भारतकोश
कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

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১৮শ সর্গ ] उपायविकल्प। १२१ ताहादिगके उपेक्षा द्वारा बध करिबेन अर्थात् केह ताहादिगके बध करिले सेइ हत्याकारीके उपेक्षा करिबेन। नीतिनिपुण नरपति ऐ उपेक्षाओ प्रत्यक्षभावे करिबेन ना अर्थात् ऐ बधकारीके दण्डदिबार जन्य बाह्यिक आडम्बर देखाइया लोकके बुझिते दिबेन ना ये तिनि उपेक्षा करितेछेन ॥१४॥ [ ये सकल लोकेर प्रति सामप्रयोग करिते हइबे ताहादेर ] अन्तः- करणे प्रवेश करिया सतृष्णनयने अवलोकनपूर्व्वक अमृतक्षरणकारी प्रिय- वाक्य-स्वरूप सामप्रयोग करिबेन ॥१५॥ ये वाक्ये लोकेर उद्वेग जन्मे ना, सेइ वाक्यके साम बले। सूनृत सान्त्व ( आमि तोमारइ ) ( पाठान्तरे— सत्य ) प्रिय एवं स्तब—एइगुलिर प्रत्येकेर नाम साम [ व्याख्याकारधृत- पाठानुसारे—एतदतिरिक्त सम्बन्ध-प्रकाशक वाक्यओ साम-पदे कथित हय ] ॥१६॥ “आमि त तोमार केना” एइ भाबेइ ताहार अभिप्रेत बस्तु दान करिबे, किन्तु अलक्षितभावे जल येमन पर्व्वत मध्ये प्रवेश करिया शेषे ऐ पर्व्वतके भेद करे सेइरूप शत्रुके भेद करिबे ॥१७॥ दण्डपाणि- यमेर न्याय दुर्द्धर्ष हइया दण्डार्ह-व्यक्तिगणेर प्रति दण्डप्रयोग करिबे ; प्रत्यक्ष-बधकेओ अप्रत्यक्षेर न्याय व्यवहार करिबे ॥१८॥ विद्वान् व्यक्ति सामप्रयोग करिया कार्य्यसिद्धि करिबार जन्य मन दिया यत्न करिबे। नीतिज्ञगण सर्व्वत्रइ सामद्वारा कार्य्य-सिद्धिर प्रशंसा करेन ॥१९॥*॥ सामप्रयोग करिया देव ओ दानवगण फललाभेर जन्य क्षीर-समुद्र मथित करियाछिल। आर धृतराष्ट्रेर तनय दुर्य्योधन प्रभृति साम-विद्वेषी हइया अचिरात् [ पाण्डवहस्ते ] निहत हइयाछिल ॥२०॥ नीतिज्ञ पण्डित दारुणविग्रह दान द्वारा प्रशमित करेन, येमन इन्द्र शुक्राचार्य्येर अपचार ( अहिष्टाचार ) दानेर द्वारा प्रशमित करियाछिलेन ॥२१॥ दानवेन्द्र वृषपर्व्वार पुत्री शर्मिष्ठा अपराध करिले ( अर्थात् शुक्राचार्य्येर

  • १८, १९ श्लोक दुइटि कलिकाता संस्करणे नाइ ॥