कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
| १० | कंब रामायण |
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पंकज समान मुख-मंडल पर जो काजल-अंकित रमणीय नयन हैं, उन्हें वे भ्रमरियाँ समझ लेते हैं और उन्ही की संगति की कामना करते हुए सदा वहीं मँडराते रहते हैं ।
कामदेव जिन पुरुषों को विचलित नहीं कर सकता, उन्हें भी वहाँ की युवतियों का दृष्टि-पात अधीर बना देता है, उनके मनोज्ञ स्तन, सामने आनेवाले पुरुषों का सिर इस तरह झुका देते हैं, जैसे मालिक अपने नौकरों पर क्रोध करके उनका सिर नीचे कर देता है । उधर नारियल के घौदों से जो मधु-धारा बहती है, उसे पीकर मोटे मीन मस्त पड़े रहते हैं।
धरती पर चलनेवाले काले बादलों जैसी भैंसें, नदी के ठंडे जल में गोता लगाती हुई अपने बछड़ों को याद करती हैं, तो उनके थनों से दूध स्रवित होने लगता है; जब वह दूध नदी के जल से मिलकर खेतों मेप हुँचता है, तब उसी दुग्ध-धारा से सिंचकर धान का शस्य बढ़ता है ।
वहाँ की अति समृद्ध पाक-शालाओ में बडे-बडे भांडों में चावल पकाया जाता है, चावल धोने का पानी कल-कल शब्द करता हुआ वहाँ से बहकर क्रमुक-वन में होकर लाल धान के खेतो में पहुँचता है और अंकुरो को पुष्ट करता है।
कूडे के ढेरो पर बैठे हुए और सिर पर कलँगी से शोभायमान लाल मुर्गे जब अपने नखों से कूडे को कुरेदते हैं, तब उसमें से चमकती हुई मणियाँ बिखर जाती हैं; चिडियाँ उन्हें जुगनू समझकर अपने घोंसलों में लाकर रखती हैं।
अहीर तरुणियाँ उज्ज्वल और गाढे दही को अपने सुन्दर करो से हिला-हिलाकर मथती हैं, तब मथानी की ध्वनि रह-रहकर जोर से उमड़ पड़ती है; उनके हाथो में पडे शख के नक्काशीदार सफेद कगन बोल उठते हैं, और उनकी पतली कमर आगे बढ़-बढ़कर लचक जाती है ।
फुलबारियो में तोते बोलते हैं; पुष्पो में भ्रमर गाते हैं, जलाशयों में पक्षियो का मधुर कलरव होता है, दानी लोगो के घरों में अतिथियों के भोजन के लिए धान कूटनेवाली औरतें गृहस्थ की प्रशंसा के गीत गाती रहती हैं ।
भोली और काली आँखोंवाली बालिकाएँ नदी से मोतियों को अपने चुल्लू मे भर-भरकर ले आती हैं और घर के आँगन मे उनसे घरौंदे बनाकर खेलती हैं; इस तरह बिखरे हुए मोती गुवाक (सुपारी) के फलो में मिल जाते हैं; और गुवाक साफ करनेवाले लोग उन मोतियों को असार वस्तु समझकर फेंक देते हैं ।
दृढ़ सींगो और कठोर कपालवाले भेड़ों के बलवान् जोड़े जब परस्पर भिड़कर लड़ते हैं, तब उनके टकराने की कर्कश ध्वनि से दूरस्थ पर्वत-शृंगो पर रहनेवाले मेघो में बिजली कौंध जाती है ।
पर्वतों के बीच अरण्यो में जंगली हाथियों को फँसानेवाले धीर शिकारी कठघरे बनाकर उनमे हाथियों के झुण्ड को—बच्चोंवाली हथनियों से उन्हें अलग करके-फँसा लेते हैं; और फिर उन मस्त हाथियों को सुदृढ श्रृंखलाओं में वे वीर बाँधने लगते हैं, तब वहाँ बड़ा विकट कोलाहल होता है; उस कोलाहल को सुनकर गैरिकूट में हंसिनी के साथ क्रीडा करनेवाले मराल (हंस) उड़कर भाग खड़े होते हैं।
बालकाण्ड ११
किसान लोग जब भूमि से कंद-मूल खोदकर निकालते हैं, तब उन कंदो के साथ कई श्रेष्ठ रत्न भी निकल पड़ते हैं; फलो के भार से झुकी हुई आम्रवृक्षो की डालियो से निरन्तर मधु-धारा बहती रहती है; सदा कमल-पुष्पो से प्रेम करनेवाले हंस 'पुन्ने' (नामक) पुष्पो से आकृष्ट होकर उनके पास अटक जाते हैं।
कृषक-रमणियाँ 'कुरवै' नृत्य (एक प्रकार का लोक-नृत्य) करती हुई गाती हैं; उनके गायन का मधुर स्वर सुनकर ग्वालो के आँगन मे बँधे हुए बछड़े, जो बाँसुरी का नाद सुनने के अभ्यस्त हैं, निद्रा-निमग्न हो जाते हैं, वहाँ की स्त्रियो के राग सुनकर खेतो की रखवाली करनेवाले कृषक बेसुध हो जाते हैं।
पहाड़ों पर उगे हुए बाँस, हवा के झोके खाकर टकराने लगते हैं; उनकी चोट खाकर शहद के बड़े-बड़े छत्तो से शहद बह निकलता है; ऊँची चट्टानो पर से गिरती हुई मधु की धारा ऐसी लगती है, मानो कोई विशाल सर्प चट्टानो से लटक रहा हो, यह मधु की धारा कुमुद-पुष्पो से भरे सर मे जा गिरती है, तो (शंख) कीट उसे पीकर तृप्त होते हैं।
वहाँ की सुन्दरियाँ, जिनके विशाल नयन और अर्द्धचन्द्र सदृश ललाट हैं, वे विद्या एवं धन से संपन्न हैं, अतः जो कोई दुःखी पुरुष उनके यहाँ आता है, उसे धन आदि देकर संतुष्ट करती हैं; वे सदा इस तरह के धर्म-कर्मों में निरत रहती हैं; उनका अन्य कोई दैनिक कार्य नही है।
भोजनालयो मे, जहाँ रोज अनगिनत अतिथियो को भोजन दिया जाता है, अर्द्धचन्द्राकार कटारो से काटी गई तरकारियो, दालो और मोती के दानो जैसे चावलो की बड़ी-बड़ी राशियाँ लगी रहती हैं।
वहाँ के निवासियो की विभूतियो का वर्णन कौन कर सकता है ? बड़ी-बड़ी नावें विदेशो से अनन्त निधियाँ ला देती हैं; धरती शस्य के रूप में अनन्त समृद्धि देती है; खाने श्रेष्ठ रत्न प्रदान करती हैं तथा उनके विभिन्न कुल उन्हे दुर्लभ सदाचार की शिक्षा देते हैं।
वहाँ कही भी कोई पाप-कृत्य नही होता, अतः किसी की अकाल-मृत्यु नही होती; लोगो के चित्त विशुद्ध रहते हैं, अतः किसी के मन में वैर या द्वेष-भाव नही रहता; वहाँ के निवासी धर्म-कृत्यों को छोड़ अन्य कोई कार्य नही करते, अतः सदा प्रजा की उन्नति ही होती रहती है।
(उस देश मे) नदियों के प्रवाह के सिवाय अन्य कोई अपना मार्ग छोड़कर नही चलता; नारियो की कुंकुमपत्र-रेखाओ से चित्रित (पुरुषो की) भुजाओ को छोड़कर अन्य किसी वस्तु का (धान की राशियो पर लगाये गये निशान आदि) चिह्न नही मिटता; रमणियो के कटि-प्रदेश के अतिरिक्त अन्य कोई क्षुद्र नही होता; नारियो के पुष्पालंकृत घुँघराले और सुगंधित केशो को छोड़कर और कोई विक्षिप्त (बिखरा हुआ या पागल) नही दीखता।
अगरु का धूम, पाकशालाओ का धूम, गुड़ की भट्टियो का धूम एवं वेद-ध्वनि से गुंजायमान यज्ञशालाओ का धूम—ये सब मिलकर मेघ बन जाते हैं और (अयोध्या के) गगन मे फैल जाते हैं।
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उस देश की नारियों की छटा प्राप्तकर मयूर (गर्व से) संचरण करते हैं; उनके वक्षों पर शोभायमान रत्नाभरणों की कांति पाकर सूर्यातप (आनन्द से) सर्वत्र फैल जाता है, उनके केशों की शोभा पाकर मेघ (अभिमान से) गगन पर चढ़ जाते हैं और उनके नेत्रों की छवि प्राप्त कर जलाशयों में मीन (हर्ष से) इधर-उधर तैरते हैं।
सरोवरों में नारियाँ जब अपनी टूटती-सी सूक्ष्म कटि के साथ लहरों को उद्वेलित करती हुई गोता लगाती हैं, तब उनके रक्ताधर को देखकर कुमुद खिल पड़ते हैं, जल पर चलनेवाले हंस की-सी गतिवाली नारियों के मुख की समता करते हुए कमल खिल जाते हैं।
वहाँ की वनिताओं के कटाक्ष अपने उपमानीभूत सभी वस्तुओं का उपहास करते हैं, उनकी गति हथिनी की गति का उपहास करती है, परस्पर सटे हुए उनके उन्नत उरोज पंकज की कलियों का उपहास करते हैं, और उनके सुन्दर मुख षोडश कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा का उपहास करते हैं।
वहाँ जो रत्न बिखरे हैं, उनकी कांति सूर्य की किरणों से भी विलक्षण है, वहाँ की रमणियों के स्तन नारियल के शीतल फलों से भी विलक्षण हैं, उनके उज्ज्वल दुकूल दूध पर पड़े झाग से भी विलक्षण हैं और उनके विवाहोत्सवों में बजनेवाले नगाड़े काले बादलों (के गर्जन) से भी विलक्षण हैं।
उस देश के हरे-हरे उपवनों की समता कर सकती हैं, केवल काली घटाएँ; खेतों में लगे धान के अंबारों की समता कर सकता है, केवल पर्वत, वहाँ के बाँधों से घिरे हुए विशाल जलाशयों की समता कर सकता है, केवल अपार जलराशि समुद्र; और, अनन्त निधियों से संपन्न उस कोशल देश की समता कर सकता है, केवल देवलोक।
