कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४६ | कंब रामायण |
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दीखते थे, उन सखियों ने नूपुर पहनाये। वे नूपुर बार-बार बोल उठते थे। वे यह कह रहे थे कि ये (चरण) बहुत कोमल हैं, बहुत कोमल हैं।
जैसे बीच में विष रखकर उसके चारों ओर अमृत रखा हो, वैसे (सीताजी के) वे नयन, सीधे तथा लम्बे होकर कान तक फैल गये थे और उसके परे स्थान न मिलने से लौट पड़े थे। उनमें कुछ लाल-लाल रेखाएँ भी दिखाई देती थीं, उनमें छल या छिपाव न होने से वे मेघ के जैसे शीतल थे। उनमें जो रेखाएँ थीं, वे अंजन की ही रेखाएँ थीं या उस कुमार (राम) के शरीर का ही वर्ण था, कुछ निश्चय-पूर्वक नहीं कहा जा सकता।
(उन सखियों ने) मर्त्य-लोक की स्त्रियों, नाग-कन्याओं तथा स्वर्ग की सुन्दरियों के लिए तिलक जैसी (उन सीता) के ललाट पर तिलक अंकित किया। दो पुष्ट नीलोत्पलों के साथ विकसित कोई रक्तकमल हो और उसमें शुक्लपक्ष तृतीया का वर्धमान चन्द्र आ उपस्थित हुआ हो, और उस चन्द्र के मध्य एक नक्षत्र उदित हुआ हो, यदि ऐसा कोई दृश्य उत्पन्न हो जाय, तो उससे सीताजी के तिलकांकित वदन की तुलना हो सकती है।
भ्रमर, मधुमक्खी आदि को आकृष्ट करनेवाले खिले हुए पुष्प, केशों में खोंसने योग्य मृदुल पुष्प, जूड़े में धारण करने योग्य गजरे, कपोलों पर धारण करने योग्य वृन्तरहित अति मृदुल पुष्प—यथास्थान पहनाया तथा कल्पवृक्ष के पल्लव-जैसे चमकते हुए 'पुन्ना' (पुष्प) के स्वर्ण-धूलि-तुल्य पराग को सीता के केशों पर लगाया।
(इस प्रकार, अलंकार करने के उपरांत, दृष्टि-दोष-परिहार करने के लिए उन सखियों ने) घृत-दीप की आरती उतारी, जल सहित पुष्पों को (उनके सम्मुख) बिखेरा, इष्ट-देवों से प्रार्थनाएँ कीं, वेद-पारग विप्रों को स्वर्ण का दान किया। छोटी पीली सरसों को माथे पर लगाया। सावधानी के साथ बनाये गये (चूना और हल्दी को मिलाकर) रक्तवर्ण नीर की आरती उतारी। उन देवी की, जिन्हें अपने हाथों में ही रखकर मयूर के समान ही उन सखियों ने अबतक पाला था, परिक्रमा की, इस प्रकार उन सखियों ने उनका, 'दृष्टि-परिहार किया।
जो सीता शुकों को मीठे बोल सिखाया करती थी, उनकी उस सुषमा को वे सखियाँ कमल-पुष्प से मधु का पान करनेवाले भ्रमरों के समान देखती रहीं। उन (सखियों) की वाणी गद्गद हो उठी। वे अपने सहज स्वभाव को भूल गईं। चाहे पुरुष हों या स्त्रियाँ, सबका मन एक (जैसा) ही होता है न?
मेघ-तुल्य केशवाली वे सखियाँ, आभरणालंकृत वक्षवाली उन सीता को देखकर आनन्दमत्त हो खड़ी रहीं, जैसे पूर्णिमा के चन्द्र को देख रही हों। हरिणनयना स्त्रियों में भी कोई-कोई अवयव ही सुन्दर होता है (अर्थात्, किसी के सभी अवयवों का सुन्दर होना सम्भव नहीं है), जब सभी प्रकार का सौन्दर्य एक ही स्थान में एकत्र हो जाय, तो उसे देखकर कौन मुग्ध नहीं होगा?
अपने सुन्दर कर में शंख (शंख-वलय) धारण करने से, कमल (योगियों का हृदय-कमल तथा कमल-पुष्प) को आवास बनाकर रहने से, सर्वत्र व्यापक होकर, प्रत्येक के