कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
अध्याय ५
शुभावतार
एक दिन दशरथ, ब्रह्म-समान तपस्वी वसिष्ठ को प्रणाम करके कहने लगे—
मेरे लिए माता, पिता, दयालु भगवान्, ऐहिक, आमुष्मिक सुख—सब कुछ आप ही हैं।
मेरे पूर्व पुरुषों ने ससार की रक्षा इस प्रकार की थी कि उनकी कीर्त्ति सदा अक्षय
बनी हुई है; उनके कारण इस वंश का यश सूर्य से भी अधिक उज्ज्वल बना हुआ है अब
भी मै आपकी कृपा से इस विशाल धरती की उसी प्रकार से रक्षा कर रहा हूँ।
मै सभी शत्रुओं का नाशकर साठ सहस्र वर्ष तक शासन करता रहा हूँ। अब
मुझे इस बात के अतिरिक्त अन्य कोई भी चिन्ता नहीं है कि मेरे पश्चात् यह संसार शासक
के अभाव में दुःख पायेगा।
(मेरे शासन मे) महान् तपस्या-संपन्न मुनि तथा विप्र बिना किसी विघ्न-बाधा
के सुखमय जीवन व्यतीत करते रहे हैं; मेरे पश्चात (संरक्षक के न होने से) सब लोग
बहुत दुःख पायेंगे—यही बात मेरे मन में गहरी व्यथा उत्पन्न कर रही है।
उस चक्रवर्त्ती ने, जिसके विराट् प्रासाद के द्वार पर नगाड़े बजते रहते हैं और
जो मणिमय मुकुट धारण किये हुए हैं, जब यह बात कही, तब कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा) के
पुत्र (वसिष्ठ) सोचने लगे।
तरंगायित क्षीर-सागर के मध्य शेषनाग की पीठ पर नील पर्वत के सदृश शयन
करनेवाले, महान् मेघ-सदृश विष्णु भगवान् ने दुःख से पीडित देवों को यह वचन दिया था
कि दूसरो को विनाश में निरत (रावण आदि) राक्षसो का मै वध करूँगा।
स्वर्ग-वासी देवता असुरों के आतंक से पीडित होकर नीलकंठ (शंकर) के पास
गये और प्रार्थना की कि हे भगवन्, असुरों से हमारी रक्षा कीजिए। शिवजी ने उत्तर
दिया—'हमसे यह कार्य नही हो सकता।' तब शिवजी को भी साथ लेकर देवता ब्रह्मा
के पास गये।
देवताओ का समाज उत्तर दिशा मे चलकर मेरु पर्वत पर स्थित रत्नमय मंडप
में पहुँचा, जहाँ चतुर्मुख (ब्रह्मा) निवास करते हैं। ब्रह्मा की प्रस्तुति करके, उन्होने राक्षसो
के आतंक तथा अपनी दुःख की कहानी उनसे कह सुनाई।
तब ब्रह्मा ने शिवजी से कहा—एक बार रावण का पुत्र मेघनाद इंद्र को बंदी
बनाकर लंका ले गया था, मैने उसे (मेघनाद से) छुड़ाया था। (अब आगे मै वैसा कोई
कार्य नही कर सकता)।
बीस करो तथा दस शिरो से युक्त, सद्बुद्धि-रूपी संपत्ति से हीन उस (रावण) के
बल का प्रतिकार हमसे संभव नही; नील मेघ के सदृश नयनवाले दयासागर विष्णु भगवान्
ही युद्ध करके (असुर-बाधाओ का) निवारण करेंगे, तो हमारा निस्तार हो सकता है—इस
प्रकार विचार कर—
उन्होने ऊँची तरंगों से पूरित क्षीर-सागर मे योग-निद्रा मे शयन करनेवाले,
२६ कंच रामायण
उन्नत मरकत पर्वत-सदृश विष्णु का अपने मन में ध्यान किया, और कर-कमल जोडकर खडे रहे, उस समय ज्ञानियो को परमगति प्रदान करनेवाले (विष्णु) भगवान् —
गरुड पर आसीन होकर उनके सम्मुख प्रकट हुए, जैसे कोई नीलमेघ, विकमित कमलपुजो १ के साथ, दीप्तिमान् सूर्य और चन्द्रमा को अपने दोनो पाश्र्वो मे धारण किये, विकमित कमल पर आसीन लक्ष्मी के संग, स्वर्ण पर्वत पर चढ आया हो ।
नीलकंठ और कमलासन (ब्रह्मा) अन्य देवताओ के साथ उठ खडे हुए और विष्णु भगवान् के सम्मुख आकर उनकी स्तुति करने लगे। वे ज्यो-ज्यो स्तुति करते, त्यो-त्यो उनका आनन्द बढता ही जाता और वे सब विष्णु के चरणो मे नत हो गये।
(उन देवताओ ने) तुलसीदल-शोभित विष्णु के चरण-कमलो को वारी-वारी से अपने मस्तक पर धारण किया और यह मानकर कि राक्षसो का नाश अभी हो गया, उमंग से भर गये और आनन्द-मदिरा का पान करके मत्त हो गये और नाचने, गाने तथा इधर-उधर दौड़ने भी लगे।
स्वर्णगिरि से उतरनेवाले मेघ के समान मेरे स्वामी २ (विष्णु भगवान्) गरुड की भुजाओ पर से नीचे उतर आये और गगनचुंबी मडप मे आ विराजे। वहाँ सिंह की आकृति-वाले सोने के सिंहासन पर आसीन हुए।
ब्रह्माजी के साथ देवर्षि, स्वर्ग-वासी (देवता) तथा चन्द्र को अपनी जटा पर धारण किये त्रिशूलधारी शिव, सब विस्मयाविष्ट हो और उमंग से भरकर भगवान् के निकट उपस्थित हुए और अत्याचारी राक्षसों के क्रूर कृत्यो का वर्णन करने लगे।
हे लक्ष्मीनाथ ! शरीर-बल से परिपूर्ण दशानन (रावण) तथा उसके अनुज आदि राक्षसो के कारण स्वर्गवासी और मर्त्यलोक के निवासी अपने कर्त्तव्य कर्म भी नही कर पा रहे हैं, अब हमे जीने का मार्ग नही मिल रहा है—यो कहकर उन्होने ठंडी आह भरी।
जब देवताओ ने ये वचन कहे, तब चन्द्र एव मधु-भरे पुष्पो को अपनी जटा मे धारण करनेवाले शिवजी ने उन देवो को अपने हाथ से मौन रहने का सकेत करते हुए स्वयं स्वामी की ओर देखकर, इस प्रकार निवेदन करने लगे--
