कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३० कम्ब रामायण
के आगमन मे दूर हो गई थी, कह सुनाईं। राजा के बार-वार प्रार्थना करने पर ऋषि के मन का सारा क्रोध दूर हो गया।
विशुद्ध ज्ञानी ओर वरप्रदाता उन महातपस्वी ने दया करके उस नरेश को आशीर्वाद दिये अब राजा तत्त्वज्ञानी मुनियो-सहित रथ पर आरूढ होकर शीघ्र ही नगर जा पहुँचा।
रोमपाद उस ऋषिश्रेष्ठ के साथ अलकृत नगर में पहुँचे, मुनि को अपने स्वर्णमय प्रासाद मे ले जाकर एक अनुपम सिंहासन पर उन्हे आसीन कराया।
उस नरेश ने, इस प्रकार मे कि कोई त्रुटि न रह जाय, अर्घ्य आदि सभी उपचार किये और आनन्दित हो पलाश-सम अधर-युक्त शाता नामक अपनी पुत्री को वेदों के विधान से (उन मुनि को) दान किया।
वसिष्ठ ने कहा—हे राजन्, उस अगदेश की सारी विपत्तियाँ अब मिट गई हैं; वहाँ वर्षा होने लगी है, जिससे वहाँ का दुर्भिक्ष दूर हो गया है। महातपस्वी ओर ज्ञानी वे (मुनि) राजा के द्वारा दान मे दत्त शान्ता नामक नारी की सेवाएँ पाते हुए उसी स्थान पर रहते हैं।
वसिष्ठ के यह कहते ही महाराज दशरथ ने उनके चरणो में प्रणाम करके कहा कि मै अभी जाकर उन (ऋष्यशृंग महर्षि) को ले आता हूँ। (उस समय) राजा लोग उनकी स्तुति कर रहे थे, सुमन्त्र आदि महान् मेधा-शक्ति-सपन्न मंत्रिगण दशरथ के प्रति नतमस्तक हो गये, जब दशरथ रथ पर चढ़े, तब देवताओ ने उन्हे आशीर्वाद दिये और यह विचारकर कि हमारी विपदाएँ आज से मिट गईं, उनपर पुष्पवर्षा की।
'काहल' और अन्य वाद्य समुद्र से भी बढकर घोष करने लगे; वन्दी-मागध तथा वेदपाठी ब्राह्मणो ने राजा की प्रशसा की और आशीर्वाद दिये। मधुर अधरवाली रमणियो ने उनकी जय-जयकार की और उनके आयुष्मान् होने के गीत गाये। समुद्र-तुल्य सेना से घिरे हुए राजा दशरथ दीर्घ मार्ग पार करके सूर्य के जैसे (तेजस्वी) चक्रवर्त्ती रोमपाद के देश में जा पहुँचे।
चरों ने रोमपाद को समाचार दिया कि चक्रवर्ती दशरथ, जिनका यश शाखा-प्रशाखाओ मे बढ़कर व्याप्त हो रहा है, (नगर के) निकट आ पहुँचे हैं। (यह सुनकर) रोमपाद वीर-ककण पहनकर उनकी अगवानी करने चला, दृढ धनुष धारण करनेवाली सागर समान उसकी विशाल सेना भी उसे घेरकर चली; मागध स्तुति-पाठ करने लगे; बड़ी उमंग के साथ वह एक योजन दूर तक गया।
अपने सम्मुख आनेवाले वीर रोमपाद को देखकर दशरथ मेघ-गर्जन करनेवाले अपने रथ से उतर पड़े। उस समय रोमपाद दशरथ के चरणो पर आ गिरा। अपने हृदय में प्रेम की बाढ़-सी उत्पन्न करते हुए दशरथ ने उसे उठाकर गले लगा लिया; रोमपाद ने आनन्द से भरकर तीक्ष्ण-धार भाला धारण किये हुए चक्रवर्त्ती दशरथ से निवेदन किया—
बलवान् भुजाओं से विशिष्ट वह रोमपाद, जिसके भाले की चोट से शत्रु शव-मात्र रह जाते हैं यो कहने लगा—देवलोक की रक्षा करनेवाले भाले से युक्त हे राजन्!