कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १३३
प्रेम ने दुःखदायक मान को इस प्रकार हटा दिया, जिस प्रकार किरण-युक्त सूर्य ओस को हटा देता है। तब आभरण-भूषित मयूर की छटावाली एक (तरुणी) ने उतावलेपन के साथ निद्रा का बहाना करती हुई स्वप्न के व्याज से अपने पति का आलिंगन कर लिया।
वर्तुल, कान्तिपूर्ण मुखवाली एक मयूर (-समान स्त्री) तथा उसके पुरुष—दोनो ने, परस्पर समीप आने पर एक दूसरे को आलिंगन पास में बाँध लिया। फिर एकीभूत शरीरो को अलग न जानने के कारण उन्होने एक दूसरे को छोड़ा नहीं। उधर रजनी-वेला जो बीत गई, उसे भी पहचाना नहीं।
अपूर्व उमंग से भरे मत्तगज-सदृश पुरुषो तथा काले कुंतलोवाली रमणियो के उस समर मे वह रात उसी प्रकार कट गई, जिस प्रकार परस्पर संघट्टमान पीन स्तन-युग का भार न सहन कर कटि कट जाति है (क्षीण हो जाती है)।
पुण्य-कर्म पूरा न करनेवाले व्यक्तियो की मध्यकाल में प्राप्त संपत्ति के समान ही चन्द्र अस्त हुआ। विशाल वीचियो से पूर्ण नील समुद्र में सूर्य उसी प्रकार प्रज्वलित हो उदित हुआ, जिस प्रकार परम पुरुष (नारायण) के वक्ष पर प्रकाशमान (कौस्तुभ) रत्न हो।
(१-६७)
अध्याय १८
अग्रयान (अगवानी) पटल
महाराज दशरथ—जो अनुचित मार्गों का कभी अवलम्बन न करनेवाले, अपूर्व वेदो मे प्रतिपादित नीति का कभी त्याग न करनेवाले, सच्चरित्र, उत्कृष्ट ज्ञानी, उत्तम शासक, श्वेत छत्र से युक्त तथा राजाओ के अधिराज थे—अपनी उम (सेना) वाहिनी के साथ गंगा नदी के किनारे जा पहुँचे, जिसमें मुखपट्ट-सहित हाथी के समान पर्वतो से निकलनेवाली, तथा वर्षाकालीन प्रवाह की जैसी बहनेवाली मद-जल की नदियाँ जाकर गिरती रहती हैं।
जब बाण आदि आयुधो-सहित उस सेना-वाहिनी ने अधिक मात्रा मे जल का पान किया, तब उस गंगा नदी का—जिसकी रेत इतनी स्वच्छ थी कि फटी हुई जीभवाले नागो का लोक (पाताल) भी दृष्टिगत होता था—जल बहुत कम हो गया। उस समय लवण-समुद्र भी उस (गंगा के) स्वच्छ जल की प्यास से व्याकुल हो उठा। (अर्थात्, सेना के पीने पर गंगा इतनी कृश हो गई कि समुद्र तक उसकी धारा न पहुँच सकी। इसलिए समुद्र उसकी प्यास से व्याकुल हो गया।)
विस्तृत पृथ्वी के शासक (दशरथ) उस स्थान से चलकर विशाल खेतो से घिरी हुई और अत्यन्त जल की समृद्धि से युक्त मिथिला नामक नगरी के निकट जा पहुँचे। उस समय खुर फाँदनेवाले घोड़ो की सेना तथा शीतल करुणा से युक्त, स्तम्भ-समान अतिदृढ भुजावाले (राजा) ने जो किया, उसका वर्णन आगे करेंगे।