अरुण नयनो से शोभित हे प्रभु ! राक्षस कहलानेवाले ये लोग, हमारे द्वारा दिये गये शक्तिशाली वरों के प्रसाद से तीनो भुवनो को आहत कर रहे हैं। अब (यदि आप उनका) सहार नही करेंगे, तो क्षणमात्र में वे तीनो भुवनो को मिटा देंगे।
शिवजी के यो कहने पर देवोने भगवान् की स्तुति की; तब अत्यत सुगन्धित तथा सुन्दर तुलसी की माला धारण किये हुए विष्णु ने उनसे कहा--आपलोग दुःख मत कीजिए, मै धरणी पर वचक जनो के शिर काटकर (आपको) दुःख-मुक्त करूँगा, आप मेरी एक बात सुनिए—
स्वर्ग के निवासी आप सब वानर-रूप धारण कर काननो, पर्वतो, और सुगंध-भरे उपवनो मे, दलबल के साथ, जाकर रहिए। क्षीर-सागरशायी विष्णु ने दया करके आगे कहा-
१.कमलपुज—कर, चरण आदि, सूर्य और चन्द्रमा—शख और चक्र, स्वर्ण का पर्वत—गरुड ।
२.कवर विष्णु-भक्त थे, इसलिए उन्होने 'मेरे स्वामी' कहकर सबोधित किया है ।
बालकाण्ड २७
मायावी नीच राक्षसों के वर और उनके जीवन को अपने तीक्ष्ण शरों से विनष्ट करने के लिए हम, चतुरंग सेना-रूपी सागर के प्रभु दशरथ के पुत्र बनकर धरती पर जन्म लेंगे।
शंख, चक्र एव आदिशेष ( जिसका विष वडवाग्नि को भी झुलसा देता है ) मेरे अनुज बनकर मेरी चरण-सेवा करेंगे । इस प्रकार हम प्राचीरों से आवृत्त अयोध्या में अवतार लेंगे।
भगवान् के इस प्रकार कहने पर ( वे देवता ) यह जानकर कि सुगंधित तुलसी-धारी विष्णु ने हमारी रक्षा की, आनन्द से उछल पड़े, और कृतज्ञता-सूचक मंगल-गीत गाने लगे ।
हमारी विपत्तियाँ दूर हो गईं—यह सोचकर इन्द्र आनन्दित हो उठा • परिशुद्ध कमलपुष्प पर निवास करनेवाले (ब्रह्मदेव ), चन्द्रशेखर (शिव) और ऊँचे स्वर्ग के निवासी (देवता) कहने लगे कि हमारी अवनति (नीची अवस्था) का अंत हो गया । विष्णु भगवान ने, जिन्होंने विशाल भूमि को अपने अन्तर्गत कर लिया था, गरुड पर चरण रखा।
मेरे प्रभु के गरुड पर सवार होकर चले जाने के पश्चात् पितामह ने देवताओं से कहा—रीछों के राजा जाम्बवान्, जो कि मेरे अंशभूत हैं, पहले ही धरती पर अवतरित हो चुके हैं । विष्णु के कथनानुसार आप सब भी पृथ्वी पर अवतार लीजिए ।
इन्द्र ने कहा—शत्रुओं के लिए अशनितुल्य (वालि) तथा उसका पुत्र (अङ्गद) मेरे अंश हैं, सूर्य ने कहा कि उस (वालि) का अनुज (सुग्रीव) मेरा अंश है और अग्निदेव ने 'नील' को अपना अंश बतलाया ।
वायुदेव ने कहा कि 'मारुति' मेरा अंश हैं, दूसरे देवता भी (शत्रुओं का) विध्वंस करनेवाले वानर बनकर भूमि पर जाने को सन्नद्ध हो गये, शिवजी ने भी वायु के अंशभूत हनुमान् को ही अपना अंश बताया , देवताओ ने अपने-अपने अंश को लेकर अन्यान्य दिशाओं में भी जन्म लिया ।
कृपालु कमलनयन (विष्णु भगवान्) के कथनानुसार ही कमलासन (ब्रह्मा ); नीलकंठ ( शिव ) तथा अन्य देवताओ के अंश, मनोहर काननों में और अन्य भू-प्रदेशों में वानर बनकर अवतरित हुए। इस प्रकार, अपने-अपने अंश के रूप में पुत्रों को उत्पन्न करनेवाले देवता अपने-अपने स्थान को लौट गये।
पूर्वकाल में निष्पन्न इस वृत्तान्त को मन में विचारकर वसिष्ठ ने कहा पर्वत-समान बलिष्ठ भुजावाले नृपते ! तुम चिन्ता मत करो • जो यज्ञ चौदह भुवनों पर शासन करनेवाले पुत्रों को दे सकता है, उसे अविलंब संपन्न करो, तो तुम्हारी मनोव्यथा दूर हो जायगी ।
जब वसिष्ठ ने इस प्रकार कहा; तब बड़ी उमंग से भरे हुए गजाधिराज (दशरथ) ने उस महान् ऋषि के चरणों पर नतमस्तक होकर निवेदन किया—मैं तो आपकी ही शरण में रहता हूँ, मुझे कोई दुःख किस तरह सता सकता है ? उस यज्ञ के लिए मेरे करने योग्य कार्य क्या-क्या हैं, कहने की कृपा कीजिए ।
२८ कंब रामायणं
दोष-रहित देवों और अन्य ( दानव, दैत्य, मनुष्य, मृग आदि ) लोगों को भी जन्म देनेवाले काश्यप के पुत्र, विभांडक मुनि हैं, जो गंगाधारी शिव के लिए भी स्तुत्य हैं। वे महान् वेदों के ज्ञान तथा धर्माचरण में अपने पिता की समानता करनेवाले हैं।
शास्त्रज्ञान, नीतिमार्ग तथा सत्याचरण में जो चतुर्मुख ब्रह्मा के समान हैं, जिनके सिर पर एक सींग है और जो संसार के सभी मनुष्यों को पशु-तुल्य समझते हैं, अब यहाँ आये और पुत्र कामेष्टि-यज्ञ संपादन करें।
आदिशेष के सहस्र फणों पर स्थित इस पृथ्वी के सभी मानवों को पशुवत् समझने-वाले महान् तपस्वी, ब्रह्मदेव एवं शिवजी की भी प्रशंसा के योग्य, उस शान्त महर्षि ( ऋष्य-शृंग ) के द्वारा यदि यज्ञ संपन्न हो, तो तुम्हारे पुत्र उत्पन्न होंगे।
