कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १३५
वह लोगो से बिखेरे जानेवाले सुगन्ध-चूर्ण, ( आभरणो से गिरी हुई ) स्वर्ण-रज तथा पुष्पो के मकरंद की ही धूल थी ।
( राजा जनक के ) मार्ग मे स्थान-स्थान पर जो कीचड़ फैला था, वह वास्तव मे सुगन्धित मधु ( जो नर-नारियो के धारण किये पुष्पो से वहा था ), कस्तूरी ( जो रमणियो के केशो से गिरी थी ), सुवासित केसर-पुष्प तथा अगरु-काष्ठ को मिलाकर बनाया गया लेप, कस्तूरी तथा अन्य सुगन्ध-द्रव्यो से सयुक्त चन्दन आदि के मिलने से ही उत्पन्न हुआ था ।
(राजा जनक के) उस मार्ग मे जो छाया पड़ रही थी, वह जयसूचक ध्वजाओ तथा ऊँचे वितानो से संयुक्त श्वेत छत्रो की ही छाया थी, जिसपर सुवासित मनोहर कुतलवती नारियो के रत्नखचित स्वर्णाभरणो की उज्ज्वल कान्ति भी छिटककर अपूर्व रमणीयता उत्पन्न कर रही थी ।
सामने से आती हुई अनुपम बलशाली ( दशरथ ) की बड़ी सेना के साथ, अधिकाधिक बढ़ते हुए आनन्द से युक्त ( जनक ) की सेना जा मिली । उस समय ऐसा बड़ा ( आनन्द ) घोष उठा, जैसा अनन्त गर्जन से भरे तरंगित समुद्र में नदी के गिरने से उत्पन्न होता है ।
आलान-स्तम्भो को भी तोड़ देनेवाले हाथियो की सेनायुक्त जनक, उमग से प्रेरित होकर अवर्णनीय सद्गुणशाली तथा प्रजा के लिए पिता समान उस चक्रवर्त्ती ( दशरथ ) के सम्मुख अपने उदार मन की समता करनेवाले बड़े रथ मे आ पहुँचे ।
( दशरथ ) के निकट पहुँचते ही, जनक महराज अपने बड़े रथ से उतर पड़े और अपने विशाल तथा सुन्दर सेना को पीछे ही छोड़कर, आगे बढ़े । ( दशरथ ने ) उन्हे रथ पर चढ़ने का संकेत किया । उस सकेत को पाकर वे सत्वर उनके रथ पर आरूढ हो गये, तब उस चक्रवर्त्ती ने मन मे प्रमोद तथा मुख पर प्रफुल्लता के साथ ( जनक का ) आलिंगन कर लिया ।
व्याघ्र से स्वागत पाये हुए सिंह के सदृश, सर्वोच्च महाराज दशरथ ने ( जनक का ) आलिंगन करके, उनके विशाल बन्धु-वर्ग और उनके अन्य परिवार के लोगो का कुशल निष्कलंक चित्त से यथाक्रम पूछा । फिर (जनक से) यह कहकर कि आप आगे बढ़े , उनके साथ ही ( मिथिला मे ) आ पहुँचे ।
इस प्रकार, उन दोनो ने बड़े मनोहर ढंग से ( मिथिला नगर मे ) प्रवेश किया . तब उस विशाल मिथिला नगर से उनके सम्मुख ( स्वागतार्थ ) स्वय अपने ही उपमान बने हुए, ( रामचन्द्र ) आये, जिन्होने अपनी भुजाओ को फुलाकर अग्नि-तुल्य ( रुद्र ) के स्वर्ण धनुष को तोड़ डाला था ।
देवो, मर्त्यो तथा नागो से वंदित होते हुए, घनी बलिष्ठ अश्व-सेना और अन्य योद्धाओ से घिरे हुए, पुरुषोत्तम ( रामचन्द्र ), अपने भाई को साथ लिये, उस असंख्य सेनावाले (जनक) की नगरी से, हरे रत्नखचित स्वर्ण-रथ पर आरूढ होकर सम्मुख आ पहुँचे ।
जब दोनो योद्धा ( राम और लक्ष्मण ) अपने उत्तम पिता के सम्मुख आये, तब उनके साथ, श्रेष्ठ सेनानी जनक की आज्ञा से जो सेना आई थी, उसमे कितने हाथी,