कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १४७
हृदय मे पृथक्-पृथक् अकित होकर रहने से अरुंधती के सदृश माध्वी सीता भी पुरुषोत्तम ( श्रीराम ) के समान ही थी । अब हम और क्या कहे ?
देवेन्द्र के शामन में रहनेवाली रंभा आदि अप्सराएँ जा रही हों, इम प्रकार असंख्य सखियाँ सीताजी को चारो ओर से घेरकर चली । उस समय विशाल मेखलाएँ, पादजाल ( नामक पाद-आभरण ), सर्प के आकार के नूपुर और कर-वलय बज उठे ।
बौने, ठिंगने, कुबड़े, दासियाँ सभी बड़ी भीड़ लगाकर आये और सीता के चरणो की वन्दना करके खड़े रहे । अद्यीण दीप के समान वह देवी रत्न-वितान की छाया में चलने लगी, मानो बाल-चन्द्र नक्षत्रो के साथ जा रहा हो ।
अपने आभरणो में लगे रत्नो की काति को आगे-आगे फेकती हुई सीता इस प्रकार चली, मानो उन्हें जन्म देनेवाली भूदेवी ने यह सोचकर कि इसके चरण अति कोमल हैं. उनके मार्ग में पल्लव ओर पुष्प बिखेर रही हो ।
उनके दोनो पाश्र्वों में डुलनेवाले कातिपूर्ण चामर इम प्रकार थे. मानो मीताजी के समान ही चलने की इच्छा से आये हुए हंस उनके वदनीय मृदु चरणों की गति से परास्त हो गये हो ओर बार-बार नीचे गिर-गिरकर उठ रहे हो । मीता यो चली, मानो अपने कलाप की काति को सर्वत्र बिखेरता हुआ कोई मयूर चल रहा हो ।
सीता भूलोक आदि सब लोको की युवतियो के लिए आँख के तारे के ममान प्रिय थी, ऐसी कन्या ( अविवाहित मीता ) के रूप को देखने के लिए मानो पुरुषोत्तम ( गम ) के कुलपुरुष सूर्य नभ से उतर आया हो—इस प्रकार का था वह रत्नमय वितान. जिसकी छाया में सीता चल रही थी ।
पुंजीभूत घनी स्वर्ण-कान्ति से युक्त कलाप, (सोलह लड़ियोंवाली) मेखला; तथा अन्य रत्नखचित आभरणो मे किरणे छिटक रही थी ; देह की काति अत्यन्त उज्ज्वल हो रही थी, कटि लचक रही थी इस प्रकार अपने प्रकाशमान छोटे पदो को उठाकर रखती हुई सीता आगे बढ़ी ।
उन देवी की शरीर-काति, उनके स्वर्ण-आभरणो की काति, उनके पुष्पो की सुगन्ध तथा चन्दन की शीतलता, चारो ओर बिजली की चमक-जैमी ही फैल रही थी, जिन्हें देखकर अप्सराएँ और अमृत भी लज्जित हो रहे थे। इस प्रकार मीता उस रत्नमय मण्डप में जा पहुँची, जहाँ राजमभा एकत्र थी ।
भारी स्तनो से युक्त उनके उस पवित्र रूप को, जो जन्मदाता के अभाव के कारण (स्वयम्भूत्) वेदी के ममान ही था, देखकर बाँम-जैसी भुजावाली रमणियाँ तथा पुरुष, सब लोग चित्र के समान निर्निमेप. जीवन के लक्षणों से रहित (निर्जीव)-से खड़े रहे ।
समुद्र वर्णवाले ( राम ). जो अबतक इसी सदेह में पड़े थे कि जनक की कन्या वही रमणी है, जिसे उन्होने पहले ( राजप्रासाद पर ) देखा था; या वह कोई दूसरी स्त्री है, अब अमृत-मय उन ( सीता ), को देखकर इस प्रकार आनन्द से भर गये, जिस प्रकार देवेन्द्र. क्षीर-सागर के मंथन के समय. इतना अधिक परिश्रम करके कि जिसमे उनके प्राण भी शरीर