जो धानों की राशियाँ नहीं हैं, वे मोतियों के ढेर हैं, जो मोतियों के ढेर नहीं हैं, वे समुद्र से निकाले गये नमक के ढेर हैं, जो नमक के ढेर नहीं, वे नदियों से निकली अमूल्य वस्तुओं के समूह हैं, और, जो उन वस्तुओं के समूह नहीं हैं, वे सैकत श्रेणियाँ हैं, जहाँ रत्न बिखरे पड़े हैं।
बालिकाएँ जहाँ कन्दुक-क्रीड़ा करती हैं, वे चन्दन के बाग नहीं हैं, परन्तु चंपक-पुष्पों के उपवन हैं—(बालिकाओं के शरीर की सुगंधि पाकर चन्दन-वन भी चंपक-उपवन के समान महँक उठते हैं), मयूरवाहन सुन्दर सुब्रह्मण्यम् (कार्तिकेय) के जैसे वहाँ के बालक जहाँ धनुर्विद्या आदि कलाओं का अभ्यास करते हैं, वे नन्दन वन नहीं हैं, परन्तु मकरन्द-भरे रजनीगंधा के वन हैं—(उन बालकों के शरीर से भी रजनीगन्धा की-सी सुरभि पाकर परिजात-वन भी रजनीगन्धा की फुलवारी के समान महँकने लगता है।)
वहाँ के कोकिल उन सुन्दरियों की कण्ठध्वनि का अनुकरण करते हुए बोल उठते हैं, मयूर उनके नृत्य का अनुकरण करते हुए नाचने लगते हैं और सीप उनके दाँतों के उपमान होनेवाले मोती उगलते हैं।
(उस देश के) मद्य-विक्रेताओं के यहाँ मद्य पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है, उन मद्यो का पान करनेवाले कृषकों के यहाँ खेती के उपयुक्त सभी आवश्यक साधन
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उपस्थित रहते हैं; विवाह-मंगल में व्यस्त युवकों के घरों में उस समय के अनुकूल मंगल-वाद्य बजते रहते हैं; और, संगीत-कला-निपुण 'बाण' (एक गायक जाति) लोगों के घरों में घुमावदार 'किल्लै' (एक प्रकार की वीणा)-वाद्य विद्यमान रहते हैं।
वहाँ पुष्प-मालाएँ शीतल नव मधु बरसाती हैं; जल-पोत उत्कृष्ट रत्नों को (विदेशों से लाकर) बरसाते हैं. हवाएँ प्राणों को स्थिर रखनेवाला अमृत बरसाती हैं और कवियों की वाणी कर्ण-पेय मधुर कवित्व रस बरसाती हैं।
पुष्पों से अलंकृत केशों और मुक्ता-मालाओं से भूषित वक्षों से अतिरमणीय दिखनेवाली कामिनियों को उद्यानों में देखकर बड़े कलापवाले मयूर भ्रम में पड़ जाते हैं कि वे भी मयूरी हैं और इसलिए युवकों के मन के जैसे ही वे मयूर भी उनके पीछे-पीछे चलने लगते हैं।
उस देश में दान का महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ कोई भी याचक नहीं है; शूरता का महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ युद्ध नहीं होते; सत्यवचन का महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ कोई कभी असत्य-भाषण नहीं करता; और, पंडितों का भी महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ के सभी लोग बहुश्रुत तथा ज्ञानी हैं।
तिल, जौ, माष, कुलत्थी आदि धान्यों से भरी हुई गाड़ियाँ और नमक के खेतों से नमक लादकर लानेवाली गाड़ियाँ, वहाँ की गलियों में पहुँचकर एक दूसरे की कतारों में इस प्रकार खो जाती हैं कि उन्हें अलग-अलग पहचानना कठिन हो जाता है।
वहाँ के विभिन्न प्रान्तों में उत्पन्न होनेवाले खाँड़, शहद, दही, मद्य आदि पदार्थ दूसरे प्रान्तों में यों स्थानान्तरित होते रहते हैं, जैसे मोक्ष-प्राप्ति के उपाय से वंचित प्राणी अपने किये कर्मों के फल भोगते हुए विभिन्न जन्म ग्रहण कर भटकते रहते हैं।
यज्ञों को देखने के लिए आई हुई जन-मंडली और मेलों को देखने के लिए आई हुई जन-मंडली—दोनों, संगीत और बाँसुरी की ध्वनियों से प्रतिध्वनित होनेवाली गलियों में इस तरह मिल जाती हैं, जैसे अलग-अलग दिशाओं से बहती हुई दो नदियाँ एक स्थान पर आकर मिल जाती हों।
शंख-ध्वनि, मृदंग का नाद, पटहों का रव आदि स्वर, खेतों में बड़े-बड़े बैलों को हाँकनेवाले कृषकों की हाँक में समा जाते हैं।
माताएँ अपने नन्हें बच्चों को दूध पिलाकर अपने हाथ से अन्न उठाकर खिलाती हैं. उन बच्चों के मुँह से लार उनके वक्ष पर गिरती है, जहाँ (विष्णु भगवान् के) पाँच आयुधों के चिह्नोंवाली माला पड़ी है, अन्न उठाते समय उन नारियों के मुकुलित होनेवाले कर यों दीखते हैं, जैसे चन्द्र की कांति से पंकज मुकुलित हो रहे हों।
वहाँ के लोग शीलवान् हैं, इसलिए उनका सौन्दर्य नित नवीन रहता है; वे सत्यवादी हैं, इसलिए वहाँ नीति स्थिर रहती है; वहाँ स्त्रियों का आदर होता है, इसलिए धर्म सुरक्षित रहता है; और, वर्षा समय पर होती है, क्योंकि वहाँ की स्त्रियाँ पवित्र आचरणवाली हैं।
उस विशाल कोशल देश की, जो उपवनों से घिरा हुआ है, सीमा का पता कोई
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भी नही लगा सकता ; सरयू नदी अपनी अनन्त शाखा-प्रशाखाओ से बहती हुई उस सीमा को खोज रही है, फिर भी उसे पहचान नही पाई है ।
यह कोशल देश इतना पुण्यभूयिष्ठ है कि यदि प्रभञ्जन के आघात से समुद्र की जलराशि भूमि पर चढ़ आवे, तो भी उस देश की कोई हानि नही हो सकती । ऐसे कोशल का वर्णन करने के पश्चात् अब हम अयोध्या नगर का वर्णन करेगे । ( १—६१ )
अध्याय ३
नगर पटल
अयोध्या नगरी सस्कृत भाषा के महाकवियो तथा विद्वानो द्वारा रस-भरे, सार-गर्भित, मधुर शब्दो मे वर्णित हुई है , जिस स्वर्गलोक की प्राप्ति की इच्छा से असख्य लोगो के निवासी तपस्या मे लीन रहते हैं, उस स्वर्ग के निवासी भी अयोध्या नगरी का निवास प्राप्त करने की कामना करते रहते हैं ।
क्या वह अयोध्या नगरी भूदेवी का मुख है या उसका तिलक है ? अथवा उसके नयन है ? उसके स्तनो पर सुशोभित मनोहर रत्नहार है ? अथवा उस भूदेवी के प्राणो का निवास है ?
क्या वह नगरी लक्ष्मी देवी का आवास-भूत अति सुन्दर कमल है ? या वह स्वर्णमंजूषा है, जिसके भीतर विष्णु भगवान् के वक्ष पर प्रकाशित होनेवाले कौस्तुभ मणि जैसे सुन्दर रत्न रखे हुए हैं ? अथवा वह देवलोक से भी ऊँचा वैकुण्ठधाम ही है ? कदाचित् यह वह स्थान है, जहाँ प्रलय के समय सारी सृष्टि समा जाती है । इस नगर के सम्बन्ध मे और क्या कहें ?
अपने अर्धांग मे उमा देवी को स्थापित करनेवाले (परमशिव) दो देवियो (श्री और भूमि) के पति अतुलनीय (विष्णु) भगवान् तथा क्ष्माधन देव (ब्रह्मा) ने भी इस अयोध्या की समानता करनेवाला दूसरा नगर नही देखा । चन्द्र तथा सूर्य भी इसके उपमान हो सकनेवाले एक नगर को देखने की प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर ही निर्निमेष नयनो से अभी तक अन्तरिक्ष मे घूम रहे हैं अन्यथा उनके इस प्रकार भ्रमण करने का दूसरा कारण क्या हो सकता है ?
ब्रह्मदेव ने बहुप्रशंसित इस रमणीय अयोध्यापुरी का निर्माण करने के हेतु तीक्ष्ण वज्रायुध धारण करनेवाले (देवेन्द्र) की नगरी अमरावती एव कुबेर की राजधानी (अलकापुरी) की सृष्टि करके पहले ही नगर-निर्माण का अभ्यास कर लिया था, मय आदि देवशिल्पी भी इस नगर की शोभा देखकर लज्जित हो गये और शिल्प-कला मे अपनी हार स्वीकार कर सकल्पमात्र से सृष्टि करनेवाली अपनी शक्ति को भूल बैठे, तो मेघ-मडल को छूनेवाले उन प्रासादो का वर्णन कैसे किया जाय ?
अपरिमेय वेदो में यह अर्थ प्रतिपादित हुआ है कि (इस समाज म) 'जो पुण्य
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कर्म करते हैं, वे परलोक में आनन्द प्राप्त करते हैं'—वैसे धर्म का पालन करते हुए इस पृथ्वी पर श्रीराघव के अतिरिक्त और किन्होंने बड़ा तप किया है ? धर्म के त्राता, अनिर्वचनीय गुणों से भूषित (रामचन्द्र) ने जिस नगर में रहकर सप्त लोकों की रक्षा की, उस अयोध्या से भी बढ़कर सुखप्रद स्थान दूसरा कोई हो सकता है- ऐसा मानना भी क्या उचित है ?
