कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १४३
धर्म की रक्षा के लिए अयोध्या में अवतीर्ण उस पुरुष के प्रणाम करने पर उन (महर्षियों) ने आसन ग्रहण करने की आज्ञा दी। उनकी आज्ञा पाकर वे पुष्पाकार चित्रों से उत्कीर्ण एक आसन पर आसीन हुए और छाया के समान अपना अनुगमन करने-वाले तीनो भाइयो के मध्य प्रकाशमान होने लगे।
उसके पश्चात्, मानो चन्द्रमा सब नक्षत्रों के साथ गगन को प्रकाशित करता हुआ आया हो, यों दशरथ चक्रवर्ती अपने बन्धु-मित्रसहित, उस रत्नमय मण्डप में आये।
(चक्रवर्ती ने) आकर महातपस्वियों (वसिष्ठ और कौशिक) के चरणों की वन्दना की और अपने बरसाये जानेवाले मधुपूर्ण पुष्पो से भी अधिक (मात्रा) में, ब्राह्मणो के आशीर्वाद पाकर, आसन पर इस प्रकार विराजे कि देवेन्द्र भी उन्हें देखकर लज्जित हो गया।
गंग, कोंगु, कलिंग, कुंलिंग, सिंहल, चेर, दक्षिण राज्य (पाण्ड्य), अंग, चीन, कुलिन्द, अवन्ती, वंग, मालव, चोल, महाराष्ट्र—इन देशों के राजा
वैभवयुक्त मगध, मत्स्य, म्लेच्छदेश, लाट, विदर्भ, महाचीन, तेंगनदेश (ढकण या दक्षिण ?), मगदेश (म्लेच्छ देशों में से एक), मोमक, मोनक तुरुष्क, कुरुदेश—इन देशों के नरेश .
आयुधहस्त माधव राजा, सप्तधा विभाजित कोंकण, चेदी, तेलंग (आन्ध्र). कर्नाटक इत्यादि नभ से आवृत पृथ्वी-भर के उज्ज्वल तथा दीर्घकिरीटधारी राजा लोग उस मण्डप में आ पहुँचे।
मधुर इक्षु से भी अधिक मीठे वचनवाली रमणियाँ, (दशरथ के) पार्श्वों में चामर डुला रही थीं। वह दृश्य ऐसा था, मानो उनकी कीर्त्ति-रूपी वृक्ष के, जो ऊपर के (स्वर्ग आदि) लोकों में भी व्याप्त था, कोमल पल्लव हिल रहे हों।
मँडरानेवाले भ्रमर तथा मधुमक्खियों को आकृष्ट करनेवाली सुगन्ध से युक्त मधु-पूर्ण पुष्पो से अलंकृत केशवाली स्त्रियाँ, बाँसुरी की ध्वनि के साथ स्वर मिलाकर जय-गान कर रही थीं। वे गान उनकी वाणी-सदृश वीणा को भी मात कर रहे थे।
कठोर तथा भयंकर नेत्रवाले हाथियों की सेना से युक्त (चक्रवर्ती) का अनुपम श्वेतच्छत्र, ऐसा शोभित हो रहा था, मानो चन्द्रमा अपनी वंशजा सीता के शुभ विवाह उत्सव को देखने के लिए आ पहुँचा हो और करुणा से पूर्ण हो, फूला हुआ, ऊँचाई पर खड़ा हो।
(चक्रवर्ती की) सेनाएँ अपार समुद्र के समान व्याप्त होकर सर्वत्र ऐसी फैली पड़ी थीं कि किसी के उठकर जाने या हिलने-डुलने के लिए भी रिक्त स्थान नहीं था। विजयप्रद मत्तगज सेना से युक्त उस (जनक) नरेश का साग देश उस जनसमुदाय के कारण एक नगर-जैसा दीखने लगा।
कांत ललाटवाली सीता के पिता ने असीम आदर तथा प्रेम के साथ आनन्दित हो अपनी समस्त संपत्ति को लुटाकर उनका आतिथ्य-सत्कार किया। उनका वह आतिथ्य रामचन्द्र और अन्य साधारण जनता, सभी के प्रति समान ही रहा। इससे बढ़कर उनके आतिथ्य की महत्ता के सम्बन्ध में और क्या कहा जाय ? (१-५४)