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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 549 में से

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पृष्ठ 154
१४२कंब रामायण

की नारियों पर मन्मथ ने कैसे अस्त्र प्रयुक्त किये, पर यह नहीं जानते कि वसन्तकालीन मन्मथ ने स्वर्गवासिनियों के साथ कैसा युद्ध किया। उसके बाण तो स्वर्ग की निवासिनी अप्सराओं के हृदयों से भी जा लगे होंगे।

(किसी नारी ने कहा) अपने पर मोहित होनेवाली किसी नारी से कुछ भी न चाहता हुआ, यह (राम) चला जा रहा है, क्या यह उचित है ? करुणा क्या होती है, यह जानता भी नहीं। क्या यह परिणत चित्तवाला (संयम में सफलता प्राप्त किया हुआ) कोई तत्त्वज्ञ है (जो किसी नारी की ओर दृष्टि नहीं उठाता है)? (नहीं, नहीं) यह तो बड़ा हत्यारा है (जो इतनी नारियों को प्राण-पीडा दे रहा है)।

चन्दन रस से लिप्त, उष्ण स्तनों तथा डमरू-समान मृदु कटि से शोभित एक उत्तम युवती अपने व्यापार तथा शरीर की सुधि खोकर शिथिलता से चूर होकर गिर पड़ी, जिसे देखकर लोग सन्देह करने लगे कि वह बचेगी या नहीं।

चाशनी-जैसी मीठी बोलीवाली एक नारी उस वीर (राम) के रथ के पीछे-पीछे दौड़ने लगी, जिससे पैरों में वैसे ही छाले पड़ गये जैसे क्रमुक-वृक्ष पर लगाये गये झूले को झुलानेवाली किसी नारी के पेंगों में पड़े हों। (वह कुछ दूर जाकर) फिर लौट पड़ी, इससे उसने क्या प्राप्त कर लिया ?

अपार प्रेम से मत्त होकर उन नारियों में से एक ने दूसरी से पूछा—क्या तुमने उस राम के मार्ग से मेरे मन को भी जाते हुए देखा था ?' जब कामना अत्यन्त तीव्र हो जाती है, तब लज्जा भी शेष नहीं रहती।

वहाँ पर लक्ष्मी-सदृश एक रमणी ने कहा—'इस (राम) के पूर्वजों ने अपने शरणागत याचकों की रक्षा के लिए अपने प्यारे प्राणों का भी दान किया था। न जाने, उस वंश में उत्पन्न इस (राम) में ऐसी कठोरता कहाँ से आ गई है कि यह हमारे प्यारे प्राणों को हमें नहीं छोड़ता ?'

(काम-पीडा से उत्पन्न) भय से विकल होती हुई, एक सुन्दर ललाटवाली कहने लगी—(इसने) आयुधागार में स्थित शिव-धनुष को जो तोड़ा, वह अगुरु से सुवासित कुंतलोंवाली, पवित्र वाणी-युक्त मयूर-सदृश सीता के प्रति प्रेम के कारण नहीं था, किन्तु अपना धनु-कौशल दिखाने के लिए ही था।'

ढीले केशोंवाली एक रमणी ने, जिसके हार, वस्त्र तथा अन्य आभरण खिसके जा रहे थे, तथा जिसके प्यारे प्राण भी शिथिल हो रहे थे, कहा—मन्मथ के समान बलशाली इस विश्व में दूसरा कौन है, जो इस भयंकर धनुर्धारी राम के सामने ही मेरे प्राण हर रहा है ?

इस प्रकार, सभी दिशाओं में नारियाँ घिर आई थीं। उधर श्रीराम उस सभा-मण्डप में अन्य राजकुमारों के साथ जा पहुँचे, जहाँ निष्कलुषचित्त वशिष्ठ तथा वेदपारग कौशिक विराजमान थे।

लक्ष्मीनायक (राम) ने उन दोनों (महर्षियों) के चरणों का इस प्रकार साष्टांग प्रणाम किया कि उनके रत्नहार इस प्रकार हिलने लगे, जैसे बादलों में बिजलियाँ चमक रही हों और वर्षाकालिक मेघ धरती पर आ लगा हो।