महान् करुणा (भगवान् की करुणा) और धर्म की सहायता से पंचेन्द्रिय-रूपी अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके, उत्तरोत्तर बढ़नेवाली तपस्या और ज्ञान प्राप्त करनेवाले महापुरुष जिस भगवान् की शरण में जाते हैं, वह अरुण नयनवाले विष्णु इस नगर में अवतीर्ण हुए और (सीता देवी के रूप में रहनेवाली) लक्ष्मी के साथ यहाँ रहकर अनन्त काल तक लोक-पालन करते रहे, तो इस अयोध्या की समता कर सकनेवाला स्वर्णमय नगर देवलोक में भी कहाँ मिल सकता है ?
सभी राज्यों के नरेश उसी अयोध्या में एकत्र रहते हैं सभी श्रेष्ठ आभरण और दुर्लभ रत्न वहीं पर होते हैं, बड़ी जंजीरों से बँधे मत्त गज, तुरंग, रथ आदि इस संसार की सभी श्रेष्ठ वस्तुएँ वहीं पर होती हैं; मुनि, देव, यक्ष, विद्याधर आदि सब उसी नगर में जमा रहते हैं; तो उस नगर की उपमा किसके साथ हो सकती है ? ऐसे नगरी के विषय में क्या मुझ जैसा व्यक्ति कुछ कह सकता है ?
[ नीचे के छह पद्यों में नगर के प्राचीर का वर्णन है । ]
हिमावृत, अति उन्नत पर्वत-श्रेणियों में भी शिल्प-शास्त्र के अनुसार बने चतुष्कोण आकारवाले पर्वत इस सृष्टि में कहीं नहीं हैं, अतः (अयोध्या के) उस प्राचीर का उपमान भी कहीं नहीं है; वे स्वर्णमय प्राचीर उन विद्वानों के उन्नत ज्ञान के सदृश हैं, जिन्होंने बड़ी तत्परता के साथ सर्व शास्त्रों का अध्ययन किया हो ।
गंभीर ज्ञान से भी उसका स्वरूप तथा अंत नहीं जाना जा सकता, अतः वह प्राचीर वेदों के समान है, उसके अति उन्नत शिखर अपर लोक तक पहुँचते हैं, अतः वह देवी के समान है; पंचेन्द्रिय-तुल्य बलवान् यंत्रों को अपने वश में रखने के कारण वह मुनियों के समान है; रक्षा करने में वह हरिणवाहना कन्या (दुर्गा देवी) के समान है; शूलायुधों को धारण करने के कारण वह कालिका के समान है, अपनी विशालता के कारण वह सभी महान् पदार्थों के समान है; किसी के लिए भी अगम्य (पहुँच के बाहर) होने के कारण वह स्वयं भगवान् के समान है ।
ऊपर उठा हुआ वह प्राचीर अंतरिक्ष में पहुँच गया है, मानो वह देखना चाहता है कि क्या देवताओं का निवास (स्वर्गपुरी) इस अयोध्या से भी अधिक सुन्दर है; जिस नगर में मधुर-स्वरवाली ऐसी असंख्य रमणियाँ हैं, जिनके पद-नख, लाक्षा-रस से अंकित श्रेणी में रखे हुए चंद्रों के सदृश हैं; पद रक्त-कमल तुल्य हैं; कटियाँ नाल-तुल्य हैं; उरोज छोटे नारियल के समान हैं तथा जिनकी भुजाएँ लचीले कोमल बाँस के सदृश सुकुमार हैं।
वह प्राचीर उस नगर के चक्रवर्ती के ही समान है; क्योंकि वह संसार के मापदंड से युक्त है—(चक्रवर्ती वेत्रदंड से युक्त हो सारे संसार की रक्षा करता है, उसी प्रकार प्राचीर
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भी अपने भीतर दंडो से युक्त है ); वह शत्रुओं के मुकुटधारी शिरो को काट देता है— ( राजा अपने शस्त्रो से और प्राचीर अपने भीतर लगे हुए यंत्रो से शत्रु का शिर छेदन करता है।), वह मानव-शास्त्र के अनुसार स्थित है—( राजा मनु के प्रतिपादित धर्म पर चलते हैं और प्राचीर मानवो के शिल्प-शास्त्र के अनुसार बनता है), वह इस प्रकार (नगर की) सुरक्षा करता है कि कोई (शत्रु) आँख उठाकर भी उसे देख नही सकता, वह अत्यन्त बलिष्ठ है, वहाँ धनुष, तलवार आदि का अभ्यास होता रहता है, वहाँ कठोर तन्त्र—( राजतंत्र तथा सेना का प्रबंध ) रहता है, वह शत्रुओं के लिए दुर्जय है, महा औन्नत्य (ऊँचाई) से युक्त है तथा चक्र—(शासन-चक्र तथा यंत्र) चलाता रहता है ।
उस प्राचीर मे निष्ठुर त्रिशूल, प्राणघातक खड्ग, धनुष, फरसा, गदा, चक्र, तोमर, मूसल, मेघ के गर्जन के सदृश भयंकर 'कवण्कल' (पत्थर फेंकनेवाला यन्त्र) इत्यादि अनेक कल-पुरजे और यन्त्र लगे हैं, जो मशको को, पक्षिराज (गरुड) को, तीव्रगामी हवा को, अहित विचारवाले के मन को भी भग्न करनेवाले हैं ।
अष्ट दिशाओ में भी अंधकार को हटाकर सुन्दर रूप में प्रकाश फैलानेवाले सूर्य के कुल में उत्पन्न जो राजा हैं, वे आभरणों की अपेक्षा यश को ही उत्कृष्ट (आभर आभरण) माननेवाले हैं, अतः वे अच्छे चरित्रवाले बनकर संसार के प्राणियो की रक्षा में निरत रहते हैं, उनका शासन-चक्र, अनुपम वेत्रदंड तथा आज्ञा, अष्ट दिशाओ मे तथा ऊपर के लोको मे भी फैलकर रक्षा करते हैं। इसलिए, उस नगर के चारो ओर जो प्राचीर बनाई गई है, वह अलंकार-मात्र है।
[ नीचे के आठ पद्यों मे परिखा (खाई) का वर्णन है । ]
अब हम जिस परिखा (खाई) का वर्णन करने लगे हैं, वह उस उन्नत प्राचीर को इस प्रकार घेरे हुए पडी है, जिस प्रकार उन्नत चक्रवाल पर्वत को घेरकर उत्तुंग तरंगो से भरा सागर पडा रहता है। वह (परिखा) वारनारी के मन के समान गहरी, असत्कविता के समान स्वच्छता-हीन ( गदी ), कुलीन कन्याओ के जघन-तट के समान किसी के लिए भी अगम्य होकर सुरक्षित, तथा ऐसे मगरो से भरी है, जो (लोगो को) सन्मार्ग से हटाकर बुरे मार्ग पर खींच ले चलनेवाली इंद्रियों के समान प्रबल हैं ।
गगन मे संचरण करनेवाला मेघ-समुदाय, उस विशाल तथा पाताल तक गंभीर परिखा को देखकर समझता है कि यही भयंकर समुद्र है, और वहाँ उतरकर जल भर लेता है, फिर ऊपर उठकर उस प्राचीर को देखकर समझता है कि यह कोई गगनोन्नत पर्वत है और वही पर अपनी जलधाराएँ बरसाने लगता है ।
ऊँचे प्राचीर के बाहर स्थित विशाल परिखा मे अपनी सुरभि को चारो ओर फेंकता हुआ पकज-वन खिला हुआ है; वह ऐसा लगता है, मानो मानिनियो के उज्ज्वल वदनो से जो कमल पहले परास्त हो गये थे, वे अब अपने समस्त बल को एकत्र करके युद्ध करने के लिए आ जुटे हों और उस प्राचीर को घेरकर पडे हों ।
बडी कुशलता के साथ लगाये गये यंत्रो से शोभित उस प्राचीर के चारो ओर
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धरती को भेदकर जो परिखा बनाई गई है, उनके भीतर बड़े-बड़े मगर निवास करते हैं और ऊपर उठ-उठकर इस प्रकार डुबकियाँ लगाते रहते हैं, जिस प्रकार अतिगम्भीर समुद्र के मध्य, अदम्य मद से डूबे हुए हाथी हों।
वे मगर, चोखे करवालों की जैसी अपनी पूँछों को हिलाते हुए जाज्वल्यमान नेत्रों से चिनगारियाँ उगलते हुए, एक दूसरे के साथ चढ़ा-ऊपरी करते हुए, आगे बढ़ते हैं; तो ऐसा लगता है, जैसे युद्धरंग में क्रोधोन्मत्त राक्षस टूट पड़े हों।
वह परिखा चक्रवर्ती की सेना की जैसी है, क्योकि वहाँ उड़ते हुए हंस पक्षी श्वेत छत्रों के सदृश हैं; वहाँ के भयंकर मगर, ग्रहों से घिरे हुए पर्वताकार हाथियों के सदृश हैं; नालदंडों के साथ स्पंदित होनेवाले कमल-पुष्प घोड़ों के सदृश हैं; तथा वहाँ के मीन त्रिशूल, करवाल आदि शस्त्रों के सदृश हैं।
उस खाई के किनारे पर चाँदी के चबूतरे बने हैं और उन चबूतरों के मध्य फर्श पर स्वर्ण और स्फटिक-खंड बिछे हैं, इस कारण, देवताओं के लिए भी यह असम्भव है कि वे उस स्वच्छ धरती और उस खाई के स्वच्छ जल को पृथक्-पृथक् पहचान सकें।
विचार करने पर ऐसा लगता है कि उस अति विशाल तथा दीर्घ परिखा-रूपी समुद्र के निकट फैले हुए वनों को, समुद्र के निकट स्थिर होकर पड़े हुए घनीभूत अंधकार कह सकते हैं, वे उपवन उस स्वर्णमय प्राचीर की नीले रंग की साड़ी के समान हैं।
