कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ कंब रामायणं
दोष-रहित देवों और अन्य ( दानव, दैत्य, मनुष्य, मृग आदि ) लोगों को भी जन्म देनेवाले काश्यप के पुत्र, विभांडक मुनि हैं, जो गंगाधारी शिव के लिए भी स्तुत्य हैं। वे महान् वेदों के ज्ञान तथा धर्माचरण में अपने पिता की समानता करनेवाले हैं।
शास्त्रज्ञान, नीतिमार्ग तथा सत्याचरण में जो चतुर्मुख ब्रह्मा के समान हैं, जिनके सिर पर एक सींग है और जो संसार के सभी मनुष्यों को पशु-तुल्य समझते हैं, अब यहाँ आये और पुत्र कामेष्टि-यज्ञ संपादन करें।
आदिशेष के सहस्र फणों पर स्थित इस पृथ्वी के सभी मानवों को पशुवत् समझने-वाले महान् तपस्वी, ब्रह्मदेव एवं शिवजी की भी प्रशंसा के योग्य, उस शान्त महर्षि ( ऋष्य-शृंग ) के द्वारा यदि यज्ञ संपन्न हो, तो तुम्हारे पुत्र उत्पन्न होंगे।
महर्षि वसिष्ठ के इस प्रकार कहते ही, उनके चरण-कमलों की वन्दना कर, चक्रवर्ती दशरथ ने विनती की—हे प्रभो ! अकलंक, गुणों से भूषित वह महान् तपस्वी ऋष्य-शृंग कहाँ रहते हैं ? अब मेरा कार्य क्या है ? बताइए।
(वसिष्ठ ने कहा)—स्वायंभुव मनु के वंश में उत्पन्न उत्तानपाद नामक नरपति के, ‘पूत’ नामक बड़े-बड़े पापों को मिटानेवाले, पुत्र रोमपाद नामक राजा रहते हैं, जो शासन के योग्य सभी आवश्यक गुणों से विशिष्ट हैं, प्रेम एवं शीतल कृपा के आगार हैं और ( शत्रुओं के लिए ) सभी प्रकार से अजेय हैं।
उस रोमपाद द्वारा शासित राज्य में दीर्घकाल से वर्षा नहीं हुई थी, इस कारण जब बड़ा अकाल पड़ा, तब उन नरेश ने बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ ऋषियों को बुलाकर महादान दिये। फिर भी वर्षा नहीं हुई, तब ऋषियों ने उन रोमपाद से कहा कि जब इस देश में ऋष्यशृंग आयेंगे, तब अवश्य यहाँ वर्षा होगी।
राजा विचार करने लगे कि भूतल के सभी मनुष्यों को पशुवत् माननेवाले, निष्कलंक गुण-भरे उस तपस्वी को यहाँ ले आने का उपाय क्या है ? तब उज्ज्वल ललाट, दीर्घ नयन, रक्ताधर, मोती के तुल्य दाँत तथा मृदु स्तन-युगल से शोभित कुछ वारवनिताओ ने आकर राजा से निवेदन किया - हम जाकर उस तपस्वी को यहाँ ले आयेंगे।
उनका कथन सुनकर रोमपाद प्रसन्न हुए और आभूषण, वस्त्र, शुभ द्रव्य आदि देकर कहा कि हिमकर को भी लजानेवाले ललाट, बलिष्ठ बाँस-जैसी भुजाओं, कृश कटि, पीन स्तनों, काले केशों, भीत नेत्रों और बिंबाधर से युक्त पुष्पलता-तुल्य नारियों, तुमलोग जाकर उन्हें ले आओ। वे नारियाँ राजा को नमस्कार कर रथ पर चढ़कर चलीं।
स्वर्णाभरणों से विभूषित वे नारियाँ, कई योजन पारकर, उस स्थान पर पहुँचीं, जो ऋष्यशृंग के आश्रम से एक योजन दूर था। वहाँ वे पर्णकुटी बनाकर तपस्वियों के जैसे रहने लगीं।
काले और दीर्घनयनोंवाली वे वारवनिताएँ. उस महातपस्वी ऋष्यशृंग के पिता की अनुपस्थिति में उनके आश्रम में जा पहुँचीं। उन्हें देखकर ऋष्यशृंग ने समझा कि ये भी संसार के लोगों को मृग समान मानकर अरण्य में तपस्या करनेवाले ऋषि हैं और उनका उचित सत्कार किया।