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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 150

१३८ कम्ब रामायण

नयनों से प्रेम नामक पदार्थ को ही (अर्थात् साकार प्रेम को ही) (राम के रूप में) हम देख रही हैं। इस स्त्री-जन्म के फल को आज ही प्राप्त कर रही हैं यह सोचती हुई वे नारियाँ इस प्रकार आई जिस प्रकार हरिणों के झुंड, सारी पृथ्वी का पानी सूख जाने तथा आकाश से वर्षा के भी न होने पर, किसी स्थान पर पीने योग्य जल देखकर प्रेम से आ जुटे हों।

निम्न स्थल की ओर बह जानेवाली जलधारा के समान नील कुवलय-तुल्य तथा समुद्र से भी विशाल नेत्रवाली वे स्त्रियाँ वहाँ आईं। उस समय उनके मञ्जुल नूपुर शब्द कर रहे थे, मृदुल पुष्पहार हिल रहे थे, उनकी सूक्ष्म कटि दुख रही थी। वे इस प्रकार दौड़ीं मानों वे अपने मन को जो राम के पास चला गया था, पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ी आ रही हों।

'रत्नवर्ण को इसने निगल लिया है'—(दर्शकों में) ऐसा भाव उत्पन्न करनेवाले तथा अहल्या को आनन्द देनेवाले पद-द्वय और सुवासित केशोंवाली सीता को प्राप्त करने के लिए शिवधनुष को तोड़नेवाली फूली हुई भुजाएँ—उन्हें देखने के लिए उस राज-वीथी में जो नारियाँ एकत्र हुईं, वे ऐसी लगती थीं कि मधुमक्खियाँ शोर मचाती हुई अमृत पर घिर आई हों।

वे (रामचन्द्र) प्रकट रूप में तो वीथी में जा रहे थे; पर वस्तुतः वे ऐसे घोडे जुते हुए रथ में जा रहे थे, जो निर्निमेष खड़ी रहनेवाली उन नारियों के नेत्रों से फाँद जाते थे। अब उन्होंने सब लोगों को यह भली भाँति जता दिया कि महान् लोग उन्हें 'कण्णन्'¹ क्यों कहते हैं।

वे नारियाँ यह सोचकर (प्रेम की) वेदना से भी पीडित होती थीं कि हाय! इन (राम) का रथ अब मन से भी अधिक वेग से दौड़ता चला जा रहा है। (कवि कहता है कि) पृथ्वी से भी परे जाकर स्वर्ग को पार करनेवाले (अर्थात्, त्रिविक्रमावतार में त्रिभुवन को नापनेवाले उस राम) को जिस सुन्दरी ने अपने दृष्टि-पथ में ही बिठा लिया है, वही धन्य है।

एक सुन्दरी सिहरन, संकोच, शरीर का बल, शंख-वलय आदि को तथा अपना मन, प्रज्ञा, तेज, लज्जा, मुग्धता, संयम आदि अच्छे गुणों को—अपने प्राणों के अतिरिक्त अन्य सभी महिलोचित गुणों का त्याग कर खड़ी रही।

(किसी नारी के) कर्णाभरण पर संचरण करनेवाले मीन-सदृश नयनों से वर्षा के सदृश अश्रु-धारा बह रही थी। वह ऐसे जुड़े हुए स्तनों से सुशोभित थी, जिनके मध्य में एक धागा भी नहीं जा सकता था और जो मन्मथ के इक्षुधनुष के बाणों से विद्धत थे।


१ 'कण्णन' यह तमिल शब्द संस्कृत शब्द 'कृष्ण' का ही रूपान्तर है। किन्तु, इस तमिल शब्द के तमिल भाषा की प्रकृति के अनुकूल अन्य भी कई प्रकार के अर्थ हो सकते हैं। उस शब्द का अर्थ तमिल में नेत्र होता है। इसलिए कण्णन का एक अर्थ है 'कृपादृष्टिवाला', दूसरा अर्थ है 'सब की आँखों का तारा'।

इस प्रसंग में 'कण्णन' शब्द के एक तीसरे अर्थ की ओर संकेत है, वह है—'नेत्र-मार्ग से (हृदय में) पहुंचनेवाला'। इस प्रसंग में इस ग्रंथ में भी यह शब्द व्यवहृत हुआ है।