उस नगर के चारों दिशाओं से चार नगर-द्वार हैं; जो दिगंतों में रहनेवाले गजों के समान खड़े हैं, पूर्वकाल में स्वर्गलोक को नापनेवाले त्रिविक्रम के चरण से भी अधिक उन्नत होकर, समस्त सम्पत्तियों से भरी इस धरती पर रहनेवाले प्राणियों को सन्मार्ग पर चलाते रहने के कारण वे चारों नगर-द्वार चारों वेदों की समानता करते हैं।
कबूतरी के बुलाते रहने पर भी कबूतर उसके पास जाकर प्यार से उसका आलिंगन नहीं करता, किंतु वहाँ पर निर्मित एक कपोती की प्रतिमा के पास (उसे सजीव समझकर) मुग्ध हो खड़ा रहता है। यह देखकर कबूतरी रूठकर अकलंक स्वर्णमय स्वर्गलोक में स्थित, पुण्यवान् लोगों के निवासभूत कल्पक-उद्यान में जा छिपती है।
[यहाँ से तीन पद्यों में नगर के गोपुर (शिखर) का वर्णन किया गया है।]
कटे हुए पत्थरों को चुनकर भित्तियाँ बनाई गई हैं, जिनके ऊपर स्फटिक पत्थर लगाये गये हैं, उनके ऊपर चमकते हुए स्वर्ण-पत्र बिछाये गये हैं; जिनके मध्य कांति बिखेरते हुए विविध रत्न जड़े हुए हैं; उन भित्तियों के ऊपर रुचिर रजतमय आड़े की छतें रखी गई हैं, जिनके ऊपर वज्रमय स्तंभ खड़े कर दिये गये हैं।
उन खंभों के ऊपर मरकत जड़ी हुई छतें बिछाई गई हैं; उन छतों पर हीरक-पत्थर चुने गये हैं; स्वर्ण-पत्रों और विद्युत् के समान चमकते रत्नों से निर्मित सिंह की प्रतिमाएँ यत्र-तत्र रखी गई हैं, उन सिंहों के ऊपर गोमेदक की छत बिछाई गई हैं।
उस छत के ऊपर एक दूसरी मंजिल निर्मित है, इस प्रकार सात मंजिले बनी थीं; जो इस भाँति विशाल थी, मानो सत्यलो के निवासियो के रहने के लिए ही बनाई गई हों।
१८ = कंब रामायण
शिल्प-शास्त्र के अनुसार निर्मित वह स्वर्ण-पत्रों से आवृत गोपुर अपनी कांति को ऊपर के सप्त लोकों तक फेंकता है, उस गोपुर पर माणिक्य-मय कलश रखे हैं। वह गोपुर ऐसा लगता है, मानो भूमिदेवी को मुकुट पहनाया गया हो।
धवल प्रासाद, जिनपर सफेद कौडियों को पकाकर बनाये गये चूने की पुताई की गई है और जो इतने उज्ज्वल हैं कि उनके सम्मुख चन्द्रमा भी काला दीखता है, ऐसे लगते हैं, मानो भयंकर प्रभंजन के चलने से क्षीर सागर से उत्तुंग तरंगें ऊपर की ओर उठ आई हों।
(उन धवल सौधो के उपरिभाग में) बिंदियोंवाले सुन्दर कबूतरों के रहने के लिए दरवे (कबूतरों के आवास) बने हुए हैं, जिनमें सोने के पत्र लगाये गये हैं, धवल प्रासाद पर ये सुनहले ताक ऐसे लगते हैं, मानों हिमाचल के शिखर पर अकलंक सूर्य की प्रभातकालीन सुनहली किरणों के पुञ्ज पड़े हों।
(उस नगर में) इस प्रकार के असंख्य कोटि प्रासाद हैं, जिनमें हीरकमय सुन्दर खंभों के मस्तकों पर मरकत-मय छतों को सुचारु रूप से बिठाकर उन छतों पर सजीव दीखनेवाले चित्र अंकित किये गये हैं; वे प्रासाद ऐसे हैं कि स्वर्ग-लोक के निवासी भी उन्हें देखकर विस्मित हो जाते हैं।
(उस नगर में) ऐसे अनेक सौध हैं, जिनके चन्द्रकांतमय तल पर चन्दन के खंभे खड़े करके, उनके प्रवालमय मस्तकों पर रक्तवर्ण के माणिक्य-मय शहतीर रखे गये हैं और जिनकी दीवारें इन्द्रनील रत्नों से जड़ी हैं।
वे प्रासाद ऐसे हैं कि उनके खंभो के पाद कमल के आकार के हैं, वे नाग-लोक के सर्पों को छूनेवाले हैं, अतिमनोहर दर्शनीय अलंकारों से भरे हैं, विशाल अंतराल (खाली स्थान) से युक्त हैं, बाहर से सोने के उपकरणों से अलंकृत हैं अतः वे (प्रासाद) वार-नारियों की तुलना करते हैं।
(वारनारियाँ) जिनके पाद कमल के समान होते हैं. जो कामी पुरुषो (चेटो)¹ का आलिंगन करती हैं, सुन्दर अलंकारों से सुशोभित होती हैं, उनका अंतर प्रेम से शून्य होता है. पर बाहर स्वर्णाभरणो से भूषित रहती हैं।
उन मनोहर प्रासादों के भीतर जानेवाले व्यक्ति उनकी शोभा पर मुग्ध होकर निर्निमेष नयनों से उसे देखते रह जाते हैं और जब दीवारो की कांति उन व्यक्तियों पर पड़ती हैं, तब वे देवों के समान दीखते हैं; अतः अपनी ऊँचाई के कारण देवलोक में भी पहुँचे हुए वे प्रासाद उन दिव्य विमानों के जैसे ही हैं, जो संकल्पमात्र से सब दिशाओं में चले जाते हैं।
वे प्रासाद, जो मनोहर आभरण-भूषित रमणियाँ और मालाधारी पुरुषों के आवास हैं और धर्म-मार्ग से कभी विचलित न होनेवाले (गृहस्थों) के आवास हैं, रत्न और स्वर्ण के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु से नहीं बने हैं, वे अपनी कांति से सूर्य को भी परास्त करनेवाले हैं।
गगन तक उन्नत, अपार संपत्ति से युक्त, अति प्रसिद्ध तथा देदीप्यमान कांति से
¹ तमिल में 'चेटु' शब्द के दो अर्थ होते हैं—(१) शेषनाग, (२) चेट या वेश्याप्रेमी। प्रासाद और वारनारी, दोनों, चेटों को आलिंगित करते हैं।
बालकाण्ड १८
पूर्ण वे प्रासाद, उस नगर के उन निवासियो के समान हैं, जो त्रुटिहीन धर्म-मार्ग पर चलनेवाले हैं और चक्रवर्ती दशरथ के ही समान गुणवाले हैं ।
वे प्रासाद; जिनमे झरनो के समान मुक्ताहार झूलते रहते हैं, विशाल मेघो के समान पताकाएँ फहरती रहती हैं, बड़े-बड़े रत्नो के समुदायों से युक्त हैं, पीतस्वर्णों से भरे हैं; सुन्दर मयूरों से निवासित हैं और पर्वतो की समानता करते हैं ।
अगरु के धूम से सम्यक् मिले हुए और मेघो से पृथक् न पहचानने योग्य जो ध्वज-पट हैं, उनके साथ खड़े हुए दीर्घ दंडों के सिरो पर स्थित त्रिशूल इस प्रकार चमकते हैं, जैसे दिन के समय काँधती हुई बिजलियो की पंक्तियाँ हों ।
उन प्रासादो मे, जहाँ डमरु-समान कटिवाली, पीन स्तनोवाली, मयूर-सदृश रमणियो के चरण-युगल में बजनेवाले नूपुरो की ध्वनि मुखरित होती रहती है; बड़ी-बड़ी ध्वजाएँ लगी हुई हैं, जिनमे मुक्ताहार लटक रहे हैं ; वह दृश्य ऐसा है, मानो कल्पवृक्ष अपने सुरभित पुष्पहारो के साथ खड़ा हो ।
उन्नत पर्वतों के मध्य-स्थित ध्वजाएँ कदली-वन के समान ग्रह-मडल तक उठी हुई फहरा रही हैं ; गगन का चन्द्रमा ( कृष्णपक्ष में ) दिन मे जो कांतिहीन होकर क्षीण होता हुआ झुकता जाता है, वह इसीलिए कि वे ध्वजाएँ उसे रगड़-रगड़कर ( क्षीण और कांतिहीन ) बना देती हैं ।
जो स्वर्ण से बनाये गये दृढ़ मंडप नही हैं, वे पुष्पो के बने कुञ्ज-भवन ही हैं · जो सभा-भवन नही हैं, वे प्रासाद ही हैं; जो क्रीडा-पर्वत नही, वे रत्नमय कुटीर ही हैं ; जो ( भवनो के ) आँगन नही, वे मुक्ता-वितान ही हैं ।
अति उज्ज्वल स्वच्छ स्वर्ण से निर्मित उस अविनश्वर श्रेष्ठ नगर ( अयोध्या ) की छाया, बिजली के समान, दीप-शिखा के समान तथा सूर्य के किरण-पुञ्ज के समान स्वर्ग-लोक पर जाकर पड़ती है , अतएव वह देवलोक भी स्वर्णनगर बन गया है ।
गगन मे प्रकाशित होनेवाला वर्तुल प्रकाश-पुञ्ज सूर्योदय-काल में अति दीर्घ हो, मध्याह्न मे अति संकुचित हो, तथा संध्या मे पुनः दीर्घ बनकर दिखाई देता है : अतः वह ( सूर्य ) वर्तुलाकार स्वर्ण-प्राचीरो तथा अग्नि-कण-सदृश माणिक्यो से सुचारु रूप मे निर्मित उस अयोध्या नगर की परछाईं जैसा ही लगता है ।
सुनिर्मित मेखला से भूषित सुन्दरियाँ वहाँ के स्वर्ण-प्रासादो मे अगरु-धूम प्रसारित करती रहती हैं; उस धूम से भरे हुए मेघ समुद्र पर छा जाते हैं, तो वह विशाल सागर भी सुगंधित हो उठता है; उन मेघो से गिरनेवाली जलधारा के विषय मे अब और क्या कहा जाये ?
