कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ | कंब रामायण
के लिए मंडप बने हैं, स्मरण रखने मे कठिन तथा महान् वेदो का अध्ययन करने के लिए मंडप निर्मित हैं तथा अपूर्व कलाओ के अध्ययन के लिए पाठशाला-मंडप भी निर्मित हैं।
(उस नगरी की) उन विशाल वीथियो से, जहाँ सूर्य के समान प्रकाशित होनेवाले उज्ज्वल रत्नो के तोरण बँधे हैं, दिशाएँ छोटी हैं; मदजल के प्रवाह दूर से दिखाई पड़नेवाले पर्वत-निर्झरी से बड़े हैं; तुरंगो की पंक्तियाँ समुद्र से भी अधिक विशाल हैं।
अपने शिखरो से बरसते बादलो को छूनेवाले, तोरणो से अलंकृत प्रासादो मे सुन्दरियो के उज्ज्वल वदन चमकते रहते हैं, उन वदनो मे (दृष्टि-रूपी) शर चमकते रहते हैं, वे शर सिंह-सदृश (पुरुषो) के वक्ष मे गड़ जाते हैं।
स्वर्णमय अलंकरणो से युक्त रथो की ध्वनि, घोड़ो की किंकिणियो की ध्वनि, राजाओ के वीर-वलयो की ध्वनि—मिलकर, विलक्षण शब्द उत्पन्न करते हैं, (उनके साथ-साथ जब) मधुर मंदहास-युक्त युवतियो के नूपुर बज उठते हैं, तब (उस ध्वनि को सुनकर) नदी के उन घाटो में, जहाँ कन्याएँ स्नान करती हैं, कमलो मे विश्राम करनेवाले हंस भी बोल उठते हैं।
उस पुरातन नगरी मे, कुछ (रमणियो) का समय, प्रणय-कलह मे, (उस प्रणय-कलह के समाप्त होने पर) समागम के सुख मे, प्राणो से भी अधिक मधुर संगीत मे, गायिकाओं के गान सुनने मे, विशाल जलाशयो में क्रीडा करने मे, स्नानानंतर सुन्दर सुमनो को धारण करने आदि कार्यों में ही व्यतीत होता है।
उस महान नगर के कुछ (पुरुषो) का समय, चिंघाड़ते हुए बलवान् मत्तगजो पर धीरता के साथ चढ़कर उन्हे चलाने में, ऊपर उठे हुए खुरवाले (अपने आगे के पैरो को ऊपर उठानेवाले) घोड़ो तथा रथो पर आरूढ होकर उन्हे चलाने मे तथा दारिद्र्य के कारण याचना करनेवालो को पर्याप्त रूप से दान देने आदि कार्यों मे ही व्यतीत होता है।
उस विशाल नगर मे, कुछ (पुरुषो) का समय, एक गज को दूसरे गज से लड़ाने में, गाँठदार धनुष आदि शस्त्रो के अभ्यास मे, दीर्घ केसरवाले अश्वो पर बैठकर विहार करने मे तथा युद्धकला का अध्ययन करने आदि जैसे कार्यों मे ही व्यतीत होता है।
उस मनोहर नगर में, कुछ (रमणियो) का समय, सुन्दर उद्यानो में पुष्पो का चयन करने मे, अपने प्रियतमो के संग सरोबरो मे हरिणियो के जैसे उछलते हुए क्रीडा करने मे, अपने मुखो के स्वाभाविक रक्त वर्ण को और बढ़ाते हुए मद्यपान करने मे तथा अपने प्रियतमो के निकट संदेश भेजने आदि कार्यों मे व्यतीत होता है।
जिस प्रकार श्वेतवर्ण के मेघ विशाल गगन-मार्ग से सत्वर चलकर, मीनो से सुशोभित समुद्र के जल को पीते हैं, उसी प्रकार वहाँ के पुरातन प्रासादो पर लगी हुई ध्वजाएँ, गगन-पथ मे ऊँची उठकर आकाश-गगा के जल को पीकर (उसे) सुखा देती हैं।
सुदृढ तोरणो से अलकृत गोपुर-द्वार और स्वर्ण के बने तीनो प्राचीर, देव-लोक से भी ऊँचे होकर ऐसे खड़े हैं कि उनसे ऊपर बढने के लिए अवकाश न होने के कारण रुक गये हों, वे ऐसे लगते हैं, मानो पर्वताकार भुजावाले वीरो के सद्गुणो से प्राप्त यश ही हों।