महर्षि वसिष्ठ के इस प्रकार कहते ही, उनके चरण-कमलों की वन्दना कर, चक्रवर्ती दशरथ ने विनती की—हे प्रभो ! अकलंक, गुणों से भूषित वह महान् तपस्वी ऋष्य-शृंग कहाँ रहते हैं ? अब मेरा कार्य क्या है ? बताइए।
(वसिष्ठ ने कहा)—स्वायंभुव मनु के वंश में उत्पन्न उत्तानपाद नामक नरपति के, ‘पूत’ नामक बड़े-बड़े पापों को मिटानेवाले, पुत्र रोमपाद नामक राजा रहते हैं, जो शासन के योग्य सभी आवश्यक गुणों से विशिष्ट हैं, प्रेम एवं शीतल कृपा के आगार हैं और ( शत्रुओं के लिए ) सभी प्रकार से अजेय हैं।
उस रोमपाद द्वारा शासित राज्य में दीर्घकाल से वर्षा नहीं हुई थी, इस कारण जब बड़ा अकाल पड़ा, तब उन नरेश ने बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ ऋषियों को बुलाकर महादान दिये। फिर भी वर्षा नहीं हुई, तब ऋषियों ने उन रोमपाद से कहा कि जब इस देश में ऋष्यशृंग आयेंगे, तब अवश्य यहाँ वर्षा होगी।
राजा विचार करने लगे कि भूतल के सभी मनुष्यों को पशुवत् माननेवाले, निष्कलंक गुण-भरे उस तपस्वी को यहाँ ले आने का उपाय क्या है ? तब उज्ज्वल ललाट, दीर्घ नयन, रक्ताधर, मोती के तुल्य दाँत तथा मृदु स्तन-युगल से शोभित कुछ वारवनिताओ ने आकर राजा से निवेदन किया - हम जाकर उस तपस्वी को यहाँ ले आयेंगे।
उनका कथन सुनकर रोमपाद प्रसन्न हुए और आभूषण, वस्त्र, शुभ द्रव्य आदि देकर कहा कि हिमकर को भी लजानेवाले ललाट, बलिष्ठ बाँस-जैसी भुजाओं, कृश कटि, पीन स्तनों, काले केशों, भीत नेत्रों और बिंबाधर से युक्त पुष्पलता-तुल्य नारियों, तुमलोग जाकर उन्हें ले आओ। वे नारियाँ राजा को नमस्कार कर रथ पर चढ़कर चलीं।
स्वर्णाभरणों से विभूषित वे नारियाँ, कई योजन पारकर, उस स्थान पर पहुँचीं, जो ऋष्यशृंग के आश्रम से एक योजन दूर था। वहाँ वे पर्णकुटी बनाकर तपस्वियों के जैसे रहने लगीं।
काले और दीर्घनयनोंवाली वे वारवनिताएँ. उस महातपस्वी ऋष्यशृंग के पिता की अनुपस्थिति में उनके आश्रम में जा पहुँचीं। उन्हें देखकर ऋष्यशृंग ने समझा कि ये भी संसार के लोगों को मृग समान मानकर अरण्य में तपस्या करनेवाले ऋषि हैं और उनका उचित सत्कार किया।
बालकाण्ड २६
ऋष्यशृंग ने उन्हे अर्घ्य आदि उपचारो के साथ उचित आसन दिये। उनसे मधुर बाते की, पलाश-पुष्प-सदृश अधरवाली वे नारियाँ मुनि को प्रणाम करके शीघ्र ही अपनी पर्णशाला को लौट आईं।
सुन्दर आभूषण पहनी हुई उन रमणियो ने कुछ दिनो के पश्चात् देवामृत से भी मधुर कटहल, केले तथा आम के फलो के साथ मीठे नारियल भी उस ऋषि को प्रेम के साथ समर्पित किये और विनती की कि हे अपूर्व तपस्संपन्न, आप इनका भोजन करें।
इसी प्रकार जब कुछ काल व्यतीत हो गया, तब एक दिन सुन्दर और उज्ज्वल ललाटवाली उन रमणियो ने ऋष्यशृंग से विनती की कि हे ऋषि ! आप हमारे आश्रम में पधारे। मुनि भी उनके साथ चल पड़े।
अपने मन के ही समान दूसरो को मोह में डालनेवाली वे रमणियाँ उमंग-भरी और आश्चर्य-चकित होकर, उस श्रेष्ठगुणभूषित मुनि को साथ लेकर दीर्घ मार्ग पारकर यह कहती हुई चलीं कि 'हे महर्षे ! वह देखो, वह, वही हमारा आश्रम है।'
सब विभूतियो से सपन्न (राजा रोमपाद के) नगर में उस ऋषिश्रेष्ठ के पदार्पण करने के पहले ही आकाश के बादलो ने, नीलकंठ के कंठस्थ विष जैसे काले होकर, घोर गर्जन के साथ ऐसी वृष्टि की कि तालाब, नदी आदि सभी जलाशय जल से परिप्लावित हो गये।
गगन पर उमड़कर काले मेघो के वर्षा करने से नदियो और तलाबो की प्यास बुझ गई। ईख, लाल धान आदि की फसले लहलहाने और बढ़ने लगी। यह देखकर उस समय रोमपाद नरेश ने विचार किया कि—
बिंबफल के समान अधर, कमलतुल्य वदन, मोती के जैसे स्वच्छ दाँत, धूम के समान काले केशपाश—इनसे शोभित वारवनिताओ के प्रयत्न से, काम, क्रोध और मोह इन तीनो से रहित हो उन्नत हुए ऋष्यशृंग महर्षि उस नगर में पधार रहे हैं।
सुगठित भुजाओवाले वह रोमपाद, वेदो के ज्ञाता मुनियो और अपनी सेना के साथ दो योजन आगे बढ़कर (वहाँ) सुगंधित केशवाली रमणियो के मध्य तप के बड़े पर्वत के समान ऋष्यशृंग मुनि के सम्मुख पहुँचा।
'अब हमारा त्राण हो गया'—यो कहता हुआ आनन्द के साथ वह ऋष्यशृंग के चरणो पर गिरा; उसके नयनो से अश्रु बहने लगे; फिर (राजा के चरणो पर गिरकर) नमस्कार कर उठनेवाली उन वेश्याओ से उसने कहा—तुम लोगो ने अपने प्रयत्न से मेरी विपदा दूर की है।
जब रोमपाद और मुनिगण वहाँ आये, तब ऋष्यशृंग को यह ज्ञान हुआ कि यह सब कपट है। उस समय देवता भी भयभीत हो उठे, (परन्तु) रोमपाद नरेश की प्रार्थना के कारण महर्षि मर्यादा का उल्लंघन न करनेवाले तरंगायित समुद्र के समान स्थित रहे।
