कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड २६
ऋष्यशृंग ने उन्हे अर्घ्य आदि उपचारो के साथ उचित आसन दिये। उनसे मधुर बाते की, पलाश-पुष्प-सदृश अधरवाली वे नारियाँ मुनि को प्रणाम करके शीघ्र ही अपनी पर्णशाला को लौट आईं।
सुन्दर आभूषण पहनी हुई उन रमणियो ने कुछ दिनो के पश्चात् देवामृत से भी मधुर कटहल, केले तथा आम के फलो के साथ मीठे नारियल भी उस ऋषि को प्रेम के साथ समर्पित किये और विनती की कि हे अपूर्व तपस्संपन्न, आप इनका भोजन करें।
इसी प्रकार जब कुछ काल व्यतीत हो गया, तब एक दिन सुन्दर और उज्ज्वल ललाटवाली उन रमणियो ने ऋष्यशृंग से विनती की कि हे ऋषि ! आप हमारे आश्रम में पधारे। मुनि भी उनके साथ चल पड़े।
अपने मन के ही समान दूसरो को मोह में डालनेवाली वे रमणियाँ उमंग-भरी और आश्चर्य-चकित होकर, उस श्रेष्ठगुणभूषित मुनि को साथ लेकर दीर्घ मार्ग पारकर यह कहती हुई चलीं कि 'हे महर्षे ! वह देखो, वह, वही हमारा आश्रम है।'
सब विभूतियो से सपन्न (राजा रोमपाद के) नगर में उस ऋषिश्रेष्ठ के पदार्पण करने के पहले ही आकाश के बादलो ने, नीलकंठ के कंठस्थ विष जैसे काले होकर, घोर गर्जन के साथ ऐसी वृष्टि की कि तालाब, नदी आदि सभी जलाशय जल से परिप्लावित हो गये।
गगन पर उमड़कर काले मेघो के वर्षा करने से नदियो और तलाबो की प्यास बुझ गई। ईख, लाल धान आदि की फसले लहलहाने और बढ़ने लगी। यह देखकर उस समय रोमपाद नरेश ने विचार किया कि—
बिंबफल के समान अधर, कमलतुल्य वदन, मोती के जैसे स्वच्छ दाँत, धूम के समान काले केशपाश—इनसे शोभित वारवनिताओ के प्रयत्न से, काम, क्रोध और मोह इन तीनो से रहित हो उन्नत हुए ऋष्यशृंग महर्षि उस नगर में पधार रहे हैं।
सुगठित भुजाओवाले वह रोमपाद, वेदो के ज्ञाता मुनियो और अपनी सेना के साथ दो योजन आगे बढ़कर (वहाँ) सुगंधित केशवाली रमणियो के मध्य तप के बड़े पर्वत के समान ऋष्यशृंग मुनि के सम्मुख पहुँचा।
'अब हमारा त्राण हो गया'—यो कहता हुआ आनन्द के साथ वह ऋष्यशृंग के चरणो पर गिरा; उसके नयनो से अश्रु बहने लगे; फिर (राजा के चरणो पर गिरकर) नमस्कार कर उठनेवाली उन वेश्याओ से उसने कहा—तुम लोगो ने अपने प्रयत्न से मेरी विपदा दूर की है।
जब रोमपाद और मुनिगण वहाँ आये, तब ऋष्यशृंग को यह ज्ञान हुआ कि यह सब कपट है। उस समय देवता भी भयभीत हो उठे, (परन्तु) रोमपाद नरेश की प्रार्थना के कारण महर्षि मर्यादा का उल्लंघन न करनेवाले तरंगायित समुद्र के समान स्थित रहे।
वज्र-समान खड्गधारी उस नरेश ने उस मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम किया और (अनावृष्टि से होनेवाली) अपनी विपदा, जिसे कोई भी दूर नही कर सका था और जो अब ऋषि