कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० | कंब रामायण
रही थी, पर (वहाँ एकत्र स्त्रियो के) काले केशपाश, कंचुकावद्ध भारी स्तन, मेखलावृत नितम्ब, आदि के घने रूप मे छाये रहने से राम के रूप को नही देख पाती थी, तब वह अतिविशाल नेत्रवती (उन रमणियो की सूक्ष्म) कटियो के मध्य से राम को देखने लगी।
उन (मिथिला की) वीथियो मे, कसे हुए खड्गवाले अनंग के द्वारा फेके गये पुष्प-बाण (नारियो के) मन को पार करके बाहर बिखरे पडे थे। उन (नारियो) के (विरह-ज्वाला से) झुलसकर गिरे हुए आभरण, स्तनो पर स्वेद आने से गिरे हुए कुंकुम-लेप, खिसककर गिरी हुई मेखलाएँ, मुक्ताहार, शंख-वलय, दीर्घ केशों से ग्रस्त हुए पुष्प—इनसे रिक्त स्थान वहाँ कही भी नही था।
(उन नारियो मे से) जो (राम की) भुजाएँ देखने लगी, वे उन भुजाओं को ही देखती रह गईं, जो वीर-कंकण भूषित कमल-सदृश उनके चरणों को देखने लगी, वे उन चरणों को ही देखती रह गईं, (जो उनके) विशाल हाथो को देखने लगी, वे वैसी ही (उन हाथो को देखती हुई) अड़ी रह गईं। उन शूल-तुल्य नेत्रवतियों में कौन ऐसी थी जिसने (राम के) रूप को पूर्ण रूप से देखा हो ? (अर्थात्, भगवान् के अवतारभूत राम को पूर्ण रूप से किसी ने नही देखा है।) वे नारियाँ, विभिन्न धर्मों के उन अनुयायियो के समान थी, जो अपने-अपने सिद्धान्तो के अनुसार भगवान् के किसी एक अंश का ही ध्यान करते रहते हैं।
सूक्ष्म कटि तथा दीर्घ कुंतलोवाली एक सुन्दरी को जीवन-दान देते हुए उसका उद्धार करते हुए, उसके मन में (श्रीराम) अन्तर्भूत हो रहे। समस्त भुवनों को अपने उदर में अन्तर्भूत करनेवाले (हमारे) प्रभु से बढ़कर, कहो, अब और कौन बड़ा हो सकता है ?
हिलनेवाले दीर्घ केश-भार तथा उत्तम आभरणो से सुशोभित एक तरुणी, अपनी पायल तथा नूपुरो को ध्वनित करती हुई, अति सुन्दर पुष्पित शाखा के समान पग रखती हुई आई और (राम को देखते ही प्रेम-पीडित) हो रोती हुई सखियो के हाथो पर (आरूढ होकर) चली गई। (अर्थात्, प्रेम-व्याधि से पीडित उस नायिका को उसकी मखियाँ अपने हाथों पर उठाकर रोती हुई चली गईं।)
उस स्थान मे 'कुड्मल' जैसे स्तनोवाली, आभरणालंकृत एक युवती ने (राम का सम्बोधन करके) कहा—तुम्हारा हृदय लोहे के समान कठोर है, फिर भी तुमने एक मुग्धा (को प्राप्त करने) के लिए मेरु-सदृश धनुष को तोड़ा है। हे पुण्यस्वरूप ! (मन्मथ) के इक्षु-धनुष को तोड़कर मुझे भी अपनाओ न।
काजल से अजित नयनोवाली तथा उज्ज्वल ललाटवती एक तरुणी ने कहा—फलीभूत तपस्यावान् यह (राम) अपने रथ का त्याग कर मेरे नेत्रों के अत्यन्त निकट आ खड़ा है, यह कोई इन्द्र-जाल है या स्वप्न ?
एक नारी ने, जिसके पास अपने मन के अतिरिक्त और कोई दूत नही था और जिसके प्राण द्रवित हो उठे थे, कहा—'कमलपुष्प के समान लाल रेखाओं से अंकित