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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड ३१

मेरे बड़े तप के फलस्वरूप ही आपका यहाँ पदार्पण हुआ है, अथवा इस राज्य का ही यह पुण्य-फल है। फिर, वह मधुवर्षा करनेवाले पुष्पों की मालाएँ पहने हुए चक्रवर्ती दशरथ को रत्नमय रथ पर आसीन कराकर अपने नगर मे ले आया।

घनी पुष्पमाला को धारण करनेवाला रोमपाद, हाटक नामक स्वर्ण से निर्मित अपने प्रकाशमान प्रासाद के एक मंडप मे पहुँचा, वहाँ रक्तकमल के समान चरणवाली, प्रतिभा-समान सुन्दर रमणियाँ जयगान कर रही थीं; स्वर्णमय सिहासन पर चक्रवर्ती दशरथ को, जिनके भाले में जयमाला लिपटी हुई थी, बिठाकर (अर्घ्य आदि) सभी उपचारों के साथ भोजन कराया। महाराज दशरथ, जिन्होंने देवलोक की रक्षा की थी, (रोमपाद के स्वागत-सत्कार से बहुत) आनन्दित हुए।

उपचार के पश्चात् सुगंधित चंदन दिया। दशरथ को देख रोमपाद ने पूछा - आपके यहाँ पधारने का कारण क्या है, कृपाकर बताइए। जब दशरथ ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया, तब नरेश (रोमपाद) ने विनती की कि हे मनोहर मुकटधारी राजन्! ईर्ष्या (आदि दुर्गुणों) से रहित महान् तपोधन ऋष्यशृंग को मैं वहाँ (अयोध्या में) ले जाऊँगा। (इसके बाद) दशरथ रथ पर सवार हो अपनी सेना के साथ अयोध्या जा पहुँचे।

दशरथ के चले जाने पर वीर रोमपाद वेद-स्वरूप मुनिवर के निवास पर पहुँचा और उनके चरण-कमलो को अपने स्वर्ण-मुकुट पर धारण किया। ऋष्यशृंग ने उससे उसके यहाँ आने का उद्देश्य पूछा, तो उत्तर दिया मुझे एक वर दीजिए। मुनि से पूछा— कौन सा वर ?

रोमपाद ने विनती की-उज्ज्वल कीर्त्तिमान्, नीतिज्ञ, शासक दशरथ, जो कबूतर की रक्षा के निमित्त तुला पर अपने शरीर को रखनेवाले उदारगुण शिवि के प्रसिद्ध वंश मे उत्पन्न हुए हैं, जिनका मन धर्म में सुस्थिर है, जिनके भाले ने देवो को पीडा देनेवाले असुरो के बल को नष्ट किया था, उनके रत्नखचित अट्टालिकाओ से शोभित अयोध्या नगर को (आप एक बार) जाकर और फिर लौटने की कृपा करें।

तपस्वी ऋष्यशृंग ने कहा कि हमने वह वर दिया (स्वीकार किया), अब तुम रथ ले आओ। तब तीक्ष्णधार भाला धारण करनेवाले रोमपाद ने उनके चरणो को प्रणाम किया और कहा कि अब राजाधिराज (दशरथ) की चिन्ता मिटी। वह गर्जन करनेवाले रथ को ले आया और निवेदन किया कि हे ज्ञानियो में श्रेष्ठ ! आप सुन्दर ललाट, लक्ष्मी-सदृश शांता के साथ इस रथ पर सवार हो जाइए।

वक्र धनुष को धारण करनेवाला रोमपाद हाथ जोडकर खड़ा रहा। ऋष्यशृंग मुनि जो अपूर्व वेदी के समान थे, अपनी पत्नी शांता के साथ रथ पर (आसीन हो) अयोध्या की दिशा मे चल पडे। उनके साथ शान्तस्वरूप अनेक ऋषि उनका अनुगमन करते हुए चले।

धर्मदेवता, इंद्रादि देवगण, यह सोचने लगे कि उत्तेजित राक्षसो के अत्याचारो का विध्वंस करनेवाले (समस्त सृष्टि) के आदिभूत भगवान् जिस उपाय से (इस मर्त्यलोक मे) अवतरित हो, वह उपाय (ये मुनिवर) अवश्य करने की कृपा करेंगे—यह सोचकर अत्यन्त आनन्दित हो उठे और दुंदुभि बजाकर श्रेष्ठ पुष्पो की वर्षा की।