वज्र-समान खड्गधारी उस नरेश ने उस मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम किया और (अनावृष्टि से होनेवाली) अपनी विपदा, जिसे कोई भी दूर नही कर सका था और जो अब ऋषि
३० कम्ब रामायण
के आगमन मे दूर हो गई थी, कह सुनाईं। राजा के बार-वार प्रार्थना करने पर ऋषि के मन का सारा क्रोध दूर हो गया।
विशुद्ध ज्ञानी ओर वरप्रदाता उन महातपस्वी ने दया करके उस नरेश को आशीर्वाद दिये अब राजा तत्त्वज्ञानी मुनियो-सहित रथ पर आरूढ होकर शीघ्र ही नगर जा पहुँचा।
रोमपाद उस ऋषिश्रेष्ठ के साथ अलकृत नगर में पहुँचे, मुनि को अपने स्वर्णमय प्रासाद मे ले जाकर एक अनुपम सिंहासन पर उन्हे आसीन कराया।
उस नरेश ने, इस प्रकार मे कि कोई त्रुटि न रह जाय, अर्घ्य आदि सभी उपचार किये और आनन्दित हो पलाश-सम अधर-युक्त शाता नामक अपनी पुत्री को वेदों के विधान से (उन मुनि को) दान किया।
वसिष्ठ ने कहा—हे राजन्, उस अगदेश की सारी विपत्तियाँ अब मिट गई हैं; वहाँ वर्षा होने लगी है, जिससे वहाँ का दुर्भिक्ष दूर हो गया है। महातपस्वी ओर ज्ञानी वे (मुनि) राजा के द्वारा दान मे दत्त शान्ता नामक नारी की सेवाएँ पाते हुए उसी स्थान पर रहते हैं।
वसिष्ठ के यह कहते ही महाराज दशरथ ने उनके चरणो में प्रणाम करके कहा कि मै अभी जाकर उन (ऋष्यशृंग महर्षि) को ले आता हूँ। (उस समय) राजा लोग उनकी स्तुति कर रहे थे, सुमन्त्र आदि महान् मेधा-शक्ति-सपन्न मंत्रिगण दशरथ के प्रति नतमस्तक हो गये, जब दशरथ रथ पर चढ़े, तब देवताओ ने उन्हे आशीर्वाद दिये और यह विचारकर कि हमारी विपदाएँ आज से मिट गईं, उनपर पुष्पवर्षा की।
'काहल' और अन्य वाद्य समुद्र से भी बढकर घोष करने लगे; वन्दी-मागध तथा वेदपाठी ब्राह्मणो ने राजा की प्रशसा की और आशीर्वाद दिये। मधुर अधरवाली रमणियो ने उनकी जय-जयकार की और उनके आयुष्मान् होने के गीत गाये। समुद्र-तुल्य सेना से घिरे हुए राजा दशरथ दीर्घ मार्ग पार करके सूर्य के जैसे (तेजस्वी) चक्रवर्त्ती रोमपाद के देश में जा पहुँचे।
चरों ने रोमपाद को समाचार दिया कि चक्रवर्ती दशरथ, जिनका यश शाखा-प्रशाखाओ मे बढ़कर व्याप्त हो रहा है, (नगर के) निकट आ पहुँचे हैं। (यह सुनकर) रोमपाद वीर-ककण पहनकर उनकी अगवानी करने चला, दृढ धनुष धारण करनेवाली सागर समान उसकी विशाल सेना भी उसे घेरकर चली; मागध स्तुति-पाठ करने लगे; बड़ी उमंग के साथ वह एक योजन दूर तक गया।
अपने सम्मुख आनेवाले वीर रोमपाद को देखकर दशरथ मेघ-गर्जन करनेवाले अपने रथ से उतर पड़े। उस समय रोमपाद दशरथ के चरणो पर आ गिरा। अपने हृदय में प्रेम की बाढ़-सी उत्पन्न करते हुए दशरथ ने उसे उठाकर गले लगा लिया; रोमपाद ने आनन्द से भरकर तीक्ष्ण-धार भाला धारण किये हुए चक्रवर्त्ती दशरथ से निवेदन किया—
बलवान् भुजाओं से विशिष्ट वह रोमपाद, जिसके भाले की चोट से शत्रु शव-मात्र रह जाते हैं यो कहने लगा—देवलोक की रक्षा करनेवाले भाले से युक्त हे राजन्!
बालकाण्ड ३१
मेरे बड़े तप के फलस्वरूप ही आपका यहाँ पदार्पण हुआ है, अथवा इस राज्य का ही यह पुण्य-फल है। फिर, वह मधुवर्षा करनेवाले पुष्पों की मालाएँ पहने हुए चक्रवर्ती दशरथ को रत्नमय रथ पर आसीन कराकर अपने नगर मे ले आया।
घनी पुष्पमाला को धारण करनेवाला रोमपाद, हाटक नामक स्वर्ण से निर्मित अपने प्रकाशमान प्रासाद के एक मंडप मे पहुँचा, वहाँ रक्तकमल के समान चरणवाली, प्रतिभा-समान सुन्दर रमणियाँ जयगान कर रही थीं; स्वर्णमय सिहासन पर चक्रवर्ती दशरथ को, जिनके भाले में जयमाला लिपटी हुई थी, बिठाकर (अर्घ्य आदि) सभी उपचारों के साथ भोजन कराया। महाराज दशरथ, जिन्होंने देवलोक की रक्षा की थी, (रोमपाद के स्वागत-सत्कार से बहुत) आनन्दित हुए।
उपचार के पश्चात् सुगंधित चंदन दिया। दशरथ को देख रोमपाद ने पूछा - आपके यहाँ पधारने का कारण क्या है, कृपाकर बताइए। जब दशरथ ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया, तब नरेश (रोमपाद) ने विनती की कि हे मनोहर मुकटधारी राजन्! ईर्ष्या (आदि दुर्गुणों) से रहित महान् तपोधन ऋष्यशृंग को मैं वहाँ (अयोध्या में) ले जाऊँगा। (इसके बाद) दशरथ रथ पर सवार हो अपनी सेना के साथ अयोध्या जा पहुँचे।
दशरथ के चले जाने पर वीर रोमपाद वेद-स्वरूप मुनिवर के निवास पर पहुँचा और उनके चरण-कमलो को अपने स्वर्ण-मुकुट पर धारण किया। ऋष्यशृंग ने उससे उसके यहाँ आने का उद्देश्य पूछा, तो उत्तर दिया मुझे एक वर दीजिए। मुनि से पूछा— कौन सा वर ?
