकार) व्याहृतियों तथा प्रणव- सहित सम्पूर्ण गायत्री मन्त्रका (ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् इस) शिरोभागके साथ पूरक, कुम्भक और रेचक करते समय जब तीन-तीन बार मानस-पाठ करे, तब उसे एक 'प्राणायाम' कहते हैं ॥ ७-१० ॥ प्राणवायुको आकाशमें निकालकर हृदयको वायुशून्य एव चिन्तनशून्य करके शून्यभावमें मनको लगा दे; यह रेचक प्राणायामका लक्षण है। जैसे मनुष्य मुखसे कमल नालद्वारा धीरे-धीरे जलको खींचता है, उसी प्रकार धीरे-धीरे वायुको अपने भीतर ग्रहण करना चाहिये-यह पूरकका लक्षण है। न तो श्वासको भीतर खींचे, न बाहर ही निकाले और न शरीरको हिलाये ही-इस प्रकार प्राणवायुका निरोध करे; यह कुम्भक प्राणायामका लक्षण है ॥ ११-१३ ॥ रूपोंको अंधेके समान देखे, शब्दको बहरेके समान सुने तथा शरीरको लकड़ीके समान समझे। अर्थात् रूप, शब्द तथा शरीरके सुख दुःखादिसे तनिक भी प्रभावित न हो । यह 'प्रशान्त' का लक्षण है। बुद्धिमान् पुरुष मनको सकल्पात्मक (सङ्कल्पस्वरूप) समझकर उसे आत्मामे (बुद्धिमें) विलीन कर दे तथा उस बुद्धिको भी परमात्म- चिन्तनमे स्थापित करे-लगाये। इसीको 'धारणा' कहा गया है। शास्त्रोंके अनुकूल ऊहा (युक्तिपूर्वक विचार) 'तर्क' कहा जाता है और जिसे प्राप्त करके दूसरे समस्त प्राप्तव्योंका अपमान कर देता है-सबको तुच्छ समझ लेता है, उस स्थितिको 'समाधि' कहा जाता है ॥ १४-१६ ॥ भूमिके समान एव रमणीय तथा (अशुद्धता, विषमता, कीटादियुक्तता प्रभृति) सम्पूर्ण दोषोंसे रहित भागमें मानसिक रक्षा (दिग्बन्धादि) करके और मण्डल (यदेतन्मण्डल तपति---इत्यादि मण्डल ब्राह्मण) का जप करके पद्मासन, स्वस्तिकासन अथवा भद्रासनमेंसे किमी योगासनको भली प्रकार लगाकर उत्तरकी ओर मुख करके बैठे। फिर एक अँगुलीसे नासिकाके एक छिद्रको बद करके दूसरे खुले छिद्रसे वायुको खींचकर, दोनों नासापुटोंको बदकर उस वायुको धारण करे। उस समय तेजोमय शब्द (प्रणव) का ही चिन्तन करे। वह शब्द 'ॐकार' स्वरूप एकाक्षर ब्रह्म ही है। फिर इसी 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका ही चिन्तन करता हुआ रेचक करे-वायुको धीरे-धीरे छोड़े। इस प्रकार अनेकों बार इस प्रणवस्वरूप दिव्य-मन्त्रके द्वारा (प्राणायाम करते हुए) अपने चित्तके मलको दूर करे ॥ १७-२० ॥ इस प्रकार प्राणायामद्वारा पापराशिका नाश करके पहले बताये हुए (अकार, उकार, मकार, बिन्दु तथा नादरूप) प्रणव-मन्त्रका ध्यान करे अर्थात् प्रणवकी प्रत्येक मात्राके साथ उसके लोक, गुण एव अधिदेवताका चिन्तन करते हुए प्राणायाम करे। इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामको स्थूलाति- स्थूल मात्रा*से अधिक कभी न करे। अपनी दृष्टिको तिर्यक् (सामनेकी ओर), ऊपरकी ओर अथवा नीचेकी ओर स्थिर करके महामति (परम बुद्धिमान्) साधक स्थिरतापूर्वक स्थित होकर, निष्कम्प (अङ्गचालनहीन) रहकर तब योगका अभ्यास करे ॥ २१-२२ ॥ यह योग तालवृक्षके समान कुछ समयमे फल देनेवाला है और इसका धारण नियत योजनापूर्वक (अर्थात् जितना प्रथम प्रारम्भ करे, उसे उतना ही रक्खे या बढाता जाय; पर न तो घटाये और न मध्यमे उसका विराम करे-इस प्रकार) करनेयोग्य है। इसमे द्वादश मात्राओकी (प्रणवकी अ, उ, म तथा नादरूप चारों मात्राओंकी तीनों प्राणायामोंमे) आवृत्ति भी कालसे निश्चित कही गयी है। अर्थात् एक मात्राके लिये जितना समय दिया जाय, दूसरीके लिये भी उतना ही समय देना चाहिये। कोई मात्रा शीघ्र एवं कोई देरतक मनमे न जपी जाय ॥ २३ ॥ यह प्रणव नामक घोष बाह्य प्रयत्नसे उच्चारित होनेवाला नहीं है। यह व्यञ्जन नहीं है। स्वर भी नहीं है। कण्ठ, तालु, ओष्ठ और नासिकासे उच्चारित होनेवाला (सानुनासिक) भी नहीं है। यह रेफजातीय (अर्थात् मूर्द्धासे उच्चारित होनेवाला भी) नहीं है। दोनों ओष्ठोंके भीतर स्थित दन्तनामक स्थानसे भी इसका उच्चारण नहीं हो सकता। यह वह अक्षर है, जो कभी क्षरित (च्युत) नहीं होता अर्थात् यह नादके अव्यक्त- रूपसे नित्य प्रकृतिमे विद्यमान रहता है। कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रणवका प्राणायामके रूपमें तो उपर्युक्त प्रकारसे समयादि- सयमसे अभ्यास करना चाहिये और निरन्तर नादके रूपमें मनको उसमें लगाये रहना चाहिये ॥ २४ ॥

  • एक समय इस प्रकारके प्रणवगर्भ प्राणायामकी अस्सी आवृत्तियोंको 'स्थूल मात्रा' कहते हैं। एक बार वायु रोककर अस्सी बार प्रणवके जप करनेको 'अतिस्थूलमात्रा' प्राणायाम कहते हैं और ऐसे प्राणायामकी अस्सी बार आवृत्ति 'स्थूलातिस्थूलमात्रा' प्राणायाम है। इससे अधिक प्राण रोकना या अधिक आवृत्ति करना हानिकर है। प्राणायाम प्रात, मध्याह्न, साय एव अर्धरात्रिमैं---इस प्रकार चार बार नित्य करना चाहिये।