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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

बालकाण्ड १४१

नेत्रोंवाली उस सीता ने न जाने कैसी तपस्या की थी (जिसमे इस सुन्दर पुरुष को प्राप्त किया है) ?'

त्रुटि-रहित प्रतिमा-समान एक सुन्दरी (राम के प्रति प्रेमाधिक्य के कारण) तड़पकर रो उठी, उष्ण निःश्वास भरने लगी. शिथिल हो व्याकुलता के साथ, अपनी प्राण-सखी के प्रति हाथ जोड़कर कहने लगी—'इस कुमार को क्या मन्मथ के द्वारा चित्र में अंकित कराया जा सकता है ?

अरुण अधरवाली तथा उज्ज्वल ललाटवती एक नारी ने (अपने पास खड़े व्यक्तियो को देखकर) कहा—'क्या, किसी मानव-मात्र में इस प्रकार के लक्षण हो सकते हैं? (नही, अतः) यह विष्णु ही हैं, मैं तुम लोगो को यह समझा रही हूँ, इस कथन की सच्चाई को तुम लोग भविष्य मे प्रत्यक्ष देखोगे।

उज्ज्वल ललाटवाली एक सुन्दरी ने जिसके स्वर्ण नूपुर और हाथ के कंकण खनक रहे थे, जिसका मन द्रवित हो रहा था, बहुत म्लान होकर कहा—'यह अनघ इस नगर में आया है, यह जनक महाराज की तपस्या का ही फल है।'

अश्रपूर्ण आँखो और स्वर्ण-भूषित कटिवाली एक रमणी ने, जो इतनी व्याकुल हो उठी थी कि उसका समस्त सौन्दर्य उसके शरीर को छोड़कर चला गया था, कहा—'क्या यह सम्भव हो सकता है कि मुनियो तथा श्रेष्ठ राजाओ से घिरा हुआ यह कुमार (राम) अकेले ही, स्वप्न मे, मेरे निकट आ जाये ?'

वन में निवास करनेवाले वर्षाकाल के मयूर की समता करनेवाली एक स्वर्णलता ने अपने मन के (राम के प्रति उत्पन्न) प्रेम को छिपाना चाहा. किन्तु मन्मथ ने उस बात को जान लिया। गुप्त बातो को मन जिस प्रकार छिपा लेता है, क्या उसी प्रकार मुख भी छिपा सकता है ? (अर्थात्, मन मे छिपे हुए भाव को मुख की कान्ति प्रकट कर देती है।)

दो दीर्घ नयनोवाली एक इन्दुमुखी (विरह-व्यथा से उद्विग्न हो) पुष्प-पर्यंक पर जा लेटी। वह वज्रनाद सुनकर डरे हुए साँप के जैसे विभ्रान्त होकर निःश्वास भरने लगी, और उसके परस्पर घर्षणमाण स्तन-द्वय पर स्वेद छा गया।

लाल अतसी-पुष्प के सदृश, अमृत-पूर्ण अधरवाली वे सुन्दरीयाँ (राम के प्रेम के कारण) पृथक्-पृथक् उद्विग्न होती हुई विकल-प्राण हो गई, दुखती हुई सूक्ष्म कटिवाली सीता के समान, आनन्द के कारण (राम को) जिन्होने नही पाया है, वे कैसे जीयेंगी ?

(एक नारी कहने लगी) स्वेद-भरे शरीर, व्याकुल प्राण तथा अत्यन्त वेदना के साथ पीडित होनेवाली इन नारियो मे से किसी को इस परिशुद्ध पुरुष ने अपने आरक्त नेत्रो से प्रेम के साथ देखा तक नही। कदाचित् यह प्रेमहीन (कठोर) चित्तवाला है।

उस नगर मे नारियाँ असंख्य थी। इधर राम के सौन्दर्य की भी कोई सीमा नही थी, अतः सुन्दर धनुर्धारी मन्मथ भी क्या कर सकता था ? उसके हाथ के सब बाण चुक गये, तो उसने अपने खड्ग पर हाथ रखा (अर्थात्, खड्ग का प्रयोग करने लगा)।

हम यह तो जानते हैं कि कस्तूरी से सुवासित दीर्घ कुन्तलोवाली उस नगर