उन बालिकाओ की, जिनके अलक-जाल अभी-अभी ( वेणी के ) बंधन के उपयुक्त हो रहे हैं, अस्पष्ट उच्चरित बोली, सुन्दर वेणु-नाद के समान है ; उन युवतियों की, जो अलक-जाल से सुशोभित हैं, बोली मकर-वीणा की ध्वनि के समान है और प्रौढ रमणियो की बोली, मधु बेचनेवालो के संगीत के समान है ।
आँखो से चिनगारियाँ निकालनेवाले ( मदमत्त ) गज अपने पैरो से धरती को
२०
कंब रामायण
खरोंच-खरोचकर गड्ढे बना देते हैं; जिससे मनोहर राजकुमारों का क्रीडा-स्थल असमतल (ऊबड़-खाबड़) हो जाता है, फिर (खेलते हुए राजकुमारों के शरीरों से गिरनेवाले) सुगन्ध-चूर्णों से वे सब गड्ढे पट जाते हैं।
युवतियाँ गेंद खेलती हैं, तब उनके आभरणों से मोती गिरकर धरती पर बिखर जाते हैं; उन गिरे हुए मोतियों को असंख्य परिजन बुहार-बुहारकर एक ओर डालते रहते हैं, इस प्रकार एकत्र मोतियों की राशियाँ शीतल कांति बिखेरती हुई चन्द्र को भी मंद बना देती हैं।
नृत्यशालाओं में सुन्दरियाँ नृत्य करती हैं, उनके काले कटाक्ष-रूपी बरछे कामुक व्यक्तियों के हृदयों को खाते हैं (अर्थात् उनके हृदयो पर चोट करते हैं) फिर उन पुरुषों के प्राण, उन रमणियों की कटि के समान ही क्षीण होने लगते हैं और (उन रमणियों के प्रति) मोह बढ़ने लगता है।
कुछ उपवन सद्योविकसित पुष्पों से मधु प्रवाहित करते हैं; उस मधु का पान करने की इच्छा से दक्षिण पवन और भ्रमर मद-मंद गति से (उन उपवनों मे) प्रविष्ट होते हैं; उनके प्रविष्ट होते ही विरह से पीड़ित रमणियों के तपते हुए स्तन पीडा से कृश हो जाते हैं।
वक्र आकृतिवाली मकर-वीणा से उठनेवाले मधुर स्वर (रमणियों के) मनोहर संगीत के साथ ध्वनित होते रहते हैं, उस संगीत के अनुकूल ही चर्म से ढके (मृदंग आदि) वाद्य बज उठते हैं, (उस संगीत को सुनकर) रमणियों के साथ बोलते रहनेवाले शुक आँखें बद कर सोने लगते हैं।
गाँठदार धनुष से युक्त ललाट (अर्थात्, सुपुष्ट भौंहों से सुशोभित) और बिब-फल के समान लाल अधर, इन (दोनों) से शोभायमान सुन्दरियों के घने कमल-पुष्प-सदृश चरणों के आघात पाकर, जिनपर मृदुल महावर आदि से अलंकरण किया गया है, (पुरुषों की) बलिष्ठ भुजाएँ लाल हो उठती हैं।
उस नगर में, जहाँ (नारी-मणियो की मुख-कांति के कारण) समय का ज्ञान होना भी कठिन है, सब के द्वारा वदनीय (सद्गुणवती) युवतियों के दीप-समान उज्ज्वल शरीर की कांति को देखने की इच्छा से ही चित्रों में अंकित प्रतिमाएँ भी अपलक हो खडी रहती हैं।
शीतल कमल-पुष्प पर निवास करनेवाली (लक्ष्मी) देवी के विश्राम-स्थल के सदृश बने हुए (अयोध्या के) प्रासादों में अंधकार को हटाता हुआ व्यापक कांति-पुंज क्या पुष्ट शिखाओं से युक्त घृत-दीपों से निकलता है, या रत्न-दीपों से निकलता है, अथवा सुन्दरियों के शरीर से ही निकलता है?
नृत्य में कुशल युवतियाँ, मर्दल-ताल, संगीत आदि के अनुरूप, शास्त्र-सम्मत ढंग से, त्रिविध पदगतियाँ दिखाती हैं, उनकी पद-गतियों का विश्लेषण करके उन्हें समझानेवाले, उन रमणियों के मंजीर (पायल) ही नहीं, वहाँ के अश्वों के चरण भी हैं।¹
१. वहाँ के अश्व भी उनकी पदगति का अनुकरण करके नाचने लगते हैं।
बालकाण्ड २१
( वहाँ की रमणियो के मुख-मंडल पर ) मंदहास उत्पन्न होते रहते हैं ; ( उनको देखकर ) कामुको के मन मे काम-वेदना उत्पन्न होती रहती है, इतना ही नही, ( उन-रमणियो के ) मृदु स्तनो पर मुक्ताहार और रक्तस्वर्ण के हार निरतर पडे रहते हैं, जिस कारण उनकी कटियाँ दिन-दिन क्षीण होती रहती हैं।
अपने-अपने स्थानो से निरंतर नशे में चूर रहनेवाले तथा मनोहर गतिवाले वाल राजहंस हैं ; कमल-पुष्प हैं , तडागो में स्थित मीन हैं; भ्रमरियो से युक्त भ्रमर हैं , पुष्प-केसरो का आस्वाद लेनेवाले मत्त गज हैं; और इनके अतिरिक्त रमणियो के नेत्र हैं।
पर्वत की समता करनेवाले मत्तगजो से, जिनके भय से आँखो से आग उगलनेवाले सिंह भी सिंहनियो के साथ पर्वत की कंदराओ मे ( छिपे ) रहते हे, त्रिविध मदजल का प्रवाह ज्यो-ज्यो बहता है, त्यो-त्यो भूमि भी गहरी होती जाती है ; उस ( मदजल ) से जो कीचड़ उत्पन्न होता है, उसमें ऊँची ध्वजावाले सुदृढ रथ भी धँस जाते हैं ।
अपने को अलंकृत करनेवाले जन अपने जिन पुष्पहारो को उतारकर फेक देते हे, वे नर्त्तनशील रमणियो के नूपुरी में उलझ जाते हैं, अपने प्रियतम के साथ विहार में मग्न होकर सुन्दरियाँ अपने स्तनो पर से जिन चन्दन आदि के लेपो को उतारकर फेंक देती हैं, उन लेपो के कारण मार्ग पर चलनेवाले लोग फिसल जाते हैं ।
अश्व, कभी न थकनेवाले अपने खुरो से धरती को कुरेदते रहते हे, जिससे धूलि उड़कर ( उन अश्वो के रत्नालंकारो और सवारी के रत्नाभरणो के ) रत्नो पर छा जाती हैं , इस प्रकार मंद पड़ी हुई रत्न-कांति को अश्वारोही पुरुषो की भुजाओ के पुष्पहारो से गिरनेवाला मधु फिर चमका देता है।
अदम्य मत्तगजों का मदजल 'वेगे' पुष्प के सदृश महँकता है ; उच्च कुल मे उत्पन्न रमणियो के मुख कुमुद-गंध से युक्त हैं , सुन्दरियो के अलक-जाल विविध पुष्पो की सुरभि से सुगंधित हैं ; और ( उस नगर-वासियो के ) आभरणो से अपार कांतिजाल छिटकता रहता है।
अनेक नगरो मे से देव-नगरी ( अमरावती ) के विषय मे क्या कहे, जो इस ( अयोध्या नगरी ) के उपमान के रूप मे बनी हुई है ? वह अमरावती तो किसी भी गुण से उसकी समता नही करती है। स्वयं अलकापुरी भी, जो इस नगर के समान सब वस्तुएँ दे सकती है, यहाँ की पण्यवीथी ( बाजार ) को देखकर परास्त हो जाती है ।
पुरुष-समाज मे मुखरित वीर-वलय शब्द करते रहते हैं ; वरछे चमकते रहते हे ; कांतिपूर्ण रत्नाभरण धूप फैलाते रहते हैं , कस्तूरी, चंदन आदि अत्यधिक सुरभि को फैलाते रहते हैं , मुक्ताएँ कौंधती रहती हैं, भ्रमर गाते रहते हैं।
( उस नगर मे ) शंखो के नाद, शृंगो के नाद, मकर-वीणा आदि वाद्यो के नाद, मर्दल का नाद, किन्नर-वाद्य का नाद, छिद्रवाले वाद्यो ( शहनाई, बाँसुरी आदि ) के नाद तथा विविध प्रकार के वाजो के नाद, इस प्रकार उमड़ते रहते हैं कि समुद्र का घोष भी उस शब्द से मंद पड़ जाता है।
( सामंत ) राजाओ के द्वारा ( उस नगर मे ) दिये जानेवाले राजस्व तथा अन्य द्रव्यो को मापकर लेने के लिए मडप बने हैं; हंस-सम मंदगतिवाली रमणियो के नृत्य
२२ | कंब रामायण
के लिए मंडप बने हैं, स्मरण रखने मे कठिन तथा महान् वेदो का अध्ययन करने के लिए मंडप निर्मित हैं तथा अपूर्व कलाओ के अध्ययन के लिए पाठशाला-मंडप भी निर्मित हैं।
(उस नगरी की) उन विशाल वीथियो से, जहाँ सूर्य के समान प्रकाशित होनेवाले उज्ज्वल रत्नो के तोरण बँधे हैं, दिशाएँ छोटी हैं; मदजल के प्रवाह दूर से दिखाई पड़नेवाले पर्वत-निर्झरी से बड़े हैं; तुरंगो की पंक्तियाँ समुद्र से भी अधिक विशाल हैं।
