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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

१३४ | कंब रामायण

'(दशरथ) महाराज आ पहुँचे हे'— यह समाचार पाकर मन मे उमडती उमंग के साथ, आलान-स्तम्भो को तोड़ देनेवाले मत्तगज, रथ, लगाम-लगे घोडे—इनके समुद्र से घिरे हुए ( जनक ) महाराज, देवेन्द्र के वैभववाले दशरथ की अगवानी करने के लिए उठ आये, जैसे चन्द्रमा सूर्य के निकट आ रहा हो ।

गंगाजल से सिक्त ( कोशल ) देश के अधिप ( दशरथ ) की सेनाएँ ( मिथिला नगरी के पास ) इस प्रकार आ पहुँची, जिस प्रकार अन्य सब समुद्र, अपने-अपने शंखो के घोष करते हुए ( क्षीर सागर के पास ) आ पहुँचे हो । उस समय, उत्तम कन्या ( सीता ) को ( अपनी पुत्री के रूप में ) पाये हुए ( जनक ) महाराज की समृद्ध नगरी ( की प्रजा ) इस प्रकार स्वागत के लिए आई, मानो पकज पर आसीन लक्ष्मी को जन्म देनेवाला क्षीर-समुद्र ( अन्य समुद्रो का स्वागत करने के लिए ) आया हो ।

मकर-मीनो से भरे हुए सात सख्यावाले विशाल महासमुद्र ( सातो समुद्र ) यदि अनन्त महागजों, रथो, घोड़ो तथा पदातियो का रूप लेकर ससार-भर मे उमड़ते हुए फैले, तो वे ( आम के ) पत्ते-जैसे शूल को धारण करनेवाले ( दशरथ ) की सेना का उपमान हो सकते हैं ।

झालरो से अलंकृत श्वेत छत्रो तथा मयूर-पखो के घने गुच्छो से आकाश ढक गया , उससे सूर्य का प्रकाश छिप गया और अधेरा छा गया । वह सेना कमल-पुष्पो के अरुण वर्ण तथा श्वेत वर्ण से युक्त सरोवर के ही समान दीखती थी ।

कमलवासिनी लक्ष्मी, प्रख्यात तथा तद्राह्रीन शासक ( दशरथ ) की ध्वजा मे स्थित है या उनके अनुपम श्वेत छत्र मे , उनके परम्परा में स्थित है या समुद्र के जैसे विस्तृत उस सेना के मध्य मे , उनके वक्ष पर स्थित है या उनके ऊँचे किरीट मे—वह कहाँ स्थित है, हम यह पहचान नही पा रहे हैं ।

(उस सेना मे होनेवाले) सप्तस्वरो का नाद, कचुकाबद्ध उभरे स्तनोवाली नारियो के केशो मे स्थित भ्रमरी के नाद के सदृश था । रथो का शब्द, श्वेत तरंगो से भरे समुद्रो के गर्जन के समान था । भयकर हाथियो का गर्जन, वर्षाकालिक मेघो के गर्जन के समान था ।

( उस सेना के चलने से उठी हुई ) धूल इस प्रकार फैली कि चारो ओर फैले हुए समुद्र को पाटकर टीले बनाती हुई, ऊपर के सात लोको मे भी भर गई । इसमे आश्चर्य की क्या बात है ? लोको को नापते समय चक्रधारी के चरण से अन्तरिक्ष में जो छेद हो गया था, उसी छेद के द्वारा धूल ऊपर के सात लोको में ही क्या, ब्रह्माण्ड के परे भी तो पहुँच गई ।

( उस सेना के ) दीर्घ छत्रो के सटे रहने से आकाश ढक गया और उनकी छाया से अँधेरा फैल गया , किन्तु उसे दूर करना भी सुलभ ही था । ( क्योकि ) उन पृथ्वी-वासियो के सुन्दर रत्नखचित स्वर्णाभरण बिजली की कान्ति विखेरते थे, इन्द्र-धनुष की कान्ति बिखेरते थे, सूर्यातप की कान्ति विखेरते थे ओर चन्द्रिका की कान्ति भी बिखेरते थे ।

निष्कलंक राजाधिराज ( दशरथ ) के आगमन पर उनका स्वागत करने के लिए बलशाली तथा चतुर धनुर्धर जनक महाराज आगे बढे । उनके मार्ग मे जो धूल उठी,