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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 549 में से

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पृष्ठ 46

३२ कंब रामायण

उसी समय दूतों ने अयोध्या पहुँचकर, पर्वत-समान भुजावाले राजाधिराज (दशरथ) को ऋष्यशृंग के आगमन का समाचार दिया, यह समाचार सुनते ही दशरथ भी आनन्द-रूपी असीम पारावार में गोते लगाने लगे।

चक्रवर्ती (दशरथ) कूदकर उठे, रथ पर सवार हुए और ऋष्यशृंग के स्वागत के लिए प्रस्थान किया। देवों ने पुष्पवृष्टि की, मुनिगण आशीर्वाद देने लगे, नगाड़े बजे, और अन्य कई प्रकार के वाद्य भी बजने लगे, पाप-कर्म समूल नष्ट हो गये।

चक्रवर्ती दशरथ ने, जिसके नगाड़े भीषण गर्जन करते थे विचार किया कि अब मेरे मन की पर्वत-समान चिन्ता मिट गई और (नगर से) तीन योजन दूर आगे बढ़कर उस मुनि का स्वागत किया।

जिन्हें देखने से ऐसा प्रतीत होता था, मानो समस्त तपस्याएँ एक निष्कलंक (व्यक्ति का) रूप धारण करके आई हों, वे अपने कटि के वल्कल एवं (ऊपर धारण किये) अजिन (हरिण-चर्म) के साथ अत्यन्त गंभीर दीख रहे थे।

जो देवताओं के कष्टों और राक्षसों के बल को मिटाने के कार्य में समर्थ थे एवं जिनके विशाल करों में यथाविधि छत्र, ब्रह्मदंड और कमंडल शोभित थे।

(ऋष्यशृंग के दर्शन होते ही) चक्रवर्ती उसी स्थान पर रथ से उतर पड़े और पैदल चलकर (उन मुनिवर के) युगल चरण-कमलों पर जा गिरे। उन मुनि ने जो चतुर्वेद-रूपी लता के फैलाने के लिए अलान के समान थे, अर्थगर्भित वाक्यों में (राजा को) आशीर्वाद दिये।

दशरथ ने मेघ के समान दान देनेवाले अपने दोनों हाथ जोड़कर अन्य ऋषियों को भी नमस्कार किया और उनके आशीर्वाद प्राप्त किये। गभीर जल में रहनेवाली मछली के समान नयन से युक्त शान्ता के साथ ज्ञानी (ऋष्यशृंग) को रथ पर आसीन कराकर यथाविधि (अयोध्या को) ले आये।

मुकुटधारी चक्रवर्ती (दशरथ) कमल जैसे मुख एवं सौन्दर्यवाली रमणियों की जय-जयकार के साथ मुनिवर को साथ लेकर शीघ्र ही अयोध्या पहुँच गये, जहाँ (उनके स्वागत में) नगाड़े गरज रहे थे।

(वसिष्ठ महर्षि) जिन्होंने चोर के समान पापकर्म में निरत पाँचों इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया था और श्रेष्ठ ऋष्यशृंग, जो मूर्त्तिमान् वेदों-जैसे थे, आपस में ऐसे मिले कि सारी राज-सभा दीप्त हो उठी।

दशरथ ने उन वेद-समान ऋषिश्रेष्ठ ऋष्यशृंग को श्रेष्ठ रत्नमंडप में ले जाकर निष्कलंक स्वच्छ रत्नखचित आसन पर बिठाया और सभी कर्त्तव्य उपचार आनन्द के साथ सुसंपन्न किये, फिर ये वचन कहे —

हे श्रेष्ठों में श्रेष्ठ। धर्म एवं तपस्या के जैसे शोभायमान पावन रूप। (आपके यहाँ पधारने से) मेरा पुरातन वंश, जो आपकी कृपा से उज्ज्वल हो उठा है, अब आगे भी बढ़ता रहेगा और शासन पर स्थिर रहेगा, मैंने पिछले जन्म में जो तप किये, वे भी अब विफल नहीं होंगे।

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