रोमपाद ने विनती की-उज्ज्वल कीर्त्तिमान्, नीतिज्ञ, शासक दशरथ, जो कबूतर की रक्षा के निमित्त तुला पर अपने शरीर को रखनेवाले उदारगुण शिवि के प्रसिद्ध वंश मे उत्पन्न हुए हैं, जिनका मन धर्म में सुस्थिर है, जिनके भाले ने देवो को पीडा देनेवाले असुरो के बल को नष्ट किया था, उनके रत्नखचित अट्टालिकाओ से शोभित अयोध्या नगर को (आप एक बार) जाकर और फिर लौटने की कृपा करें।
तपस्वी ऋष्यशृंग ने कहा कि हमने वह वर दिया (स्वीकार किया), अब तुम रथ ले आओ। तब तीक्ष्णधार भाला धारण करनेवाले रोमपाद ने उनके चरणो को प्रणाम किया और कहा कि अब राजाधिराज (दशरथ) की चिन्ता मिटी। वह गर्जन करनेवाले रथ को ले आया और निवेदन किया कि हे ज्ञानियो में श्रेष्ठ ! आप सुन्दर ललाट, लक्ष्मी-सदृश शांता के साथ इस रथ पर सवार हो जाइए।
वक्र धनुष को धारण करनेवाला रोमपाद हाथ जोडकर खड़ा रहा। ऋष्यशृंग मुनि जो अपूर्व वेदी के समान थे, अपनी पत्नी शांता के साथ रथ पर (आसीन हो) अयोध्या की दिशा मे चल पडे। उनके साथ शान्तस्वरूप अनेक ऋषि उनका अनुगमन करते हुए चले।
धर्मदेवता, इंद्रादि देवगण, यह सोचने लगे कि उत्तेजित राक्षसो के अत्याचारो का विध्वंस करनेवाले (समस्त सृष्टि) के आदिभूत भगवान् जिस उपाय से (इस मर्त्यलोक मे) अवतरित हो, वह उपाय (ये मुनिवर) अवश्य करने की कृपा करेंगे—यह सोचकर अत्यन्त आनन्दित हो उठे और दुंदुभि बजाकर श्रेष्ठ पुष्पो की वर्षा की।
३२ कंब रामायण
उसी समय दूतों ने अयोध्या पहुँचकर, पर्वत-समान भुजावाले राजाधिराज (दशरथ) को ऋष्यशृंग के आगमन का समाचार दिया, यह समाचार सुनते ही दशरथ भी आनन्द-रूपी असीम पारावार में गोते लगाने लगे।
चक्रवर्ती (दशरथ) कूदकर उठे, रथ पर सवार हुए और ऋष्यशृंग के स्वागत के लिए प्रस्थान किया। देवों ने पुष्पवृष्टि की, मुनिगण आशीर्वाद देने लगे, नगाड़े बजे, और अन्य कई प्रकार के वाद्य भी बजने लगे, पाप-कर्म समूल नष्ट हो गये।
चक्रवर्ती दशरथ ने, जिसके नगाड़े भीषण गर्जन करते थे विचार किया कि अब मेरे मन की पर्वत-समान चिन्ता मिट गई और (नगर से) तीन योजन दूर आगे बढ़कर उस मुनि का स्वागत किया।
जिन्हें देखने से ऐसा प्रतीत होता था, मानो समस्त तपस्याएँ एक निष्कलंक (व्यक्ति का) रूप धारण करके आई हों, वे अपने कटि के वल्कल एवं (ऊपर धारण किये) अजिन (हरिण-चर्म) के साथ अत्यन्त गंभीर दीख रहे थे।
जो देवताओं के कष्टों और राक्षसों के बल को मिटाने के कार्य में समर्थ थे एवं जिनके विशाल करों में यथाविधि छत्र, ब्रह्मदंड और कमंडल शोभित थे।
(ऋष्यशृंग के दर्शन होते ही) चक्रवर्ती उसी स्थान पर रथ से उतर पड़े और पैदल चलकर (उन मुनिवर के) युगल चरण-कमलों पर जा गिरे। उन मुनि ने जो चतुर्वेद-रूपी लता के फैलाने के लिए अलान के समान थे, अर्थगर्भित वाक्यों में (राजा को) आशीर्वाद दिये।
दशरथ ने मेघ के समान दान देनेवाले अपने दोनों हाथ जोड़कर अन्य ऋषियों को भी नमस्कार किया और उनके आशीर्वाद प्राप्त किये। गभीर जल में रहनेवाली मछली के समान नयन से युक्त शान्ता के साथ ज्ञानी (ऋष्यशृंग) को रथ पर आसीन कराकर यथाविधि (अयोध्या को) ले आये।
मुकुटधारी चक्रवर्ती (दशरथ) कमल जैसे मुख एवं सौन्दर्यवाली रमणियों की जय-जयकार के साथ मुनिवर को साथ लेकर शीघ्र ही अयोध्या पहुँच गये, जहाँ (उनके स्वागत में) नगाड़े गरज रहे थे।
(वसिष्ठ महर्षि) जिन्होंने चोर के समान पापकर्म में निरत पाँचों इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया था और श्रेष्ठ ऋष्यशृंग, जो मूर्त्तिमान् वेदों-जैसे थे, आपस में ऐसे मिले कि सारी राज-सभा दीप्त हो उठी।
दशरथ ने उन वेद-समान ऋषिश्रेष्ठ ऋष्यशृंग को श्रेष्ठ रत्नमंडप में ले जाकर निष्कलंक स्वच्छ रत्नखचित आसन पर बिठाया और सभी कर्त्तव्य उपचार आनन्द के साथ सुसंपन्न किये, फिर ये वचन कहे —
हे श्रेष्ठों में श्रेष्ठ। धर्म एवं तपस्या के जैसे शोभायमान पावन रूप। (आपके यहाँ पधारने से) मेरा पुरातन वंश, जो आपकी कृपा से उज्ज्वल हो उठा है, अब आगे भी बढ़ता रहेगा और शासन पर स्थिर रहेगा, मैंने पिछले जन्म में जो तप किये, वे भी अब विफल नहीं होंगे।
बालकाण्ड ३३
दशरथ के ये वचन कहते ही ऋष्यशृंग उन्हें उल्लसित दृष्टि से देखकर बोले— राजाओं के राजन्, सुनो, तुम्हे वसिष्ठ नामक एक महान् तपस्वी की सहायता प्राप्त है. तुम्हारे कार्य पुण्यमय हैं, क्या तुम्हारी समानता इस संसार के क्षत्रिय कर सकते हैं?
