कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ कामन्दकीय नीतिसार। रणभङ्गदायी व्यक्तिके पीड़ा दिबे ना अर्थात् উহার সহিত युद्ध करिबे ना। अल्प आयओ अधिक व्यय, इहाई क्षयेर लक्षण। इहार विपरीत अर्थात् अल्पव्यय ओ अधिक आय इहाई वृद्धिर लक्षण। कार्य्य विषये समान आय ओ समान व्यय इहा निजेर स्थितिर लक्षण। एइ दुइ विषये यदि अत्यधिक मत्तता जन्मे ताहा हइले उहा वाणिज्येर न्याय नष्ट हइया याय।) † चर द्वारा शत्रुदिगेर प्रचार अवगत हइया अप्रमत्त राजा अतिशय सावधानतार सहित उत्साहयुक्त हइया ये उपाये शत्रुबध करेन, शत्रुदिगेर निकट हइतेओ अप्रमत्त राजा ঐরূপइ स्वपक्षेर निधनेर आशङ्का करिबेन ॥७०॥ सर्व्वदाइ कूटयुद्धे शत्रु बध करिबेन। छलपूर्व्वक शत्रु-बधे अधर्म्म हय ना। देखा याय, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा विश्वस्तभावे निद्रित पाण्डव-सैन्यदिगके सुशाणित खड्गद्वारा रात्रिकाले बध करियाछिल ॥७१॥ इति कामन्दकीय नीतिसारे सैन्यबलाबल-सेनापतिप्रचार-प्रयाणव्यसनरक्षा ओ कूटयुद्ध-विकल्प- नामक उनविंश-सर्ग ॥ विंश-सर्ग। * गज-अश्व-रथ-पत्ति-कर्म्म। अभियान काले अग्रे याओया, बने ओ दुर्गे प्रवेश, रास्ता तैयारि करा, घाट तैयारि करा, जले अवतरण करा, साँतार देओया, एकाङ्ग विजय (अर्थात् एकमात्र हस्ती द्वारा विजय), अभिन्न-परसैन्येर भेद करा, छत्रभङ्ग सैन्येर संग्रह करा, विभीषिकार ध्वंस करा, प्राचीर ओ दरवाजा भाङ्गा, [गमनकाले]धन- † बन्धनीमध्यस्थ एइ आड़ाइटि श्लोक ट्राभाङ्कुर संस्करणे "धनुरेखाङ्कितानि क पुस्तके पर दृष्टान्ते" एइ नोट दिया बन्धनिर मध्ये लिखित आछे। इहा प्रकरण सिद्ध নহে। कलिकाता संस्करणे इहा उनविंश सर्ग; उहाते विंशसर्ग नाइ।