कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ कंच रामायण
उन्नत मरकत पर्वत-सदृश विष्णु का अपने मन में ध्यान किया, और कर-कमल जोडकर खडे रहे, उस समय ज्ञानियो को परमगति प्रदान करनेवाले (विष्णु) भगवान् —
गरुड पर आसीन होकर उनके सम्मुख प्रकट हुए, जैसे कोई नीलमेघ, विकमित कमलपुजो १ के साथ, दीप्तिमान् सूर्य और चन्द्रमा को अपने दोनो पाश्र्वो मे धारण किये, विकमित कमल पर आसीन लक्ष्मी के संग, स्वर्ण पर्वत पर चढ आया हो ।
नीलकंठ और कमलासन (ब्रह्मा) अन्य देवताओ के साथ उठ खडे हुए और विष्णु भगवान् के सम्मुख आकर उनकी स्तुति करने लगे। वे ज्यो-ज्यो स्तुति करते, त्यो-त्यो उनका आनन्द बढता ही जाता और वे सब विष्णु के चरणो मे नत हो गये।
(उन देवताओ ने) तुलसीदल-शोभित विष्णु के चरण-कमलो को वारी-वारी से अपने मस्तक पर धारण किया और यह मानकर कि राक्षसो का नाश अभी हो गया, उमंग से भर गये और आनन्द-मदिरा का पान करके मत्त हो गये और नाचने, गाने तथा इधर-उधर दौड़ने भी लगे।
स्वर्णगिरि से उतरनेवाले मेघ के समान मेरे स्वामी २ (विष्णु भगवान्) गरुड की भुजाओ पर से नीचे उतर आये और गगनचुंबी मडप मे आ विराजे। वहाँ सिंह की आकृति-वाले सोने के सिंहासन पर आसीन हुए।
ब्रह्माजी के साथ देवर्षि, स्वर्ग-वासी (देवता) तथा चन्द्र को अपनी जटा पर धारण किये त्रिशूलधारी शिव, सब विस्मयाविष्ट हो और उमंग से भरकर भगवान् के निकट उपस्थित हुए और अत्याचारी राक्षसों के क्रूर कृत्यो का वर्णन करने लगे।
हे लक्ष्मीनाथ ! शरीर-बल से परिपूर्ण दशानन (रावण) तथा उसके अनुज आदि राक्षसो के कारण स्वर्गवासी और मर्त्यलोक के निवासी अपने कर्त्तव्य कर्म भी नही कर पा रहे हैं, अब हमे जीने का मार्ग नही मिल रहा है—यो कहकर उन्होने ठंडी आह भरी।
जब देवताओ ने ये वचन कहे, तब चन्द्र एव मधु-भरे पुष्पो को अपनी जटा मे धारण करनेवाले शिवजी ने उन देवो को अपने हाथ से मौन रहने का सकेत करते हुए स्वयं स्वामी की ओर देखकर, इस प्रकार निवेदन करने लगे--
अरुण नयनो से शोभित हे प्रभु ! राक्षस कहलानेवाले ये लोग, हमारे द्वारा दिये गये शक्तिशाली वरों के प्रसाद से तीनो भुवनो को आहत कर रहे हैं। अब (यदि आप उनका) सहार नही करेंगे, तो क्षणमात्र में वे तीनो भुवनो को मिटा देंगे।
शिवजी के यो कहने पर देवोने भगवान् की स्तुति की; तब अत्यत सुगन्धित तथा सुन्दर तुलसी की माला धारण किये हुए विष्णु ने उनसे कहा--आपलोग दुःख मत कीजिए, मै धरणी पर वचक जनो के शिर काटकर (आपको) दुःख-मुक्त करूँगा, आप मेरी एक बात सुनिए—
स्वर्ग के निवासी आप सब वानर-रूप धारण कर काननो, पर्वतो, और सुगंध-भरे उपवनो मे, दलबल के साथ, जाकर रहिए। क्षीर-सागरशायी विष्णु ने दया करके आगे कहा-
१.कमलपुज—कर, चरण आदि, सूर्य और चन्द्रमा—शख और चक्र, स्वर्ण का पर्वत—गरुड ।
२.कवर विष्णु-भक्त थे, इसलिए उन्होने 'मेरे स्वामी' कहकर सबोधित किया है ।