इसी प्रकार के विविध मीठे वचनों को कहकर पूछा—पर्वत के समान दृढ धनुष धारण करनेवाली स्फीत भुजाओंवाले (हे राजन्) तुमने मुझे यहाँ जो बुलाया है क्या वह अश्वमेध यज्ञ करने के लिए ही, स्पष्ट कहो।
(दशरथ ने निवेदन किया) मैंने अनेक वर्षों तक, बिना किसी कष्ट के, धरती का भार उठाया है; अबतक मेरे कोई संतान नहीं हुई (जो मेरे बाद इस भार का वहन करे); आप हमें समुद्र से घिरी हुई इस पृथ्वी की रक्षा करनेवाले पुत्र दीजिए और मुझे अमल यशस्वी बनाइए।
दशरथ के इस प्रकार वचन कहते ही; ऋष्यशृंग ने कहा—राजन् ! तुम चिन्ता मत करो; एकमात्र इस मर्त्य-लोक की ही क्या, चतुर्दश भुवनो की रक्षा करनेवाले महावली पुत्रों का प्रदान करनेवाला यज्ञ करने के लिए अभी, इसी स्थान पर, सन्नद्ध हो जाओ।
उस यज्ञ के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ (सेवकगण) शीघ्र ही ले आये; चक्रवर्ती (दशरथ) भी परिशुद्ध (सरयू) नदी में स्नान करके वेदशास्त्रोक्त विधान से बिना किसी त्रुटि के सम्यक् रीति से बनाई गई यज्ञशाला में जा पहुँचे।
शब्दायमान हो बढनेवाली तीनों अग्नियों को प्रज्वलित करके उसमे आहुति देने लगे। बारह मास व्यतीत होने के पश्चात् देव-वाद्य बज उठे. देवगण विशाल आकाश में इस प्रकार छा गये कि कहीं थोडी भी जगह खाली नही रही।
विकसित कमल जैसे कान्तिमय वदनवाले देवता, सुगंधित कल्पवृक्ष के पुष्प बरसा रहे थे; (उसी समय) सद्गुणो से विभूषित ऋष्यशृंग ने भी उस अग्नि के मध्य पुत्र-दात्री आहुतियों का होम किया।
उसी समय (उस होमकुण्ड से) एक भूत प्रकट हुआ. जिसके केश धधकनेवाली अग्नि के समान थे और जिसके नेत्र लाल थे, वह एक मनोहर सोने के थाल में पवित्र मधुर सुधा-सदृश एक पिंड लिये हुए होम की अग्नि से शीघ्रता के साथ ऊपर को उठा.
उसने थाल को धरती पर रख दिया और पुनः होमाग्नि में अदृश्य हो गया। तपस्वी ऋष्यशृंग ने दशरथ से कहा—इस (भूत के) दिये हुए अमृतमम पदार्थ को यथाक्रम अपनी पत्नियों को दो।
उन मुनिवर के आज्ञानुसार ही दशरथ चक्रवर्ती ने उस अमृत-पिंड का एक भाग धूम के सदृश काले, कोमल और घुँघुराले अलकों तथाविम्बफल के समान अधरोवाली लावण्य- पूर्ण कौसल्या को दिया। उस समय शंखध्वनि हो रही थी।
उस कोशल देश पर, जहाँ के तालाबों, नदियों और बागों में हंस विचरते हैं, शासन करनेवाले दशरथ चक्रवर्ती ने बचे हुए पिंड का आधा भाग केकय-राजकुमारी कैकयी के हाथ में दिया : तब देवता आनन्दोच्चारण कर रहे थे।
(इसके बाद) दशरथ चक्रवर्ती ने, जो शत्रुओं के हृदयों में कंपन उत्पन्न करने-
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वाले बल से विभूषित थे और निमि नामक चक्रवर्ती के श्रेष्ठ वंश में उत्पन्न थे, उस अमृत-पिंड का बचा हुआ भाग सुमित्रा को दिया। देवपति इन्द्र यह समझकर कि अब मेरा शत्रु मिट गया, अपने साथियों के साथ हर्ष-रव कर उठा।
और, उदार स्वभाववाले उन चक्रवर्ती ने थाल में अमृत पिंड के जो टुकड़े (पिंड को तोड़ने पर) बिखरे थे, उन्हें भी सुमित्रा देवी को दे दिया; (इस समय) शत्रुओं के वाम अंग और संसार के अन्य सभी प्राणियो के दक्षिण अंग फड़क उठे।
अश्वमेध यज्ञ तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ के सभी कार्य मुनि ने संपन्न कराये। यज्ञ समाप्त होने पर सब लोगों से अपनी प्रशंसा सुनते हुए, संसार का शासन करनेवाले दशरथ आनन्द के साथ (यज्ञ-मंडप से) बाहर आये।
विधि-विहित यज्ञ-कर्म जब समाप्त हुए, तब मर्दल आदि वाद्य जोरों से बज उठे; (राक्षसों के अत्याचारों के कारण) दुःख भोगनेवाले दुःख-मुक्त हुए, चक्रवर्ती सभी मंडप से आ पहुँचे।
(राजा दशरथ ने) वेदों के अनुसार सब विहित कर्म अपने कुलदेवता विष्णु-भगवान् को समर्पित किये,¹ उसी विधान के अनुसार देवताओं को भी हविर्भाग दिये, तथा महामहिम श्रेष्ठ विप्रों को भी अपने करों से स्वर्ण-दान दिये।
(यज्ञ से उपस्थित) राजाओं को धन, रथ, घोड़े, अमूल्य सुन्दर वस्त्र आदि प्रत्येक की योग्यता के अनुसार भेंट किये, फिर बाजे-गाजे के साथ सरयू नदी के सुन्दर घाट पर पहुँचे और (अघमर्षण) स्नान किया।
नगाड़े बज रहे थे, मुक्ता-मंडित श्वेतच्छत्र ऊपर छाया दे रहा था, राजे घेरे हुए आ रहे थे, इस प्रकार दशरथ राजसभा में आ पहुँचे, अपने वेदज्ञान से ब्रह्मा को भी लजानेवाले वसिष्ठ महर्षि के चरणों पर नत हुए।
फिर तपस्वी वसिष्ठ की आज्ञा से, हिरन के सींग जैसे सींग से शोभायमान ऋष्यशृङ्ग के चरणों को प्रणाम करके ये वचन कहे—हे तपस्विबर ! (आप की कृपा से) मैं कृतकार्य हो गया, इससे बढ़कर प्राप्य फल मेरे लिए और क्या हो सकते हैं ?
