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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 549 में से

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पृष्ठ 144

१३२ कंब रामायण

में विचरण करने लगा। कदाचित् उसने भी, चोर के जैसे उन नर-नारियों के मन में घुसकर उनके पिये हुए मद्य का पान किया होगा।

मधु-गंध से भरे विस्फारित पुष्प-हारों से अलंकृत शिखावाले युवकों ने रति-कला-चतुर तरुणियों के वस्त्रों को उतारकर फेंक दिया। फिर, भरे हुए विशाल जघन की मेखला को भी अनादर के साथ दूर उठाकर फेंक दिया। जब अप्रकटनीय रहस्य-कृत्य होते हैं, तब पटहवाद्य १ के जैसे वाचाल लोगों को साथ रखना उचित नहीं।

स्वर्ण की मनोहर मेखला तथा वस्त्र इन दोनों बाह्य वस्तुओं को (किसी स्त्री ने) हटा दिया, इसमे आश्चर्य की क्या बात है ? क्योकि सुन्दर ललाटवाली उस (तरुणी) ने अपने अन्तरंग में स्थित लज्जा को भी दूर कर दिया था। अनिर्वचनीय वैराग्य से युक्त दृढचित्त (सन्यासी) के समान ही अपने (अहं) को दूर करने की प्रवृत्ति काम में भी होती है न ?

अनुपम मन्मथ-समान एक पुरुष तथा पुष्प पर आसीन लक्ष्मी के उपमान बनने योग्य एक तरुणी—दोनों अनंग-समर में किसी से कोई हारनेवाले नहीं थे। जब उन दोनों के प्राण एक हैं और भाव (प्रज्ञा) भी एक है, तब कौन किसको जीते ?

(प्राण) हरण करनेवाले, युद्ध में प्रयुक्त होनेवाले खड्ग-समान नयनोंवाली एक प्रगल्भा ने, कार्त्तिकेय के समान अपने सुन्दर पति को, घने पुष्पहारों से भूषित वक्ष को, अपने कर-कमलों से ढकते हुए देखा और क्रुद्ध होकर कह उठी—तुम अपने मन में स्थित प्राण-समान अपनी (एक दूसरी) प्रियतमा पर पदाघात होने की आशंका से कपट करते हुए अपनी छाती को ढक रहे हो।

दूध के स्वाद और प्रवाल के रंग से युक्त अधर, उभरे हुए उरोज, परस्पर समवृत्त कंधे, शूल-सदृश नेत्र—इनसे शोभायमान एक मृदंगी ने, समुद्र के जैसे प्रेम से भरे चित्त तथा मेघ-सदृश दीर्घ बाहुवाले एक युवक को ऐसा प्रेम-सुख दिया, मानो वह कोई अप्सरा ही हो।

किसी पर्वतोद्यान के मयूर की समानता करनेवाली एक (रमणी) अपने प्रियतम के (पहले कभी कहे हुए) झूठे वचनों को स्मरण कर मान करने लगी, किन्तु उसके उस मान के साथ प्रेम का जो युद्ध हुआ, उसमें प्रेम ही विजयी हुआ।

एक प्रमदा ने, जिसके नेत्र हत्या के ही स्वरूप थे और जिसका नितंब मेखला के घेरे को भी भेदकर निकल पड़ता था, अपने प्रियतम का गाढ आलिंगन करके उसकी पीठ की ओर यह सोचती हुई देखा कि कदाचित् उसके स्तन, पर्वत को परास्त करनेवाले पति के दृढ वक्ष को भी चीरकर बाहर न निकल आये हों।

युवतियों के नव आनन्द को युवकजन अनुभव करने लगे, कुंकुम-लेप झर पडे, कुंतल-बंध खिसक पडे, शंख-वलय बज उठे, मेखलाएँ (या नीवी-बंधन) ढीले पड गये, नूपुर बहुत अधिक कोलाहल मचाने लगे।


१ पटहवाद्य = एक प्रकार का ढोल ।