कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ३३
दशरथ के ये वचन कहते ही ऋष्यशृंग उन्हें उल्लसित दृष्टि से देखकर बोले— राजाओं के राजन्, सुनो, तुम्हे वसिष्ठ नामक एक महान् तपस्वी की सहायता प्राप्त है. तुम्हारे कार्य पुण्यमय हैं, क्या तुम्हारी समानता इस संसार के क्षत्रिय कर सकते हैं?
इसी प्रकार के विविध मीठे वचनों को कहकर पूछा—पर्वत के समान दृढ धनुष धारण करनेवाली स्फीत भुजाओंवाले (हे राजन्) तुमने मुझे यहाँ जो बुलाया है क्या वह अश्वमेध यज्ञ करने के लिए ही, स्पष्ट कहो।
(दशरथ ने निवेदन किया) मैंने अनेक वर्षों तक, बिना किसी कष्ट के, धरती का भार उठाया है; अबतक मेरे कोई संतान नहीं हुई (जो मेरे बाद इस भार का वहन करे); आप हमें समुद्र से घिरी हुई इस पृथ्वी की रक्षा करनेवाले पुत्र दीजिए और मुझे अमल यशस्वी बनाइए।
दशरथ के इस प्रकार वचन कहते ही; ऋष्यशृंग ने कहा—राजन् ! तुम चिन्ता मत करो; एकमात्र इस मर्त्य-लोक की ही क्या, चतुर्दश भुवनो की रक्षा करनेवाले महावली पुत्रों का प्रदान करनेवाला यज्ञ करने के लिए अभी, इसी स्थान पर, सन्नद्ध हो जाओ।
उस यज्ञ के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ (सेवकगण) शीघ्र ही ले आये; चक्रवर्ती (दशरथ) भी परिशुद्ध (सरयू) नदी में स्नान करके वेदशास्त्रोक्त विधान से बिना किसी त्रुटि के सम्यक् रीति से बनाई गई यज्ञशाला में जा पहुँचे।
शब्दायमान हो बढनेवाली तीनों अग्नियों को प्रज्वलित करके उसमे आहुति देने लगे। बारह मास व्यतीत होने के पश्चात् देव-वाद्य बज उठे. देवगण विशाल आकाश में इस प्रकार छा गये कि कहीं थोडी भी जगह खाली नही रही।
विकसित कमल जैसे कान्तिमय वदनवाले देवता, सुगंधित कल्पवृक्ष के पुष्प बरसा रहे थे; (उसी समय) सद्गुणो से विभूषित ऋष्यशृंग ने भी उस अग्नि के मध्य पुत्र-दात्री आहुतियों का होम किया।
उसी समय (उस होमकुण्ड से) एक भूत प्रकट हुआ. जिसके केश धधकनेवाली अग्नि के समान थे और जिसके नेत्र लाल थे, वह एक मनोहर सोने के थाल में पवित्र मधुर सुधा-सदृश एक पिंड लिये हुए होम की अग्नि से शीघ्रता के साथ ऊपर को उठा.
उसने थाल को धरती पर रख दिया और पुनः होमाग्नि में अदृश्य हो गया। तपस्वी ऋष्यशृंग ने दशरथ से कहा—इस (भूत के) दिये हुए अमृतमम पदार्थ को यथाक्रम अपनी पत्नियों को दो।
उन मुनिवर के आज्ञानुसार ही दशरथ चक्रवर्ती ने उस अमृत-पिंड का एक भाग धूम के सदृश काले, कोमल और घुँघुराले अलकों तथाविम्बफल के समान अधरोवाली लावण्य- पूर्ण कौसल्या को दिया। उस समय शंखध्वनि हो रही थी।
उस कोशल देश पर, जहाँ के तालाबों, नदियों और बागों में हंस विचरते हैं, शासन करनेवाले दशरथ चक्रवर्ती ने बचे हुए पिंड का आधा भाग केकय-राजकुमारी कैकयी के हाथ में दिया : तब देवता आनन्दोच्चारण कर रहे थे।
(इसके बाद) दशरथ चक्रवर्ती ने, जो शत्रुओं के हृदयों में कंपन उत्पन्न करने-