हे प्रभो ! आपकी कृपा से यह जन दुःखमुक्त हो, कृतार्थ हो गया। (दशरथ की बात सुनकर) ऋष्यशृङ्ग मन में आनंदित हुए और आशीर्वाद दिये। अपने साथ आये हुए मुनिगण के सहित वे रथ में बैठकर (रोमपाद की नगरी के लिए) चल पड़े।
दशरथ नरेश ने दुःखों से मुक्त हो फिर एक बार नम्रता के साथ मुनियों के चरणों की वंदना की वे (मुनिवर) आनंदित हो, आशीर्वाद देते हुए वहाँ से (अपने-अपने स्थानों को) चले गये। दशरथ चक्रवर्ती सुखी जीवन बिताने लगे।
कुछ दिन व्यतीत होने पर चक्रवर्ती की तीनों पत्नियाँ गर्भधारण का क्लेश अनुभव करने लगीं। उनके अनुपम सुन्दर मुख ही नहीं, परन्तु उनके मनोहर शरीर भी चन्द्र के समान कांतिपूर्ण दीखने लगे।
¹ वैष्णवों के बीच यह प्रथा प्रचलित है कि कभी कार्य करने के बाद उसे भगवान् विष्णु को समर्पित कर देते हैं। इसे 'सात्त्विक त्याग' कहते हैं।
बालकाण्ड ३५
जब उन गर्भवती देवियों के प्रसव का उपयुक्त समय आया, तब विशाल भू-देवी आनंदित हुई ; पुनर्वसु नक्षत्र और देवों से प्रशंसित कर्कटक लग्न, दोनों आनन्द से उछलने लगे।
सिद्ध, यक्ष, यक्षों की देवियाँ, तत्त्वज्ञानी ऋषिगण, देवगण, नित्यसूरिगण¹ पंक्ति-पंक्ति में (खड़े) आनंदित हो जयघोष कर उठे; धर्म-देवता का मनस्ताप मिट गया और वह आनन्द से भर गया।
सद्गुणों से भरी कौसल्या देवी ने, काजल और नव मेघों की छटा दिखानेवाली उस तेजोमय विष्णु को जन्म दिया, जो समस्त सृष्टि को अपने उदर में लीन कर लेता है और जो महान् वेदों के लिए भी ज्ञानातीत है ; ( उनके जन्म से ) ससार की विभूति बढ गई।
देवता लोग दसों दिशाओं में और आकाश में स्थित हो आनन्द-घोष कर रहे थे . इन्द्र आदि प्रणाम करके जय-जयकार कर रहे थे, ऐसे 'पुष्य नक्षत्र' और 'मीन लग्न' से युक्त शुभ घड़ी में निष्कलंक केकय-राजपुत्री ने एक पुत्र को जन्म दिया।
कल्पवृक्ष के अधिपति, पर्वतों के पंखों को काटनेवाले इन्द्र तथा उनके साथी अंतरिक्ष में आनन्द-नाद कर रहे थे। बाँबी में रहनेवाले सर्प ( आश्लेषा नक्षत्र² ) के साथ 'कर्कटक' ( लग्न ) ने भी नया जीवन पाया : पट्टमहिषियों में सबसे छोटी, कोमल लता-तुल्य सुमित्रा ने लक्ष्मण को जन्म दिया।
आदिशेष के सहस्र फणों से वहन की गई भूमि आनन्द से नाच उठी · वेद नाट्य करने लगे; सिंहराशि और मघा नक्षत्र ने ऊँचा जीवन पाया , ( इसी समय ) विष के समान काले नयनोंवाली सुमित्रा ने एक दूसरे पुत्र को जन्म दिया।
'राक्षस मिट गये'—इस खयाल से आनन्दित हो अप्सराएँ नाच उठीं, किन्नर अपने अमृत-मधुर स्वर में गा उठे, विविध वाद्य बजने लगे; देवगण (आनन्द से) इधर-उधर दौड़ने लगे।
रानियों की सखियाँ दौड़कर दशरथ के पास गई, पुत्र-जन्म का समाचार सुनाकर आनन्द-नृत्य किया ; ( ज्योतिष में निपुण ) ब्राह्मणों ने एकत्र होकर नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति का अवलोकन करके कहा कि अब यह संसार दुःखों से मुक्त हो जायगा।
मुखपट्ट³ से सुशोभित गज के समान गंभीर और नीतियुक्त श्रीरामचन्द्र के शुभावतार के समय मेष (चैत्र) मास था • तिथि नवमी थी, नक्षत्र पुनर्वसु था . श्रेष्ठ लग्न
१. वैष्णवों के अनुसार श्रीवैकुंठ में विष्णु की चरण-सेवा करनेवाले गरुड, अनन्त, विष्वक्सेन आदि भक्त 'नित्यसूरि' कहे जाते हैं। भगवान् की आज्ञा से ये लोक-कल्याण के लिए कभी-कभी पृथ्वी पर अवतार भी लेते हैं।
२. लक्ष्मण का जन्म कर्कट राशि और आश्लेषा नक्षत्र में हुआ था। आश्लेषा नक्षत्र सर्पाकार होता है। साँप और केकड़े की मित्रता बतलाकर कवि ने चमत्कार दिखाया है।
३ मुखपट्ट : हाथियों के मुख पर लगाया हुआ सोने या चाँदी का रत्न-जटित कवच।
३६ कम्ब रामायण
कर्कटक था, ग्रहस्थानो की परीक्षा करके देखने पर (विदित हुआ कि) ग्यारहवे गृह में चार ग्रह उच्च स्थान मे थे।
