कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १४५
हार के बारे में क्या कहे ? क्या यह कहे कि गगन के नक्षत्रो में से योग्य नक्षत्रो को चुनकर (उनका) हार बनाकर पहनाया गया है ? या कहे कि अति उज्ज्वल किरणवाले चन्द्र को काटकर हार बनाकर पहनाया गया है ? या यह कहे कि (सीता की) लज्जायुक्त हँसी की चन्द्रिका-जैसी कांति ही इस प्रकार छिटकी पड़ी है ? मै क्या कहें ?
जिन (सीता) के रक्त चरणो ने, सौन्दर्य की स्पर्धा में परास्त होकर शरण में आये हुए रक्त कमलो को अरुणाई की भिक्षा दी थी, उनके अमृत-समान शरीर की कांति पड़ने से मनोहर आभरण-युक्त स्तनो पर के श्वेत मोती भी लाल दिखाई पड़ते थे । जो अच्छे लोगो की सगति में रहते हैं, वे भी अच्छे हो जाते हैं न ?१
उन (सीता) की कटि अतिपुष्ट तथा अधिकाधिक उभरते रहनेवाले इंगूर (धातु) के बने हुए कलश-समान स्तनो का भार बढ़ जाने से लचक उठती थी; यदि (अपने प्रकाश से) चौंधियाकर दर्शको की आँखो को बंद करानेवाली लाल कांति से युक्त पद्मराग-पुंजो तथा मोतियो से खचित कोई बाँस हो, तो वह उन (सीता) की आभरण-भूषित भुजाओ की समता कर सकता है ।
विकसित पुष्पो से भूषित कुतलोवाली जानकी के पल्लव-कोमल कर नामक कमलो ने ऐसी तपस्या की है कि वे रामचन्द्र के अरुण हस्तो के द्वारा यथाविधि गृहीत होने-वाले हैं। ये कर सभी के प्रेम के पात्र हैं, रात्रि के समय भी मुकुलित नही होनेवाले हैं, यही सोचकर उनकी सखियो ने बालातप-सदृश कांतिवाले पद्म-परागों से खचित 'कटक' (नामक आभरण) उनके हाथो मे पहनाया, मानो उन्होने उनके करो की रक्षा के लिए उनमे रक्षा-बंधन बाँधा हो ।
(पाटो मे) विभाजित केशोवाली (जानकी) के स्तन नामक दो औंधाये (गये) स्वर्णकलशो पर, जिनमे एक-एक इन्द्रनील रत्न भी जड़ा था, उन सखियो ने कस्तूरी-लेप से पुष्पलता और अनंग-धनुष को चित्रित किया और विविध धर्म-मतो के द्वारा विचार्यमाण भगवान् के समान ही 'अस्ति' या 'नास्ति' की विचिकित्सा के कारण-भूत उनकी कटि के लिए विपदा उत्पन्न कर दी ।
छवि को छिटकानेवाले अत्यन्त सूक्ष्म कौशेय (रेशमी) वस्त्र की परतो मे न आनेवाली (अतिसूक्ष्म) कटि पर मेखला तथा उसके नीचे, (मोतियो की लड़ी से बने) 'तारकपुज' (नामक आभरण) पहनाया। उन आभरणो के विविध रत्नो से जो कान्ति फूट पड़ती थी, वह उन (सीता) के शरीर की कांति से विलक्षण रहकर चारो ओर घूम जाती थी, जिससे वे सखियाँ भी अपनी आँखो की ज्योति खोकर स्तब्ध रह जाती थी।
नाचनेवाले फणी के तुल्य जघन-तटवाली (सीता) के उन कमल-सदृश चरणो मे, जो अतिकोमल, शिरीष पुष्प से भी अधिक कोमल थे और महावर के बिना भी लाल
१. मूल में अंतिम वाक्य मे, 'शेय्यर' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसके श्लेष से दो अर्थ होते हैं—(१) लाल रंगवाले और (२) अच्छे। दोनों अर्थों को लेने से अंतिम वाक्य का चमत्कार बढ़ता है। —अनु०