भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148
६३६कंब रामायण

कितने रथ, कितने अश्व और कितनी हथिनियाँ थीं, इनकी गणना कौन कर सकता था ? वास्तव में उनकी गणना करनेवाले तथा उस गणना के उपयुक्त अंक जाननेवाले कौन हैं ?

नीलोत्पल, कुवलय तथा सुगन्धित अतसी पुष्प की सदृशता करनेवाले, चित्र की प्रतिमा को भी लजानेवाले अनुपम रूप-विशिष्ट तथा देवों के द्वारा वंदित चरणवाले वे कुमार (राम) चक्रवर्त्ती के निकट यों आ पहुँचे, जैसे शरीर से पूर्व निकला हुआ प्राण फिर उसमें आ मिले।

सेनाओं के द्वारा अपनी चरण-वन्दना के उपरांत, (श्रीराम ने) त्वरित गति से जाकर चक्रवर्त्ती (दशरथ) के मनोहर, स्वर्ण-वलय-भूषित चरणों की वन्दना की। उनके (वन्दना करके) उठते ही, चक्रवर्त्ती ने उन्हें आलिंगन में बाँध लिया। उस समय मनु की-सी गरिमा भरे (चक्रवर्त्ती) की छाती के बीच, पर्वत-सदृश विलक्षण (शिव) धनुष को तोड़नेवाले दो बड़े पर्वत (अर्थात् राम की भुजाएँ) छिप गये।

दुर्निवार (शंबर आदि असुरों के द्वारा उत्पन्न) विपदाओं को भी दूर करने के कारण गगन तथा अष्ट दिशाओं में व्याप्त यशवाले सबसे श्रेष्ठ उस चक्रवर्त्ती ने फिर कनक वर्णवाले कनिष्ठ कुमार (लक्ष्मण) के अपनी चरण-वंदना करते ही उसे उठाकर पुष्पमालाओं से अलंकृत अपनी छाती से लगा लिया।

घनी तथा दीर्घ जटावाले (शिव) के हाथ के धनुष को जिनकी विजयप्रद दीर्घ भुजाओं ने तोड़ा था, वे उत्तम कुमार (राम) फिर अपनी जननी तथा अन्य माताओं को उसी प्रकार (अर्थात्, जिस प्रकार दशरथ को किया था) प्रणाम कर खड़े हुए। उस समय उन माताओं के हृदय में जो उमंगें उमड़ पड़ीं, उनका वर्णन कौन कर सकता है ?

ध्यान-युक्त अपनी चरण-वन्दना करके खड़े हुए उस भरत को, जिसके उज्ज्वल नेत्रों से (आनन्द) अश्रु की धारा इस प्रकार बह रही थी, मानो उसके हृदय में स्थित (राम के प्रति) सतत ध्यानयुक्त अपार प्रेम ही उमड़ रहा हो, (श्रीराम ने) प्राणों में प्राण मिलाते हुए स्वर्णाभरणों से भूषित अपने वक्ष से लगा लिया, जिस प्रकार पहले दशरथ चक्रवर्त्ती ने उन्हें आलिंगन में बाँध लिया था।

श्यामल (राम) का अनुसरण करते हुए चलनेवाले (लक्ष्मण) तथा अपूर्व प्रेम में उत्कृष्ट (भरत) के अनुज (शत्रुघ्न) अपने सुन्दर सुवासित केशवाले शिर से दोनों के वीर-वलय-भूषित चरणों का (अर्थात्, क्रमशः भरत और राम के चरणों का) स्पर्श किया।

उत्तम राजनीति तथा शासन में करुण-दृष्टि—ये दोनों ही जिनकी संपत्ति हैं, ऐसे महाराज दशरथ के सदृश ही उत्तम शील-गुणसंपन्न वे चारों कुमार, वेद-प्रतिपादित धर्मों का अनुसरण करते हुए चार वेदों के जैसे ही थे।

उन चक्रवर्ती ने जिनका वेत्रदंड सबका साक्षी कहलाने योग्य था (अर्थात्, पक्षपातहीन शासन करते थे) तथा जिनको सभी लोग अपनी-अपनी जननी ही मानते थे, (अर्थात्, प्रजा पर मातृतुल्य करुणा करनेवाले थे) अपने कुमार (राम) को आदेश दिया कि इस सारे (छत्र, चामर आदि) वैभव को साथ लेकर तुम आगे बढ़ो।

हाथी-जैसे वीर सैनिकों का (उन चारों कुमारों के प्रति) जो प्रेम था, उसको