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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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कंब रामायण

को छोड़ जाने के लिए सन्नद्ध हो गये थे, हठात् ही अमृत को उत्पन्न होते हुए देखकर आनन्द से भर गया हो।

अत्यन्त मधुर अमृत को ( साँचे में ) ढालकर, पूर्वकृत सुकृतों के फल के समान निर्मित, अरुण अधर तथा कोकिल-स्वर से युक्त यह कन्या, जो कन्या-प्रासाद से राजमंडप में उतर आई है, मेरे अन्तर में ही नहीं, बाहर भी स्थित है क्या ? इस प्रकार राम ने मन-ही-मन सोचा। ( सीता राम के हृदय में तो पहले से स्थित थी ही, अब वह बाहर भी है क्या, इसका संदेह राम को हुआ। )

वसिष्ठ यह सोचकर अत्यन्त मुदित हुए कि हमारे कृत तप के फलस्वरूप राम के रूप में आया हुआ व्यक्ति, शंख-चक्रधारी पुण्डरीकाक्ष जगदीश्वर (विष्णु) ही है, और यह कन्या भी अरुण कमल पर आसीन (लक्ष्मी) देवी ही है।

समस्त धरती पर समान रूप में चलनेवाले शासन-चक्र से विशिष्ट चक्रवर्ती (दशरथ), घने कुंतलोंवाली सीता को देखकर सोचने लगे—यद्यपि सत्यलोकों में मेरा शासन चलता है, फिर भी मैं वैभव और समृद्धि की देवी (लक्ष्मी) को आज ही अपने वश में कर सका हूँ।

‘नैवल’ नामक वाद्य-सदृश स्वरवाली (सीता) के समीप में आते ही भूमि के विजयी शासक दशरथ तथा तपस्वियों के कर (प्रणाम की मुद्रा में) उनके शिरों पर मुकुलित हो उठे क्योंकि सब के मन तथा इन्द्रियों ने उन (सीता) को देवी के रूप में पहचाना। यह शरीर मन के अधीन ही रहता है न ?

(अपने आवास-भूत) कमल-पुष्प का त्याग कर, (जनक) राजा के स्वर्ण-प्रासाद में अवतरित हुई उस देवी ने पहले महान् तपस्वियों को नमस्कार किया, फिर सब राजाओं में श्रेष्ठ (दशरथ) के चरणकमलों की वन्दना की और आँखों से आनन्दाश्रु बहाने-वाले अपने पिता के समीपस्थ आसन पर विराजमान हुईं।

‘विष को अन्तर में रखनेवाले आम के टिकोरे के सदृश नयनवाली यह कन्या यदि कमलासना (लक्ष्मी) ही है, तो हरे पर्वत के समान बलवान् राम, मेरु-सदृश एक धनुष क्या, सात पहाड़ों को भी तोड़ सकते हैं।’ इस प्रकार रथ की कील (अर्थात्, सब धर्म-कार्यों के प्रधान कारक) जैसे ब्राह्मणोत्तम (वसिष्ठ अथवा विश्वामित्र) ने सोचा।

(सीता ने) यह सुना तो था कि (राम ने) शिव-धनुष को चढ़ाकर उसे तोड़ डाला है, किन्तु उनके रूप के संबंध में उनके मन में संशय अभी शेष था—(अर्थात्, यह वही राजकुमार है, जिसे स्वयं उन्होंने राजप्रासाद से देखा था या कोई और है, यह संदेह था)—उस पुराने संशय को दूर करने के हेतु सीता ने उस प्रभु (राम) को अपने अन्तर में ही नहीं, अब अपने कंकणों को संवारने के व्याज से आँख की कनखियों से भी देख लिया।

(सीता की) काली तथा दीर्घ कनखियों से जो दृष्टि-नदी श्रीराम-रूपी भरे हुए समुद्र में निमग्न हुई, उससे उनके चंचल प्राण (जो यह वही राजकुमार है, या अन्य कोई है—इस संदेह से विकल हो रहे थे) अब स्थिरीभूत हो गये। राम के रूप को देखकर आभरण-भूषित तथा स्त्री-रत्न वह सीता निःश्वास भरने लगी और इस प्रकार आनन्द से फूल गई,