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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 549 में से

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बालकाण्ड ११

किसान लोग जब भूमि से कंद-मूल खोदकर निकालते हैं, तब उन कंदो के साथ कई श्रेष्ठ रत्न भी निकल पड़ते हैं; फलो के भार से झुकी हुई आम्रवृक्षो की डालियो से निरन्तर मधु-धारा बहती रहती है; सदा कमल-पुष्पो से प्रेम करनेवाले हंस 'पुन्ने' (नामक) पुष्पो से आकृष्ट होकर उनके पास अटक जाते हैं।

कृषक-रमणियाँ 'कुरवै' नृत्य (एक प्रकार का लोक-नृत्य) करती हुई गाती हैं; उनके गायन का मधुर स्वर सुनकर ग्वालो के आँगन मे बँधे हुए बछड़े, जो बाँसुरी का नाद सुनने के अभ्यस्त हैं, निद्रा-निमग्न हो जाते हैं, वहाँ की स्त्रियो के राग सुनकर खेतो की रखवाली करनेवाले कृषक बेसुध हो जाते हैं।

पहाड़ों पर उगे हुए बाँस, हवा के झोके खाकर टकराने लगते हैं; उनकी चोट खाकर शहद के बड़े-बड़े छत्तो से शहद बह निकलता है; ऊँची चट्टानो पर से गिरती हुई मधु की धारा ऐसी लगती है, मानो कोई विशाल सर्प चट्टानो से लटक रहा हो, यह मधु की धारा कुमुद-पुष्पो से भरे सर मे जा गिरती है, तो (शंख) कीट उसे पीकर तृप्त होते हैं।

वहाँ की सुन्दरियाँ, जिनके विशाल नयन और अर्द्धचन्द्र सदृश ललाट हैं, वे विद्या एवं धन से संपन्न हैं, अतः जो कोई दुःखी पुरुष उनके यहाँ आता है, उसे धन आदि देकर संतुष्ट करती हैं; वे सदा इस तरह के धर्म-कर्मों में निरत रहती हैं; उनका अन्य कोई दैनिक कार्य नही है।

भोजनालयो मे, जहाँ रोज अनगिनत अतिथियो को भोजन दिया जाता है, अर्द्धचन्द्राकार कटारो से काटी गई तरकारियो, दालो और मोती के दानो जैसे चावलो की बड़ी-बड़ी राशियाँ लगी रहती हैं।

वहाँ के निवासियो की विभूतियो का वर्णन कौन कर सकता है ? बड़ी-बड़ी नावें विदेशो से अनन्त निधियाँ ला देती हैं; धरती शस्य के रूप में अनन्त समृद्धि देती है; खाने श्रेष्ठ रत्न प्रदान करती हैं तथा उनके विभिन्न कुल उन्हे दुर्लभ सदाचार की शिक्षा देते हैं।

वहाँ कही भी कोई पाप-कृत्य नही होता, अतः किसी की अकाल-मृत्यु नही होती; लोगो के चित्त विशुद्ध रहते हैं, अतः किसी के मन में वैर या द्वेष-भाव नही रहता; वहाँ के निवासी धर्म-कृत्यों को छोड़ अन्य कोई कार्य नही करते, अतः सदा प्रजा की उन्नति ही होती रहती है।

(उस देश मे) नदियों के प्रवाह के सिवाय अन्य कोई अपना मार्ग छोड़कर नही चलता; नारियो की कुंकुमपत्र-रेखाओ से चित्रित (पुरुषो की) भुजाओ को छोड़कर अन्य किसी वस्तु का (धान की राशियो पर लगाये गये निशान आदि) चिह्न नही मिटता; रमणियो के कटि-प्रदेश के अतिरिक्त अन्य कोई क्षुद्र नही होता; नारियो के पुष्पालंकृत घुँघराले और सुगंधित केशो को छोड़कर और कोई विक्षिप्त (बिखरा हुआ या पागल) नही दीखता।

अगरु का धूम, पाकशालाओ का धूम, गुड़ की भट्टियो का धूम एवं वेद-ध्वनि से गुंजायमान यज्ञशालाओ का धूम—ये सब मिलकर मेघ बन जाते हैं और (अयोध्या के) गगन मे फैल जाते हैं।

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