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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड २७

मायावी नीच राक्षसों के वर और उनके जीवन को अपने तीक्ष्ण शरों से विनष्ट करने के लिए हम, चतुरंग सेना-रूपी सागर के प्रभु दशरथ के पुत्र बनकर धरती पर जन्म लेंगे।

शंख, चक्र एव आदिशेष ( जिसका विष वडवाग्नि को भी झुलसा देता है ) मेरे अनुज बनकर मेरी चरण-सेवा करेंगे । इस प्रकार हम प्राचीरों से आवृत्त अयोध्या में अवतार लेंगे।

भगवान् के इस प्रकार कहने पर ( वे देवता ) यह जानकर कि सुगंधित तुलसी-धारी विष्णु ने हमारी रक्षा की, आनन्द से उछल पड़े, और कृतज्ञता-सूचक मंगल-गीत गाने लगे ।

हमारी विपत्तियाँ दूर हो गईं—यह सोचकर इन्द्र आनन्दित हो उठा • परिशुद्ध कमलपुष्प पर निवास करनेवाले (ब्रह्मदेव ), चन्द्रशेखर (शिव) और ऊँचे स्वर्ग के निवासी (देवता) कहने लगे कि हमारी अवनति (नीची अवस्था) का अंत हो गया । विष्णु भगवान ने, जिन्होंने विशाल भूमि को अपने अन्तर्गत कर लिया था, गरुड पर चरण रखा।

मेरे प्रभु के गरुड पर सवार होकर चले जाने के पश्चात् पितामह ने देवताओं से कहा—रीछों के राजा जाम्बवान्, जो कि मेरे अंशभूत हैं, पहले ही धरती पर अवतरित हो चुके हैं । विष्णु के कथनानुसार आप सब भी पृथ्वी पर अवतार लीजिए ।

इन्द्र ने कहा—शत्रुओं के लिए अशनितुल्य (वालि) तथा उसका पुत्र (अङ्गद) मेरे अंश हैं, सूर्य ने कहा कि उस (वालि) का अनुज (सुग्रीव) मेरा अंश है और अग्निदेव ने 'नील' को अपना अंश बतलाया ।

वायुदेव ने कहा कि 'मारुति' मेरा अंश हैं, दूसरे देवता भी (शत्रुओं का) विध्वंस करनेवाले वानर बनकर भूमि पर जाने को सन्नद्ध हो गये, शिवजी ने भी वायु के अंशभूत हनुमान् को ही अपना अंश बताया , देवताओ ने अपने-अपने अंश को लेकर अन्यान्य दिशाओं में भी जन्म लिया ।

कृपालु कमलनयन (विष्णु भगवान्) के कथनानुसार ही कमलासन (ब्रह्मा ); नीलकंठ ( शिव ) तथा अन्य देवताओ के अंश, मनोहर काननों में और अन्य भू-प्रदेशों में वानर बनकर अवतरित हुए। इस प्रकार, अपने-अपने अंश के रूप में पुत्रों को उत्पन्न करनेवाले देवता अपने-अपने स्थान को लौट गये।

पूर्वकाल में निष्पन्न इस वृत्तान्त को मन में विचारकर वसिष्ठ ने कहा पर्वत-समान बलिष्ठ भुजावाले नृपते ! तुम चिन्ता मत करो • जो यज्ञ चौदह भुवनों पर शासन करनेवाले पुत्रों को दे सकता है, उसे अविलंब संपन्न करो, तो तुम्हारी मनोव्यथा दूर हो जायगी ।

जब वसिष्ठ ने इस प्रकार कहा; तब बड़ी उमंग से भरे हुए गजाधिराज (दशरथ) ने उस महान् ऋषि के चरणों पर नतमस्तक होकर निवेदन किया—मैं तो आपकी ही शरण में रहता हूँ, मुझे कोई दुःख किस तरह सता सकता है ? उस यज्ञ के लिए मेरे करने योग्य कार्य क्या-क्या हैं, कहने की कृपा कीजिए ।