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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 48
३४कव रामायण

वाले बल से विभूषित थे और निमि नामक चक्रवर्ती के श्रेष्ठ वंश में उत्पन्न थे, उस अमृत-पिंड का बचा हुआ भाग सुमित्रा को दिया। देवपति इन्द्र यह समझकर कि अब मेरा शत्रु मिट गया, अपने साथियों के साथ हर्ष-रव कर उठा।

और, उदार स्वभाववाले उन चक्रवर्ती ने थाल में अमृत पिंड के जो टुकड़े (पिंड को तोड़ने पर) बिखरे थे, उन्हें भी सुमित्रा देवी को दे दिया; (इस समय) शत्रुओं के वाम अंग और संसार के अन्य सभी प्राणियो के दक्षिण अंग फड़क उठे।

अश्वमेध यज्ञ तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ के सभी कार्य मुनि ने संपन्न कराये। यज्ञ समाप्त होने पर सब लोगों से अपनी प्रशंसा सुनते हुए, संसार का शासन करनेवाले दशरथ आनन्द के साथ (यज्ञ-मंडप से) बाहर आये।

विधि-विहित यज्ञ-कर्म जब समाप्त हुए, तब मर्दल आदि वाद्य जोरों से बज उठे; (राक्षसों के अत्याचारों के कारण) दुःख भोगनेवाले दुःख-मुक्त हुए, चक्रवर्ती सभी मंडप से आ पहुँचे।

(राजा दशरथ ने) वेदों के अनुसार सब विहित कर्म अपने कुलदेवता विष्णु-भगवान् को समर्पित किये,¹ उसी विधान के अनुसार देवताओं को भी हविर्भाग दिये, तथा महामहिम श्रेष्ठ विप्रों को भी अपने करों से स्वर्ण-दान दिये।

(यज्ञ से उपस्थित) राजाओं को धन, रथ, घोड़े, अमूल्य सुन्दर वस्त्र आदि प्रत्येक की योग्यता के अनुसार भेंट किये, फिर बाजे-गाजे के साथ सरयू नदी के सुन्दर घाट पर पहुँचे और (अघमर्षण) स्नान किया।

नगाड़े बज रहे थे, मुक्ता-मंडित श्वेतच्छत्र ऊपर छाया दे रहा था, राजे घेरे हुए आ रहे थे, इस प्रकार दशरथ राजसभा में आ पहुँचे, अपने वेदज्ञान से ब्रह्मा को भी लजानेवाले वसिष्ठ महर्षि के चरणों पर नत हुए।

फिर तपस्वी वसिष्ठ की आज्ञा से, हिरन के सींग जैसे सींग से शोभायमान ऋष्यशृङ्ग के चरणों को प्रणाम करके ये वचन कहे—हे तपस्विबर ! (आप की कृपा से) मैं कृतकार्य हो गया, इससे बढ़कर प्राप्य फल मेरे लिए और क्या हो सकते हैं ?

हे प्रभो ! आपकी कृपा से यह जन दुःखमुक्त हो, कृतार्थ हो गया। (दशरथ की बात सुनकर) ऋष्यशृङ्ग मन में आनंदित हुए और आशीर्वाद दिये। अपने साथ आये हुए मुनिगण के सहित वे रथ में बैठकर (रोमपाद की नगरी के लिए) चल पड़े।

दशरथ नरेश ने दुःखों से मुक्त हो फिर एक बार नम्रता के साथ मुनियों के चरणों की वंदना की वे (मुनिवर) आनंदित हो, आशीर्वाद देते हुए वहाँ से (अपने-अपने स्थानों को) चले गये। दशरथ चक्रवर्ती सुखी जीवन बिताने लगे।

कुछ दिन व्यतीत होने पर चक्रवर्ती की तीनों पत्नियाँ गर्भधारण का क्लेश अनुभव करने लगीं। उनके अनुपम सुन्दर मुख ही नहीं, परन्तु उनके मनोहर शरीर भी चन्द्र के समान कांतिपूर्ण दीखने लगे।


¹ वैष्णवों के बीच यह प्रथा प्रचलित है कि कभी कार्य करने के बाद उसे भगवान् विष्णु को समर्पित कर देते हैं। इसे 'सात्त्विक त्याग' कहते हैं।