कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५
शुभावतार
एक दिन दशरथ, ब्रह्म-समान तपस्वी वसिष्ठ को प्रणाम करके कहने लगे—
मेरे लिए माता, पिता, दयालु भगवान्, ऐहिक, आमुष्मिक सुख—सब कुछ आप ही हैं।
मेरे पूर्व पुरुषों ने ससार की रक्षा इस प्रकार की थी कि उनकी कीर्त्ति सदा अक्षय
बनी हुई है; उनके कारण इस वंश का यश सूर्य से भी अधिक उज्ज्वल बना हुआ है अब
भी मै आपकी कृपा से इस विशाल धरती की उसी प्रकार से रक्षा कर रहा हूँ।
मै सभी शत्रुओं का नाशकर साठ सहस्र वर्ष तक शासन करता रहा हूँ। अब
मुझे इस बात के अतिरिक्त अन्य कोई भी चिन्ता नहीं है कि मेरे पश्चात् यह संसार शासक
के अभाव में दुःख पायेगा।
(मेरे शासन मे) महान् तपस्या-संपन्न मुनि तथा विप्र बिना किसी विघ्न-बाधा
के सुखमय जीवन व्यतीत करते रहे हैं; मेरे पश्चात (संरक्षक के न होने से) सब लोग
बहुत दुःख पायेंगे—यही बात मेरे मन में गहरी व्यथा उत्पन्न कर रही है।
उस चक्रवर्त्ती ने, जिसके विराट् प्रासाद के द्वार पर नगाड़े बजते रहते हैं और
जो मणिमय मुकुट धारण किये हुए हैं, जब यह बात कही, तब कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा) के
पुत्र (वसिष्ठ) सोचने लगे।
तरंगायित क्षीर-सागर के मध्य शेषनाग की पीठ पर नील पर्वत के सदृश शयन
करनेवाले, महान् मेघ-सदृश विष्णु भगवान् ने दुःख से पीडित देवों को यह वचन दिया था
कि दूसरो को विनाश में निरत (रावण आदि) राक्षसो का मै वध करूँगा।
स्वर्ग-वासी देवता असुरों के आतंक से पीडित होकर नीलकंठ (शंकर) के पास
गये और प्रार्थना की कि हे भगवन्, असुरों से हमारी रक्षा कीजिए। शिवजी ने उत्तर
दिया—'हमसे यह कार्य नही हो सकता।' तब शिवजी को भी साथ लेकर देवता ब्रह्मा
के पास गये।
देवताओ का समाज उत्तर दिशा मे चलकर मेरु पर्वत पर स्थित रत्नमय मंडप
में पहुँचा, जहाँ चतुर्मुख (ब्रह्मा) निवास करते हैं। ब्रह्मा की प्रस्तुति करके, उन्होने राक्षसो
के आतंक तथा अपनी दुःख की कहानी उनसे कह सुनाई।
तब ब्रह्मा ने शिवजी से कहा—एक बार रावण का पुत्र मेघनाद इंद्र को बंदी
बनाकर लंका ले गया था, मैने उसे (मेघनाद से) छुड़ाया था। (अब आगे मै वैसा कोई
कार्य नही कर सकता)।
बीस करो तथा दस शिरो से युक्त, सद्बुद्धि-रूपी संपत्ति से हीन उस (रावण) के
बल का प्रतिकार हमसे संभव नही; नील मेघ के सदृश नयनवाले दयासागर विष्णु भगवान्
ही युद्ध करके (असुर-बाधाओ का) निवारण करेंगे, तो हमारा निस्तार हो सकता है—इस
प्रकार विचार कर—
उन्होने ऊँची तरंगों से पूरित क्षीर-सागर मे योग-निद्रा मे शयन करनेवाले,