भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 549 में से

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पृष्ठ 143

बालकाण्ड १३१

उत्तरोत्तर उमड़ते हुए प्रेमवाली एक (सुन्दरी) अपने प्राण-समान प्रियतम के व्यापारों के बारे में, सुरभित पुष्पहार धारण करनेवाली एक अन्य स्त्री से कहना चाहती थी, किन्तु लज्जा के कारण वैसा न करके कुछ असंबद्ध वचन कहकर रह गई।

प्रेमी और प्रेयसी परस्पर इस प्रकार गाढ आलिंगन में बँध गये। (यह दृश्य) ऐसा लगता था कि इनके मन एक ही प्रकृति के हैं, प्राण भी एक ही हैं, परस्पर का प्रेम भी एक समान है; अब इनके शरीर भी एक होकर रह गये।

बाँस के जैसे कंधोंवाली एक (रमणी) का मन, उसके प्रभु के सामने आकर उपस्थित होते ही आगे बढकर उसके पास पहुँच गया, किन्तु वह अपने चन्द्र-वदन को झुकाये खड़ी रही। उसका वैसा मुँह झुका लेना, उस पुरुष के लिए नया था, अतः उसके मन में कुछ आशंका उत्पन्न हुई।¹

बंकिम ललाटवाली एक (तरुणी) मान करने का आनन्द उठाना चाहती थी, (किन्तु पहले अपने पति से रूठकर उसके चले जाने के पश्चात्) वियोग से व्याकुल हो उठी। (प्रियतम को लाने जाकर भी) उस प्रियतम को लिये बिना ही अकेली लौटी हुई सखी, मधुर मंदानिल तथा रजनी-वेला के जैसे ही उसकी माता की समानता करने लगी। (अर्थात् वह सखी, नायिका को मंदानिल, रात्रि तथा माता के समान धिक्कारने लगी।)

(अपने प्रियतम पर) दृढ प्रेमवाली एक (बाला) ने अपने पति के निकट भेजी गई दूती के साथ ही अपनी प्रज्ञा को भी भेज दिया और टकटकी लगाये देखती खड़ी रही और (दूसरों की) कही बात को भी समझ नहीं सकी। वह इस प्रकार थी, मानो मध्या के समय किसी देवता का उसपर आवेश हो गया हो।

(एक रमणी) अपने प्रियतम को भूल नहीं पाती थी। उसके आगमन की प्रतीक्षा करती हुई, पुष्पित शाखा-सदृश उस बाला के मन की यह दशा हुई, मानो जन्म के साथ-साथ मृत्यु भी आ गई हो। (अर्थात्, उसके मन में आनन्द और दुःख दोनों के भाव आते-जाते रहते थे।) एक क्षण के लिए वह अपने घर से बाहर निकल आती और दूसरे ही क्षण घर के भीतर चली जाती, जैसे बादल के बीच में बिजली चमक-चमककर छिप जाती हो।

(एक तरुणी) वर्णन के लिए दुष्कर स्तनों पर मन्मथ के शरों के लगने से उत्पन्न तीक्ष्ण व्रणों पर वलय-भूषित हस्त रखकर दबाती, रोती, हँसती और अपने दुःख बताती हुई किसी नारी के पास जाकर उससे दूती बनने की प्रार्थना करने लगती।

एक नारी, यह सोचकर कि जो लोग हृदय में उत्पन्न हुई पीड़ा (विरह दुःख) की तथा उसके अभावों को पहले से जानते हैं और उन्हें शब्दों में बताना आवश्यक नहीं है, शरीर से स्वेद बहाने लगी, मन में उद्विग्न हो उठी, म्लान हुई और (शय्या पर) लुढ़क गई, फिर अपनी सखी की ओर निहारने लगी।

स्तनवती तरुणियों की अपेक्षा तीनगुणा अधिक आनन्दित हो, मन्मथ उन स्थानों


¹ इसका तात्पर्य यह है—नायिका के मन में मान उत्पन्न हुआ है, इस विचार से नायक आशंकित हुआ है।

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