अपने शिखरो से बरसते बादलो को छूनेवाले, तोरणो से अलंकृत प्रासादो मे सुन्दरियो के उज्ज्वल वदन चमकते रहते हैं, उन वदनो मे (दृष्टि-रूपी) शर चमकते रहते हैं, वे शर सिंह-सदृश (पुरुषो) के वक्ष मे गड़ जाते हैं।
स्वर्णमय अलंकरणो से युक्त रथो की ध्वनि, घोड़ो की किंकिणियो की ध्वनि, राजाओ के वीर-वलयो की ध्वनि—मिलकर, विलक्षण शब्द उत्पन्न करते हैं, (उनके साथ-साथ जब) मधुर मंदहास-युक्त युवतियो के नूपुर बज उठते हैं, तब (उस ध्वनि को सुनकर) नदी के उन घाटो में, जहाँ कन्याएँ स्नान करती हैं, कमलो मे विश्राम करनेवाले हंस भी बोल उठते हैं।
उस पुरातन नगरी मे, कुछ (रमणियो) का समय, प्रणय-कलह मे, (उस प्रणय-कलह के समाप्त होने पर) समागम के सुख मे, प्राणो से भी अधिक मधुर संगीत मे, गायिकाओं के गान सुनने मे, विशाल जलाशयो में क्रीडा करने मे, स्नानानंतर सुन्दर सुमनो को धारण करने आदि कार्यों में ही व्यतीत होता है।
उस महान नगर के कुछ (पुरुषो) का समय, चिंघाड़ते हुए बलवान् मत्तगजो पर धीरता के साथ चढ़कर उन्हे चलाने में, ऊपर उठे हुए खुरवाले (अपने आगे के पैरो को ऊपर उठानेवाले) घोड़ो तथा रथो पर आरूढ होकर उन्हे चलाने मे तथा दारिद्र्य के कारण याचना करनेवालो को पर्याप्त रूप से दान देने आदि कार्यों मे ही व्यतीत होता है।
उस विशाल नगर मे, कुछ (पुरुषो) का समय, एक गज को दूसरे गज से लड़ाने में, गाँठदार धनुष आदि शस्त्रो के अभ्यास मे, दीर्घ केसरवाले अश्वो पर बैठकर विहार करने मे तथा युद्धकला का अध्ययन करने आदि जैसे कार्यों मे ही व्यतीत होता है।
उस मनोहर नगर में, कुछ (रमणियो) का समय, सुन्दर उद्यानो में पुष्पो का चयन करने मे, अपने प्रियतमो के संग सरोबरो मे हरिणियो के जैसे उछलते हुए क्रीडा करने मे, अपने मुखो के स्वाभाविक रक्त वर्ण को और बढ़ाते हुए मद्यपान करने मे तथा अपने प्रियतमो के निकट संदेश भेजने आदि कार्यों मे व्यतीत होता है।
जिस प्रकार श्वेतवर्ण के मेघ विशाल गगन-मार्ग से सत्वर चलकर, मीनो से सुशोभित समुद्र के जल को पीते हैं, उसी प्रकार वहाँ के पुरातन प्रासादो पर लगी हुई ध्वजाएँ, गगन-पथ मे ऊँची उठकर आकाश-गगा के जल को पीकर (उसे) सुखा देती हैं।
सुदृढ तोरणो से अलकृत गोपुर-द्वार और स्वर्ण के बने तीनो प्राचीर, देव-लोक से भी ऊँचे होकर ऐसे खड़े हैं कि उनसे ऊपर बढने के लिए अवकाश न होने के कारण रुक गये हों, वे ऐसे लगते हैं, मानो पर्वताकार भुजावाले वीरो के सद्गुणो से प्राप्त यश ही हों।
बालकाण्ड २३
वहाँ के वनो मे, खेती में, समुद्र-सदृश खाइयों में, उन तड़ागो मे, जहाँ सुन्दरियाँ क्रीडा करती हैं, निर्झरो और जलस्रोतों से युक्त पर्वतो में, प्रासादो के उपरी भाग में, मुक्ताओ के बने वितानो मे, वीणा के समान स्वरयुक्त भ्रमरो से मुखरित उद्यानो में; इन सब स्थानो में पुष्पो और पल्लवो की सेजें बिछी रहती हैं।
उस नगर मे, चर्म के बने नगाडे आदि वाद्य प्रतिदिन ऐसे बज उठते हैं कि स्वच्छ जल बरसानेवाले मेघ और तरंगो से पूर्ण समुद्र भी डर जाते है; वहाँ के निवासियो मे चोरों का भय न होने से, संपत्ति की रक्षा करनेवाले रक्षक नहीं हैं; वहाँ याचको के न होने से कोई दाता भी नही ,है।
वहाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति नही है, जो विद्यावान् न हो, इसलिए वहाँ पृथक् रूप से विद्याओ में पूर्ण पारंगत कहने योग्य व्यक्ति कोई नही है और उन विद्याओ में निपुण न होनेवाला (अपंडित) भी कोई नही है, वहाँ के सब लोग सब प्रकार के ऐश्वर्य से संपन्न हैं, इसलिए (पृथक् रूप से) धनिक कहने योग्य व्यक्ति भी कोई नही है और निर्धन भी कोई नही है।
वह नगर ऐसा स्थान है, जहाँ विद्यारूपी एक बीज अंकुरित होकर, श्रवण किये जानेवाले अपार शास्त्ररूपी शाखाओ को फैलाकर, अपूर्व तपस्या-रूपी पत्रो को विस्तारित करके, प्रेमरूपी कली से युक्त होकर, धर्मरूपी पुष्प को विकसित करके, फिर आनन्द-रूपी विलक्षण फल प्रदान करता है। (१-७५)
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अध्याय ४
शासन पटल
गरिमा-भरे उस अयोध्या नगर मे राजाधिराज दशरथ महाराज राज्य करते थे, उनका नीतिपूर्ण शासन सातो लोको मे निर्विरोध चलता था; वही सद्धर्म के अवतार चक्रवर्त्ती महाराज दशरथ, इस महान् गाथा के नायक, श्रीरामचन्द्र के योग्य पिता थे।
सत्य, ज्ञान, करुणा, क्षमा, पराक्रम, दान, नीतिपरायणता आदि सभी गुण उनके वशीभूत थे। अन्य राजाओं में ये गुण होते भी हैं, तो वे अपूर्ण ही रहते हैं, पर महाराज दशरथ के पास वे पूर्णता को पहुँच चुके थे।
अपार समुद्र से परिवेष्टित इस धरातल पर ऐसा कोई भी नर नही था, जो महाराज के द्वारा प्रवाहित दान-जल से सिंचित न हुआ हो। वेद-विहित मार्गों पर चलनेवाले राजाओ के लिए जो भी यज्ञादि कर्म करणीय हैं और जिन्हें अबतक अन्य कोई राजा पूरे तौर पर नही कर सका था, उन्हें दशरथ ने संपन्न किया।
वे प्रजा पर माता के समान ममता रखनेवाले थे; लोक-हित करने मे स्वयं तपस्या के समान थे सभी को सद्गति देनेवालो में पुत्र के समान आगे रहनेवाले थे; (दुर्जनो के
२४ कंब रामायण
लिए ) व्याधि के समान थे, तो ( सजनो के लिए ) औषध के समान भी थे और सूक्ष्म तत्त्वज्ञान में तो वे स्वयं ज्ञान के ही समान थे।
दान-रूपी नौका पर चढ़कर उन्होंने याचक-रूपी समुद्र को पार किया था, अपनी बुद्धि-रूपी नौका से गंभीर ज्ञान से परिपूर्ण दुस्तर शास्त्र-सागर को पार किया था, अपने खड्ग-रूपी नौका के द्वारा शत्रु-रूपी समुद्र का संतरण किया था तथा सांसारिक भोग-वैभव के समुद्र को, उसमे मन-भर गोता लगाते हुए ही पार किया था।
उनके शासन-चक्र में पक्षी, मृग तथा वेश्याओं के हृदय, सब एक ही मार्ग पर चलते थे। इस प्रकार, महाराज दशरथ अमर कीर्त्ति-संपन्न, महान् दानी तथा अनुपम पराक्रमी थे।
उनका राज्य भी कैसा था ? पृथ्वी के सीमांत पर स्थित चक्रवाल पर्वत उनके राज्य के प्राचीर बने थे, अनन्त सागर उनके राज्य की परिधि बना था, पृथ्वी पर स्थित कुल-पर्वत उनके विविध रत्नमय प्रासाद बने थे, मानो सारी पृथ्वी ही उनके लिए अयोध्या नगरी बन गई थी।
ज्योंही महाराज दशरथ अपने शत्रुओं का बल-पराक्रम ठीक-ठीक आँककर अपना भाला उन पर चलाने के लिए तेज करने लगते थे, त्योंही वे शत्रुनरेश उनके चरणों पर आ गिरते थे और उन राजाओं के रत्नजटित बड़े मुकुटों से महाराज के चरण-वलय¹ घिस जाते थे।
दशरथ का विशाल श्वेतच्छत्र अत्यन्त उन्नत तथा उज्ज्वल था, पृथ्वी की सारी प्रजा को वह शीतल छाया प्रदान करता था तथा कही भी अंधकार को रहने नही देता था। उसकी उपस्थिति में गगन में चमकनेवाले चन्द्रमा की क्या आवश्यकता थी ?
