कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| १० | कंब रामायण |
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पंकज समान मुख-मंडल पर जो काजल-अंकित रमणीय नयन हैं, उन्हें वे भ्रमरियाँ समझ लेते हैं और उन्ही की संगति की कामना करते हुए सदा वहीं मँडराते रहते हैं ।
कामदेव जिन पुरुषों को विचलित नहीं कर सकता, उन्हें भी वहाँ की युवतियों का दृष्टि-पात अधीर बना देता है, उनके मनोज्ञ स्तन, सामने आनेवाले पुरुषों का सिर इस तरह झुका देते हैं, जैसे मालिक अपने नौकरों पर क्रोध करके उनका सिर नीचे कर देता है । उधर नारियल के घौदों से जो मधु-धारा बहती है, उसे पीकर मोटे मीन मस्त पड़े रहते हैं।
धरती पर चलनेवाले काले बादलों जैसी भैंसें, नदी के ठंडे जल में गोता लगाती हुई अपने बछड़ों को याद करती हैं, तो उनके थनों से दूध स्रवित होने लगता है; जब वह दूध नदी के जल से मिलकर खेतों मेप हुँचता है, तब उसी दुग्ध-धारा से सिंचकर धान का शस्य बढ़ता है ।
वहाँ की अति समृद्ध पाक-शालाओ में बडे-बडे भांडों में चावल पकाया जाता है, चावल धोने का पानी कल-कल शब्द करता हुआ वहाँ से बहकर क्रमुक-वन में होकर लाल धान के खेतो में पहुँचता है और अंकुरो को पुष्ट करता है।
कूडे के ढेरो पर बैठे हुए और सिर पर कलँगी से शोभायमान लाल मुर्गे जब अपने नखों से कूडे को कुरेदते हैं, तब उसमें से चमकती हुई मणियाँ बिखर जाती हैं; चिडियाँ उन्हें जुगनू समझकर अपने घोंसलों में लाकर रखती हैं।
अहीर तरुणियाँ उज्ज्वल और गाढे दही को अपने सुन्दर करो से हिला-हिलाकर मथती हैं, तब मथानी की ध्वनि रह-रहकर जोर से उमड़ पड़ती है; उनके हाथो में पडे शख के नक्काशीदार सफेद कगन बोल उठते हैं, और उनकी पतली कमर आगे बढ़-बढ़कर लचक जाती है ।
फुलबारियो में तोते बोलते हैं; पुष्पो में भ्रमर गाते हैं, जलाशयों में पक्षियो का मधुर कलरव होता है, दानी लोगो के घरों में अतिथियों के भोजन के लिए धान कूटनेवाली औरतें गृहस्थ की प्रशंसा के गीत गाती रहती हैं ।
भोली और काली आँखोंवाली बालिकाएँ नदी से मोतियों को अपने चुल्लू मे भर-भरकर ले आती हैं और घर के आँगन मे उनसे घरौंदे बनाकर खेलती हैं; इस तरह बिखरे हुए मोती गुवाक (सुपारी) के फलो में मिल जाते हैं; और गुवाक साफ करनेवाले लोग उन मोतियों को असार वस्तु समझकर फेंक देते हैं ।
दृढ़ सींगो और कठोर कपालवाले भेड़ों के बलवान् जोड़े जब परस्पर भिड़कर लड़ते हैं, तब उनके टकराने की कर्कश ध्वनि से दूरस्थ पर्वत-शृंगो पर रहनेवाले मेघो में बिजली कौंध जाती है ।
पर्वतों के बीच अरण्यो में जंगली हाथियों को फँसानेवाले धीर शिकारी कठघरे बनाकर उनमे हाथियों के झुण्ड को—बच्चोंवाली हथनियों से उन्हें अलग करके-फँसा लेते हैं; और फिर उन मस्त हाथियों को सुदृढ श्रृंखलाओं में वे वीर बाँधने लगते हैं, तब वहाँ बड़ा विकट कोलाहल होता है; उस कोलाहल को सुनकर गैरिकूट में हंसिनी के साथ क्रीडा करनेवाले मराल (हंस) उड़कर भाग खड़े होते हैं।