भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

बालकाण्ड १२७

हम ठीक-ठीक आँक नहीं सकते। उस समय उन योद्धाओं का जो स्वच्छ आनन्द था, वह कम था या उससे बढ़कर और कोई आनन्द हो भी सकता है, यह भी हम नहीं जानते। (हम इतना ही जानते हैं कि) पुष्पालंकृत केशवाले उन चारों कुमारों के अपने निकट आते ही, उस सेना की दशा उनके पिता (दशरथ) की जैसी ही हो गई।

राम के दोनों पार्श्वों में उनके प्यारे भाई, सेवा में निरन्तर निरत होकर, कभी कम न होनेवाले आनन्द के साथ, विजयशील अश्वों पर आरूढ हो आ रहे थे। उनके चलते समय शंखध्वनि के साथ बड़े-बड़े नगाड़े भी बज रहे थे. इस प्रकार (श्रीरामचन्द्र) अति उन्नत रथ पर आरूढ हो चले।

(रामचन्द्र) प्राचीरों से आवृत मिथिला नगर की विशाल वीथियों में जा पहुँचे, जहाँ महावर-लगे मृदु पदवाली, प्रतिमा-समान सुन्दरियों का समूह चारों ओर मेघावृत ऊँची अट्टालिकाओं पर निरंतर पंक्तियों में एकत्र था तथा अपने विष-भरे नयनों से (राम पर) पुष्प-वर्षा कर रहा था।

वे सुन्दर प्रासाद, जहाँ (नारियों के) करों के कंकण बज रहे थे, केशपाश शिथिल हो खिसक रहे थे, रक्तकमल से कोमल पदों के 'पाटक' नामक आभरण भरत (भरत-नाट्य-शास्त्र में प्रतिपादित ताल) को निरूपित कर रहे थे। कहीं नृत्यशालाएँ तो नहीं थीं, जिनमें ऐसी सुन्दरियाँ नृत्य करती हों, जिनके स्तन मदोष्ण कुंभोंवाले गजों के (ऊपर उठे हुए) दाँतों को परास्त करनेवाले थे।

उस आदिदेव (अर्थात्, विष्णु के अवतारभूत राम) के निकट आने पर मन्मथ के वाणों से प्रेरित होकर, वहाँ आई हुई मनोहर कुंतलोंवाली नारियों—बालाओं से वृद्धाओं तक—की क्या दशा हुई, उसका वर्णन करेंगे। (१-३४)


अध्याय १६

वीथी-विहार पटल

पुष्प (मधु) से आर्द्र केशोंवाली अनेक स्त्रियाँ सर्वत्र त्वरित गति से आ एकत्र हुईं। उस समय उनके पुष्पों में स्थित भ्रमर गुंजार कर रहे थे, नूपुर आदि पादाभरण शब्द कर रहे थे, उनका आना वैसा ही था, जैसे हरिणियाँ आ रही हों, मयूर-गण संचरण कर रहे हों, नक्षत्र-गण चमक रहे हों या बिजलियाँ एकत्र हो गई हों।

दुर्लभ आभरणों से अलंकृत नारियाँ, बंधन से छूटकर गिरनेवाले अपने केशों की ओर ध्यान नहीं देती थीं; मेखलाओं का टूट-टूटकर गिरना भी नहीं देखती थीं; खिसकनेवाले पुष्प-समान अपने झीने वस्त्रों को भी नहीं सँभालती थीं, उनकी कटि लड़खड़ाती थी, इस प्रकार एक दूसरे से 'हटो, हटो' कहती हुई मधुपान करनेवाले भ्रमरों के समान वे स्त्रियाँ घिर आईं।