रत्नजटित आभूषणों से सुशोभित वे चक्रवर्ती ( दशरथ ) सिंह-सदृश पराक्रमी थे और सभी प्राणियों की रक्षा अपने ही प्राणी के समान करते थे, मानो सारी चर-अचर सृष्टि उनके अंक में आनन्द से निद्रामग्न हो।
पर्वत के समान उन्नत भुजाओंवाले दशरथ का शासन-चक्र उष्ण-किरण सूर्य के समान ही ऊँचा था, वह भुवन-भर मे संचरण करता हुआ सर्वप्राणियों की रक्षा करता था।
भुवन में कहीं भी कोई ऐसा वीर नहीं रहा, जो युद्ध मे दशरथ का सामना कर सके मर्दल ( वाद्य ) के आकार की दशरथ की भुजाएँ युद्ध करने के लिए फड़क उठती थीं। जैसे कोई गरीब किसान अपनी छोटी-सी खेती की बड़ी सावधानी से देख-भाल करता है, वैसे ही दशरथ अपनी प्रजा की रक्षा करते थे। ( १—१२)
¹ चरण-वलय प्राचीन तमिल राजा लोग अपने दाहिने पैर में सोने का एक कड़ा पहनते थे, जो उनकी वीरता का चिह्न होता था।
अध्याय ५
शुभावतार
एक दिन दशरथ, ब्रह्म-समान तपस्वी वसिष्ठ को प्रणाम करके कहने लगे—
मेरे लिए माता, पिता, दयालु भगवान्, ऐहिक, आमुष्मिक सुख—सब कुछ आप ही हैं।
मेरे पूर्व पुरुषों ने ससार की रक्षा इस प्रकार की थी कि उनकी कीर्त्ति सदा अक्षय
बनी हुई है; उनके कारण इस वंश का यश सूर्य से भी अधिक उज्ज्वल बना हुआ है अब
भी मै आपकी कृपा से इस विशाल धरती की उसी प्रकार से रक्षा कर रहा हूँ।
मै सभी शत्रुओं का नाशकर साठ सहस्र वर्ष तक शासन करता रहा हूँ। अब
मुझे इस बात के अतिरिक्त अन्य कोई भी चिन्ता नहीं है कि मेरे पश्चात् यह संसार शासक
के अभाव में दुःख पायेगा।
(मेरे शासन मे) महान् तपस्या-संपन्न मुनि तथा विप्र बिना किसी विघ्न-बाधा
के सुखमय जीवन व्यतीत करते रहे हैं; मेरे पश्चात (संरक्षक के न होने से) सब लोग
बहुत दुःख पायेंगे—यही बात मेरे मन में गहरी व्यथा उत्पन्न कर रही है।
उस चक्रवर्त्ती ने, जिसके विराट् प्रासाद के द्वार पर नगाड़े बजते रहते हैं और
जो मणिमय मुकुट धारण किये हुए हैं, जब यह बात कही, तब कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा) के
पुत्र (वसिष्ठ) सोचने लगे।
तरंगायित क्षीर-सागर के मध्य शेषनाग की पीठ पर नील पर्वत के सदृश शयन
करनेवाले, महान् मेघ-सदृश विष्णु भगवान् ने दुःख से पीडित देवों को यह वचन दिया था
कि दूसरो को विनाश में निरत (रावण आदि) राक्षसो का मै वध करूँगा।
स्वर्ग-वासी देवता असुरों के आतंक से पीडित होकर नीलकंठ (शंकर) के पास
गये और प्रार्थना की कि हे भगवन्, असुरों से हमारी रक्षा कीजिए। शिवजी ने उत्तर
दिया—'हमसे यह कार्य नही हो सकता।' तब शिवजी को भी साथ लेकर देवता ब्रह्मा
के पास गये।
देवताओ का समाज उत्तर दिशा मे चलकर मेरु पर्वत पर स्थित रत्नमय मंडप
में पहुँचा, जहाँ चतुर्मुख (ब्रह्मा) निवास करते हैं। ब्रह्मा की प्रस्तुति करके, उन्होने राक्षसो
के आतंक तथा अपनी दुःख की कहानी उनसे कह सुनाई।
तब ब्रह्मा ने शिवजी से कहा—एक बार रावण का पुत्र मेघनाद इंद्र को बंदी
बनाकर लंका ले गया था, मैने उसे (मेघनाद से) छुड़ाया था। (अब आगे मै वैसा कोई
कार्य नही कर सकता)।
बीस करो तथा दस शिरो से युक्त, सद्बुद्धि-रूपी संपत्ति से हीन उस (रावण) के
बल का प्रतिकार हमसे संभव नही; नील मेघ के सदृश नयनवाले दयासागर विष्णु भगवान्
ही युद्ध करके (असुर-बाधाओ का) निवारण करेंगे, तो हमारा निस्तार हो सकता है—इस
प्रकार विचार कर—
उन्होने ऊँची तरंगों से पूरित क्षीर-सागर मे योग-निद्रा मे शयन करनेवाले,
२६ कंच रामायण
उन्नत मरकत पर्वत-सदृश विष्णु का अपने मन में ध्यान किया, और कर-कमल जोडकर खडे रहे, उस समय ज्ञानियो को परमगति प्रदान करनेवाले (विष्णु) भगवान् —
गरुड पर आसीन होकर उनके सम्मुख प्रकट हुए, जैसे कोई नीलमेघ, विकमित कमलपुजो १ के साथ, दीप्तिमान् सूर्य और चन्द्रमा को अपने दोनो पाश्र्वो मे धारण किये, विकमित कमल पर आसीन लक्ष्मी के संग, स्वर्ण पर्वत पर चढ आया हो ।
नीलकंठ और कमलासन (ब्रह्मा) अन्य देवताओ के साथ उठ खडे हुए और विष्णु भगवान् के सम्मुख आकर उनकी स्तुति करने लगे। वे ज्यो-ज्यो स्तुति करते, त्यो-त्यो उनका आनन्द बढता ही जाता और वे सब विष्णु के चरणो मे नत हो गये।
(उन देवताओ ने) तुलसीदल-शोभित विष्णु के चरण-कमलो को वारी-वारी से अपने मस्तक पर धारण किया और यह मानकर कि राक्षसो का नाश अभी हो गया, उमंग से भर गये और आनन्द-मदिरा का पान करके मत्त हो गये और नाचने, गाने तथा इधर-उधर दौड़ने भी लगे।
स्वर्णगिरि से उतरनेवाले मेघ के समान मेरे स्वामी २ (विष्णु भगवान्) गरुड की भुजाओ पर से नीचे उतर आये और गगनचुंबी मडप मे आ विराजे। वहाँ सिंह की आकृति-वाले सोने के सिंहासन पर आसीन हुए।
ब्रह्माजी के साथ देवर्षि, स्वर्ग-वासी (देवता) तथा चन्द्र को अपनी जटा पर धारण किये त्रिशूलधारी शिव, सब विस्मयाविष्ट हो और उमंग से भरकर भगवान् के निकट उपस्थित हुए और अत्याचारी राक्षसों के क्रूर कृत्यो का वर्णन करने लगे।
हे लक्ष्मीनाथ ! शरीर-बल से परिपूर्ण दशानन (रावण) तथा उसके अनुज आदि राक्षसो के कारण स्वर्गवासी और मर्त्यलोक के निवासी अपने कर्त्तव्य कर्म भी नही कर पा रहे हैं, अब हमे जीने का मार्ग नही मिल रहा है—यो कहकर उन्होने ठंडी आह भरी।
जब देवताओ ने ये वचन कहे, तब चन्द्र एव मधु-भरे पुष्पो को अपनी जटा मे धारण करनेवाले शिवजी ने उन देवो को अपने हाथ से मौन रहने का सकेत करते हुए स्वयं स्वामी की ओर देखकर, इस प्रकार निवेदन करने लगे--
अरुण नयनो से शोभित हे प्रभु ! राक्षस कहलानेवाले ये लोग, हमारे द्वारा दिये गये शक्तिशाली वरों के प्रसाद से तीनो भुवनो को आहत कर रहे हैं। अब (यदि आप उनका) सहार नही करेंगे, तो क्षणमात्र में वे तीनो भुवनो को मिटा देंगे।
शिवजी के यो कहने पर देवोने भगवान् की स्तुति की; तब अत्यत सुगन्धित तथा सुन्दर तुलसी की माला धारण किये हुए विष्णु ने उनसे कहा--आपलोग दुःख मत कीजिए, मै धरणी पर वचक जनो के शिर काटकर (आपको) दुःख-मुक्त करूँगा, आप मेरी एक बात सुनिए—
स्वर्ग के निवासी आप सब वानर-रूप धारण कर काननो, पर्वतो, और सुगंध-भरे उपवनो मे, दलबल के साथ, जाकर रहिए। क्षीर-सागरशायी विष्णु ने दया करके आगे कहा-
१.कमलपुज—कर, चरण आदि, सूर्य और चन्द्रमा—शख और चक्र, स्वर्ण का पर्वत—गरुड ।
२.कवर विष्णु-भक्त थे, इसलिए उन्होने 'मेरे स्वामी' कहकर सबोधित किया है ।
बालकाण्ड २७
मायावी नीच राक्षसों के वर और उनके जीवन को अपने तीक्ष्ण शरों से विनष्ट करने के लिए हम, चतुरंग सेना-रूपी सागर के प्रभु दशरथ के पुत्र बनकर धरती पर जन्म लेंगे।
शंख, चक्र एव आदिशेष ( जिसका विष वडवाग्नि को भी झुलसा देता है ) मेरे अनुज बनकर मेरी चरण-सेवा करेंगे । इस प्रकार हम प्राचीरों से आवृत्त अयोध्या में अवतार लेंगे।
भगवान् के इस प्रकार कहने पर ( वे देवता ) यह जानकर कि सुगंधित तुलसी-धारी विष्णु ने हमारी रक्षा की, आनन्द से उछल पड़े, और कृतज्ञता-सूचक मंगल-गीत गाने लगे ।
हमारी विपत्तियाँ दूर हो गईं—यह सोचकर इन्द्र आनन्दित हो उठा • परिशुद्ध कमलपुष्प पर निवास करनेवाले (ब्रह्मदेव ), चन्द्रशेखर (शिव) और ऊँचे स्वर्ग के निवासी (देवता) कहने लगे कि हमारी अवनति (नीची अवस्था) का अंत हो गया । विष्णु भगवान ने, जिन्होंने विशाल भूमि को अपने अन्तर्गत कर लिया था, गरुड पर चरण रखा।
