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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड २३

वहाँ के वनो मे, खेती में, समुद्र-सदृश खाइयों में, उन तड़ागो मे, जहाँ सुन्दरियाँ क्रीडा करती हैं, निर्झरो और जलस्रोतों से युक्त पर्वतो में, प्रासादो के उपरी भाग में, मुक्ताओ के बने वितानो मे, वीणा के समान स्वरयुक्त भ्रमरो से मुखरित उद्यानो में; इन सब स्थानो में पुष्पो और पल्लवो की सेजें बिछी रहती हैं।

उस नगर मे, चर्म के बने नगाडे आदि वाद्य प्रतिदिन ऐसे बज उठते हैं कि स्वच्छ जल बरसानेवाले मेघ और तरंगो से पूर्ण समुद्र भी डर जाते है; वहाँ के निवासियो मे चोरों का भय न होने से, संपत्ति की रक्षा करनेवाले रक्षक नहीं हैं; वहाँ याचको के न होने से कोई दाता भी नही ,है।

वहाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति नही है, जो विद्यावान् न हो, इसलिए वहाँ पृथक् रूप से विद्याओ में पूर्ण पारंगत कहने योग्य व्यक्ति कोई नही है और उन विद्याओ में निपुण न होनेवाला (अपंडित) भी कोई नही है, वहाँ के सब लोग सब प्रकार के ऐश्वर्य से संपन्न हैं, इसलिए (पृथक् रूप से) धनिक कहने योग्य व्यक्ति भी कोई नही है और निर्धन भी कोई नही है।

वह नगर ऐसा स्थान है, जहाँ विद्यारूपी एक बीज अंकुरित होकर, श्रवण किये जानेवाले अपार शास्त्ररूपी शाखाओ को फैलाकर, अपूर्व तपस्या-रूपी पत्रो को विस्तारित करके, प्रेमरूपी कली से युक्त होकर, धर्मरूपी पुष्प को विकसित करके, फिर आनन्द-रूपी विलक्षण फल प्रदान करता है। (१-७५)

अध्याय ४

शासन पटल

गरिमा-भरे उस अयोध्या नगर मे राजाधिराज दशरथ महाराज राज्य करते थे, उनका नीतिपूर्ण शासन सातो लोको मे निर्विरोध चलता था; वही सद्धर्म के अवतार चक्रवर्त्ती महाराज दशरथ, इस महान् गाथा के नायक, श्रीरामचन्द्र के योग्य पिता थे।

सत्य, ज्ञान, करुणा, क्षमा, पराक्रम, दान, नीतिपरायणता आदि सभी गुण उनके वशीभूत थे। अन्य राजाओं में ये गुण होते भी हैं, तो वे अपूर्ण ही रहते हैं, पर महाराज दशरथ के पास वे पूर्णता को पहुँच चुके थे।

अपार समुद्र से परिवेष्टित इस धरातल पर ऐसा कोई भी नर नही था, जो महाराज के द्वारा प्रवाहित दान-जल से सिंचित न हुआ हो। वेद-विहित मार्गों पर चलनेवाले राजाओ के लिए जो भी यज्ञादि कर्म करणीय हैं और जिन्हें अबतक अन्य कोई राजा पूरे तौर पर नही कर सका था, उन्हें दशरथ ने संपन्न किया।

वे प्रजा पर माता के समान ममता रखनेवाले थे; लोक-हित करने मे स्वयं तपस्या के समान थे सभी को सद्गति देनेवालो में पुत्र के समान आगे रहनेवाले थे; (दुर्जनो के