कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १३६
वह (नारी) शिथिल हो इस प्रकार कुम्हलाई हुई काँपती खड़ी रही, जिस प्रकार उसकी बिजली समान कटि काँप रही थी ।
रूई जैसी मृदु उँगलियोंवाली उन (रमणियो) के भाले जैसे दीर्घ नयनो ने अपने प्रभु (राम) के शरीर की कालिमा को प्राप्त किया था, या मेघ-समान शरीरवाले उस (राम) का वर्ण उन नारियो के अंजनाञ्चित नयनों के द्वारा देखे जाने के कारण ही उस प्रकार (काला) हो गया था ? हमको कुछ निश्चित रूप से विदित नही हुआ ।
आम के पल्लव-समान (अरुण) शरीरवाली तथा उज्ज्वल ललाटवाली एक सुन्दरी मन्मथ को सर्वत्र पुष्प-बाणो की वर्षा करते हुए देखकर कह उठी—यह कौन है, जो चक्रवर्त्ती (दशरथ) की आज्ञा का तथा इस वीर (राम) के धनुश्चातुर्य का भी निरादर करता हुआ, आभरण-भूषित अवलाओ पर बाणो का प्रहार कर रहा है ?
लक्ष्मी की समता करनेवाली एक नारी, जिसके आभरण खिसककर गिर गये थे, और जो अपने शरीर को भी सँभाल नही पा रही थी, एक वस्त्र को ही पकडे हुए इस प्रकार (राम के प्रेम में मग्न हो) खड़ी थी, मानो अपूर्व सौंदर्य को भली भाँति पहचाननेवाले किसी चित्रकार ने, शब्दों से अतीत तथा सभी प्रकार के ऐन्द्रिय अनुभवो से श्रेष्ठ कामानुभव को एक स्त्री के रूप मे चित्रित कर दिया हो ।
प्राणहर शूल-सदृश तथा यम की समता करनेवाले नेत्रोवाली मयूर-तुल्य एक (सुन्दरी) इस प्रकार खड़ी थी कि उसकी धनुष जैसी भौंहो और ललाट से स्वेद बह रहा था, सारे शरीर में पीलापन छा गया था, मन शिथिल हो गया था, वह राम के अतिरिक्त अन्य किसी को नही देख पाती थी, इसलिए बोल उठी—‘क्या मेरे प्रभु अकेले ही जा रहे हैं?’
अञ्जन-जैसे काले कुंतलोवाली, अरुण अधरवाली तथा उज्ज्वल ललाटवाली एक रमणी ने (राम के प्रति प्रेमाधिक्य से) मन में द्रवित होती हुई, अपनी सखी से कहा—‘हे सखी ! वह वंचक (राम) मेरें मन के भीतर आ पहुँचा है और मैने नेत्र नामक उसके आगमन के द्वार को दृढ़ता से बद कर दिया है, जिससे अब वह बाहर निकलकर नही जा सकता है, अब मै पर्यंक पर जाऊँगी।’
गढ़ी हुई प्रतिमा के समान एक सुन्दरी, मोहिनी-सदृश अपने शरीर मे चुभने-वाले मन्मथ-बाणो का भी ध्यान नहीं करती थी, उसने यह भी नही जाना कि उसके आभरण और वस्त्र कैसे खिसक-खिसककर पृथक्-पृथक् हो गिर रहे हैं। वह उस अमल (राम) के रूप को (प्रेम के साथ) देखनेवाली (नारियो को) अपनी आँखो से चिनगारियाँ उगलती हुई (ईर्ष्या और क्रोध के साथ) देख रही थी।
एक सुन्दरी जिसके नयन (सहज) आमोद से भरे थे, खूब बढ़े हुए थे, दीर्घ होकर कपोलों को नापते थे, (दूसरो के मन को) चुराने की कला को अपने मे छिपाये हुए थे, बार-बार बाहर निकलकर उड़ जाना चाहते-से थे। वे अरुणाई को भीतर रखे हुए श्वेत एवं काले वर्णवाले थे तथा भाले के जैसे थे; शीतल मन के साथ (श्रीराम को) देखने के लिए आई और (देखने पर प्रेम की वेदना से पीडित होकर) उष्ण मन के साथ घर मे लौट गई ।
एक तरुणी जो (राम के) अपार सौंदर्य को देखने की अभिलाषा से प्रेरित हो