कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ कंब रामायण
लिए ) व्याधि के समान थे, तो ( सजनो के लिए ) औषध के समान भी थे और सूक्ष्म तत्त्वज्ञान में तो वे स्वयं ज्ञान के ही समान थे।
दान-रूपी नौका पर चढ़कर उन्होंने याचक-रूपी समुद्र को पार किया था, अपनी बुद्धि-रूपी नौका से गंभीर ज्ञान से परिपूर्ण दुस्तर शास्त्र-सागर को पार किया था, अपने खड्ग-रूपी नौका के द्वारा शत्रु-रूपी समुद्र का संतरण किया था तथा सांसारिक भोग-वैभव के समुद्र को, उसमे मन-भर गोता लगाते हुए ही पार किया था।
उनके शासन-चक्र में पक्षी, मृग तथा वेश्याओं के हृदय, सब एक ही मार्ग पर चलते थे। इस प्रकार, महाराज दशरथ अमर कीर्त्ति-संपन्न, महान् दानी तथा अनुपम पराक्रमी थे।
उनका राज्य भी कैसा था ? पृथ्वी के सीमांत पर स्थित चक्रवाल पर्वत उनके राज्य के प्राचीर बने थे, अनन्त सागर उनके राज्य की परिधि बना था, पृथ्वी पर स्थित कुल-पर्वत उनके विविध रत्नमय प्रासाद बने थे, मानो सारी पृथ्वी ही उनके लिए अयोध्या नगरी बन गई थी।
ज्योंही महाराज दशरथ अपने शत्रुओं का बल-पराक्रम ठीक-ठीक आँककर अपना भाला उन पर चलाने के लिए तेज करने लगते थे, त्योंही वे शत्रुनरेश उनके चरणों पर आ गिरते थे और उन राजाओं के रत्नजटित बड़े मुकुटों से महाराज के चरण-वलय¹ घिस जाते थे।
दशरथ का विशाल श्वेतच्छत्र अत्यन्त उन्नत तथा उज्ज्वल था, पृथ्वी की सारी प्रजा को वह शीतल छाया प्रदान करता था तथा कही भी अंधकार को रहने नही देता था। उसकी उपस्थिति में गगन में चमकनेवाले चन्द्रमा की क्या आवश्यकता थी ?
रत्नजटित आभूषणों से सुशोभित वे चक्रवर्ती ( दशरथ ) सिंह-सदृश पराक्रमी थे और सभी प्राणियों की रक्षा अपने ही प्राणी के समान करते थे, मानो सारी चर-अचर सृष्टि उनके अंक में आनन्द से निद्रामग्न हो।
पर्वत के समान उन्नत भुजाओंवाले दशरथ का शासन-चक्र उष्ण-किरण सूर्य के समान ही ऊँचा था, वह भुवन-भर मे संचरण करता हुआ सर्वप्राणियों की रक्षा करता था।
भुवन में कहीं भी कोई ऐसा वीर नहीं रहा, जो युद्ध मे दशरथ का सामना कर सके मर्दल ( वाद्य ) के आकार की दशरथ की भुजाएँ युद्ध करने के लिए फड़क उठती थीं। जैसे कोई गरीब किसान अपनी छोटी-सी खेती की बड़ी सावधानी से देख-भाल करता है, वैसे ही दशरथ अपनी प्रजा की रक्षा करते थे। ( १—१२)
¹ चरण-वलय प्राचीन तमिल राजा लोग अपने दाहिने पैर में सोने का एक कड़ा पहनते थे, जो उनकी वीरता का चिह्न होता था।