मेरे प्रभु के गरुड पर सवार होकर चले जाने के पश्चात् पितामह ने देवताओं से कहा—रीछों के राजा जाम्बवान्, जो कि मेरे अंशभूत हैं, पहले ही धरती पर अवतरित हो चुके हैं । विष्णु के कथनानुसार आप सब भी पृथ्वी पर अवतार लीजिए ।
इन्द्र ने कहा—शत्रुओं के लिए अशनितुल्य (वालि) तथा उसका पुत्र (अङ्गद) मेरे अंश हैं, सूर्य ने कहा कि उस (वालि) का अनुज (सुग्रीव) मेरा अंश है और अग्निदेव ने 'नील' को अपना अंश बतलाया ।
वायुदेव ने कहा कि 'मारुति' मेरा अंश हैं, दूसरे देवता भी (शत्रुओं का) विध्वंस करनेवाले वानर बनकर भूमि पर जाने को सन्नद्ध हो गये, शिवजी ने भी वायु के अंशभूत हनुमान् को ही अपना अंश बताया , देवताओ ने अपने-अपने अंश को लेकर अन्यान्य दिशाओं में भी जन्म लिया ।
कृपालु कमलनयन (विष्णु भगवान्) के कथनानुसार ही कमलासन (ब्रह्मा ); नीलकंठ ( शिव ) तथा अन्य देवताओ के अंश, मनोहर काननों में और अन्य भू-प्रदेशों में वानर बनकर अवतरित हुए। इस प्रकार, अपने-अपने अंश के रूप में पुत्रों को उत्पन्न करनेवाले देवता अपने-अपने स्थान को लौट गये।
पूर्वकाल में निष्पन्न इस वृत्तान्त को मन में विचारकर वसिष्ठ ने कहा पर्वत-समान बलिष्ठ भुजावाले नृपते ! तुम चिन्ता मत करो • जो यज्ञ चौदह भुवनों पर शासन करनेवाले पुत्रों को दे सकता है, उसे अविलंब संपन्न करो, तो तुम्हारी मनोव्यथा दूर हो जायगी ।
जब वसिष्ठ ने इस प्रकार कहा; तब बड़ी उमंग से भरे हुए गजाधिराज (दशरथ) ने उस महान् ऋषि के चरणों पर नतमस्तक होकर निवेदन किया—मैं तो आपकी ही शरण में रहता हूँ, मुझे कोई दुःख किस तरह सता सकता है ? उस यज्ञ के लिए मेरे करने योग्य कार्य क्या-क्या हैं, कहने की कृपा कीजिए ।
२८ कंब रामायणं
दोष-रहित देवों और अन्य ( दानव, दैत्य, मनुष्य, मृग आदि ) लोगों को भी जन्म देनेवाले काश्यप के पुत्र, विभांडक मुनि हैं, जो गंगाधारी शिव के लिए भी स्तुत्य हैं। वे महान् वेदों के ज्ञान तथा धर्माचरण में अपने पिता की समानता करनेवाले हैं।
शास्त्रज्ञान, नीतिमार्ग तथा सत्याचरण में जो चतुर्मुख ब्रह्मा के समान हैं, जिनके सिर पर एक सींग है और जो संसार के सभी मनुष्यों को पशु-तुल्य समझते हैं, अब यहाँ आये और पुत्र कामेष्टि-यज्ञ संपादन करें।
आदिशेष के सहस्र फणों पर स्थित इस पृथ्वी के सभी मानवों को पशुवत् समझने-वाले महान् तपस्वी, ब्रह्मदेव एवं शिवजी की भी प्रशंसा के योग्य, उस शान्त महर्षि ( ऋष्य-शृंग ) के द्वारा यदि यज्ञ संपन्न हो, तो तुम्हारे पुत्र उत्पन्न होंगे।
महर्षि वसिष्ठ के इस प्रकार कहते ही, उनके चरण-कमलों की वन्दना कर, चक्रवर्ती दशरथ ने विनती की—हे प्रभो ! अकलंक, गुणों से भूषित वह महान् तपस्वी ऋष्य-शृंग कहाँ रहते हैं ? अब मेरा कार्य क्या है ? बताइए।
(वसिष्ठ ने कहा)—स्वायंभुव मनु के वंश में उत्पन्न उत्तानपाद नामक नरपति के, ‘पूत’ नामक बड़े-बड़े पापों को मिटानेवाले, पुत्र रोमपाद नामक राजा रहते हैं, जो शासन के योग्य सभी आवश्यक गुणों से विशिष्ट हैं, प्रेम एवं शीतल कृपा के आगार हैं और ( शत्रुओं के लिए ) सभी प्रकार से अजेय हैं।
उस रोमपाद द्वारा शासित राज्य में दीर्घकाल से वर्षा नहीं हुई थी, इस कारण जब बड़ा अकाल पड़ा, तब उन नरेश ने बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ ऋषियों को बुलाकर महादान दिये। फिर भी वर्षा नहीं हुई, तब ऋषियों ने उन रोमपाद से कहा कि जब इस देश में ऋष्यशृंग आयेंगे, तब अवश्य यहाँ वर्षा होगी।
राजा विचार करने लगे कि भूतल के सभी मनुष्यों को पशुवत् माननेवाले, निष्कलंक गुण-भरे उस तपस्वी को यहाँ ले आने का उपाय क्या है ? तब उज्ज्वल ललाट, दीर्घ नयन, रक्ताधर, मोती के तुल्य दाँत तथा मृदु स्तन-युगल से शोभित कुछ वारवनिताओ ने आकर राजा से निवेदन किया - हम जाकर उस तपस्वी को यहाँ ले आयेंगे।
उनका कथन सुनकर रोमपाद प्रसन्न हुए और आभूषण, वस्त्र, शुभ द्रव्य आदि देकर कहा कि हिमकर को भी लजानेवाले ललाट, बलिष्ठ बाँस-जैसी भुजाओं, कृश कटि, पीन स्तनों, काले केशों, भीत नेत्रों और बिंबाधर से युक्त पुष्पलता-तुल्य नारियों, तुमलोग जाकर उन्हें ले आओ। वे नारियाँ राजा को नमस्कार कर रथ पर चढ़कर चलीं।
स्वर्णाभरणों से विभूषित वे नारियाँ, कई योजन पारकर, उस स्थान पर पहुँचीं, जो ऋष्यशृंग के आश्रम से एक योजन दूर था। वहाँ वे पर्णकुटी बनाकर तपस्वियों के जैसे रहने लगीं।
काले और दीर्घनयनोंवाली वे वारवनिताएँ. उस महातपस्वी ऋष्यशृंग के पिता की अनुपस्थिति में उनके आश्रम में जा पहुँचीं। उन्हें देखकर ऋष्यशृंग ने समझा कि ये भी संसार के लोगों को मृग समान मानकर अरण्य में तपस्या करनेवाले ऋषि हैं और उनका उचित सत्कार किया।
बालकाण्ड २६
ऋष्यशृंग ने उन्हे अर्घ्य आदि उपचारो के साथ उचित आसन दिये। उनसे मधुर बाते की, पलाश-पुष्प-सदृश अधरवाली वे नारियाँ मुनि को प्रणाम करके शीघ्र ही अपनी पर्णशाला को लौट आईं।
सुन्दर आभूषण पहनी हुई उन रमणियो ने कुछ दिनो के पश्चात् देवामृत से भी मधुर कटहल, केले तथा आम के फलो के साथ मीठे नारियल भी उस ऋषि को प्रेम के साथ समर्पित किये और विनती की कि हे अपूर्व तपस्संपन्न, आप इनका भोजन करें।
इसी प्रकार जब कुछ काल व्यतीत हो गया, तब एक दिन सुन्दर और उज्ज्वल ललाटवाली उन रमणियो ने ऋष्यशृंग से विनती की कि हे ऋषि ! आप हमारे आश्रम में पधारे। मुनि भी उनके साथ चल पड़े।
अपने मन के ही समान दूसरो को मोह में डालनेवाली वे रमणियाँ उमंग-भरी और आश्चर्य-चकित होकर, उस श्रेष्ठगुणभूषित मुनि को साथ लेकर दीर्घ मार्ग पारकर यह कहती हुई चलीं कि 'हे महर्षे ! वह देखो, वह, वही हमारा आश्रम है।'
सब विभूतियो से सपन्न (राजा रोमपाद के) नगर में उस ऋषिश्रेष्ठ के पदार्पण करने के पहले ही आकाश के बादलो ने, नीलकंठ के कंठस्थ विष जैसे काले होकर, घोर गर्जन के साथ ऐसी वृष्टि की कि तालाब, नदी आदि सभी जलाशय जल से परिप्लावित हो गये।
गगन पर उमड़कर काले मेघो के वर्षा करने से नदियो और तलाबो की प्यास बुझ गई। ईख, लाल धान आदि की फसले लहलहाने और बढ़ने लगी। यह देखकर उस समय रोमपाद नरेश ने विचार किया कि—
बिंबफल के समान अधर, कमलतुल्य वदन, मोती के जैसे स्वच्छ दाँत, धूम के समान काले केशपाश—इनसे शोभित वारवनिताओ के प्रयत्न से, काम, क्रोध और मोह इन तीनो से रहित हो उन्नत हुए ऋष्यशृंग महर्षि उस नगर में पधार रहे हैं।
सुगठित भुजाओवाले वह रोमपाद, वेदो के ज्ञाता मुनियो और अपनी सेना के साथ दो योजन आगे बढ़कर (वहाँ) सुगंधित केशवाली रमणियो के मध्य तप के बड़े पर्वत के समान ऋष्यशृंग मुनि के सम्मुख पहुँचा।
'अब हमारा त्राण हो गया'—यो कहता हुआ आनन्द के साथ वह ऋष्यशृंग के चरणो पर गिरा; उसके नयनो से अश्रु बहने लगे; फिर (राजा के चरणो पर गिरकर) नमस्कार कर उठनेवाली उन वेश्याओ से उसने कहा—तुम लोगो ने अपने प्रयत्न से मेरी विपदा दूर की है।
जब रोमपाद और मुनिगण वहाँ आये, तब ऋष्यशृंग को यह ज्ञान हुआ कि यह सब कपट है। उस समय देवता भी भयभीत हो उठे, (परन्तु) रोमपाद नरेश की प्रार्थना के कारण महर्षि मर्यादा का उल्लंघन न करनेवाले तरंगायित समुद्र के समान स्थित रहे।
वज्र-समान खड्गधारी उस नरेश ने उस मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम किया और (अनावृष्टि से होनेवाली) अपनी विपदा, जिसे कोई भी दूर नही कर सका था और जो अब ऋषि