भारतकोश
कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 164 में से

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१२श सर्ग] मन्त्र-विकल्प। ८१ शुनिया निजेर इच्छाय कार्य्य करे, शत्रुगण एइ मन्त्रणा-बिच्युत राजाके अबिलम्बेइ पराजित करिया थाके ॥३२॥ मन्त्रणा उत्तमरूपे गोपने रक्षा करिबे; नरपतिदिगेर ताहाइ एकमात्र उपाय। एइ मन्त्रशक्ति प्रकाश हइया पड़िले निश्चयइ राज्येर हानि हय एबं एइ मन्त्रणा यदि गुप्त थाके ताहा हइले उत्तमरूपे राज्यरक्षा हय ॥३३॥ सिंहेर न्याय चेष्टाकारी विचक्षण व्यक्तिर अनुष्ठित कार्य्य ताँहार आत्मीयगण कार्य्यकाले बुझिते पारे एबं अपर व्यक्तिगण ঐ कार्य्य सम्पन्न हइले तबे बुझिते पारे ॥३४॥ ये मन्त्र पश्चात्तापप्रद নহে, যাহা सङ्गे सङ्गेइ फल दिया थाके, যাহা दीर्घकाल-साध्य नय एबं যাহা अभीष्ट-फल प्रदान करे—एइरूप मन्त्रइ प्रशंसार्ह बलिया स्वीकृत ॥३५॥ सकल रकम सहाय, सकल प्रकार साधनेर उपाय, देशेर विभाग ओ कालेर विभाग, एबं विपत्तिर प्रतीकार—एइ पञ्चाङ्ग मन्त्र ॥३६॥ आरब्ध कार्य्य समापन करिबे, अनारब्ध कार्य्य आरम्भ करिबे, उत्तमरूपे अनुष्ठित कार्य्य विशेषरूपे सम्पन्न करिते हइबे ॥३७॥ राजा मन्त्रविशारद मन्त्रीदिगके नानाप्रकार कार्य्ये परिचालित करिबेन। एबं मन्त्रणा-विषये सकल मन्त्रिगणेर ये मतटिर ऐक्य हइबे तदनुसारे कार्य्ये प्रवृत्त हइबेन ॥३८॥ ये मन्त्रणाय मन्त्रीरा एकमत हइयाछे, याहाते मने कोनও आशङ्का आसे ना, एबं যাহা पण्डितेरा निन्दा करेन ना, सेइ अभिप्रेत कार्य्येर अनुष्ठान करिबेन ॥३९॥ मन्त्रज्ञ-व्यक्तिगणेर मन्त्रणाय अवधारित हइलेও स्वयं पुनःराय তাহার विचार करिबेन एबं याहाते स्वार्थेर हानि ना घटे मन्त्रणाकुशल राजा ताहाइ करिबेन ॥४०॥ स्वार्थतत्पर मन्त्रीगण दीर्घकालव्यापी विग्रह- कामना करेन। दीर्घकालव्यापी विग्रहे नरपति व्याकुल हन, तबन ঐ नरपति अमात्यगणेर भोग्य हन अर्थात् तबन राजा मन्त्रीगणेरइ बशे आसिया पड़ेन ॥४१॥ मनेर प्रसन्नता श्रद्धा बुद्धि ओ कर्म्मेन्द्रिय प्रभृतिर स्व स्व विषय सम्पादन सामर्थ्य, सहायसम्पन्नता ओ उद्योग—एइगुलि आरब्ध कार्य्येर सिद्धिर लक्षण अर्थात् ये कार्य्येर आरम्भे एइगुलि प्रकाश पाय सेइ कार्य्य

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