ज्योतिषियो ने श्रीरामचन्द्र की जन्म-पत्री तैयार कर दी; फिर अन्य राजकुमारों की जन्मपत्रियाँ भी उपयुक्त क्रम से परीक्षा करके, स्वर्ण-फलक पर लिखकर, अत्यन्त चतुर देवगुरु बृहस्पति की प्रशंसा करते हुए, पढ सुनाईं।
दशरथ चक्रवर्ती ने आनन्द से (सरयू नदी मं) स्नान किया; अन्न तथा वस्त्र दान दिये, फिर जब श्वेत शंख बज रहे थे, तब वसिष्ठ मुनि को भी साथ लेकर अपने श्रेष्ठ कुमारो के सुख देखे।
दशरथ महाराज ने ढिंढोरा पिटवा दिया और आज्ञा दी कि 'राज्य-भर मे सात वर्षो के लिए लगान माफ कर दिया जाय, अन्न-भंडारो के किवाड़ खोल दिये जायें, ताकि गरीब अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार अन्न उठा ले जायें।
(यह भी आज्ञा दी कि) युद्ध-कार्य बन्द हो जाये; (कारागृह मे) बंदी शत्रु- राजाओ को मुक्त कर दिया जाय और वे अपने-अपने राज्य को चले जायें; ब्राह्मणो के नियमाचरण बिना विघ्न के पूर्ण हो; (मंदिरो मे प्रतिष्ठित) देवता विशेष रीति से किये जानेवाले उत्सवो से संतुष्ट किये जाये।
देवालयो का संस्कार किया जाय, ब्राह्मणो के निवासो, चौराहो और अन्य मार्ग- सन्धियो का नव-निर्माण हो; प्रातः एव संध्या के समय (देवालयो के) देवताओ को मनोहर पुष्पहार समर्पित किये जाये।'
(चक्रवर्ती के यह) आज्ञा देत ही ढिंढोरा पीटनेवालो ने हाथियो पर बैठकर श्रुतिसुखद ढिंढोरे पीटकर सर्वत्र राजाज्ञा सुना दी, नगर-निवासी और विद्युल्लता के समान क्षीणकटि नारियाँ आनन्द-सागर मे डूब गई।
नगर-निवासी प्रेम से भरकर आनन्द-नाद कर उठे, उनके शरीर पुलकायमान हो गये ओर स्वेद-बिन्दुओ से भर गये; राजा के सामने आकर जिन-जिन ने यह शुभ समाचार सुनाया, उन सबको बहुमूल्य भेंट दी गई, कदाचित् उनके मन में यह विश्वास हो गया कि (राजकुमारो के रूप में) स्वयं विष्णु भगवान् ही अवतरित हुए हैं।
विशाल अयोध्या नगर मे नारियो के झुंड, सखियो के समुदाय, पुरुषो के संघ तथा मित्रो के दल ने अतीव आनन्द के साथ तेल, चन्दन, घी, कस्तूरी तथा अन्य सुगन्धित द्रव्य अयोध्या की वीथियो मे छिड़के।
इस प्रकार उस महानगरी के निवासियो ने बारह दिनो तक उत्सव मनाया और अपने मन मे उमड़नेवाले आनन्द के कारण अपने-आपको भूल गये, तेरहवे दिन अमर और सत्य तपस्यावाले वसिष्ठ ने (बालको का) नामकरण करने की सोची।
मगर के साथ युद्ध करते समय जब गजराज के कर ढीले पड गये, तब उसने ज्योंही आदिशेष पर शयन करनेवाले आदिमूल भगवान् विष्णु का स्मरण किया, त्योंही आकर उसकी रक्षा करनेवाले उस परमार्थभूत विष्णु भगवान् का (वसिष्ठ ने) 'श्रीराम' नाम रखा।
बालकाण्ड ३७
अभीष्ट फल देनेवाले वसिष्ठ ने, जिनके लिए वेदो के यथार्थ तत्त्व हस्तामलक के समान थे, (रामचन्द्र के बाद) अवतरित दूसरे ज्योतिःपुंज का 'भरत' नाम रखा।
(जिसके उत्पन्न होते ही) वंचक (राक्षस) लोग मिट गये और देवता लोग तर गये, भूमिदेवी करोड़ो कष्टों से मुक्त हुई; उस अजेय और महाबली ज्योतिर्मय पुत्र का नाम 'लक्ष्मण' रखा।
ज्योतिःस्वरूप चौथा बालक ऐसा लगता था, मानो मोतियों के पुज के मध्य रक्त-कमल विकसा हो। शत्रुओ का नाशक समझकर कुलगुरु ने उसका 'शत्रुघ्न' नाम रखा।
भूलकर भी असत्य पर न चलनेवाले (वसिष्ठ) मुनि ने जब उत्कृष्ट वेदमंत्रो का उच्चारण करके (चारो बालको का) नामकरण किया, तब दान-नदियो ने चक्रवर्त्ती के हाथो से प्रवाहित होकर वेदशास्त्रो मे निपुण ब्राह्मणो के सत्य अर्थों से भरे हुए हृदय-रूपी समुद्र को भर दिया।
समस्त संसार पर शासन करनेवाले राजाधिराज दशरथ (अपने ज्येष्ठ) कुमार से इस प्रकार प्रेम करते थे. मानो नीलोत्पलो के मध्य विराजमान रक्तकमल जैसे अतीव सुन्दर लगनेवाले श्रीरामचन्द्र के अतिरिक्त उन्हे दूसरे प्राण एवं शरीर ही न हों।
चारो कुमार, जिनकी तोतली बोली से अमृत बरसता था, अपनी सुन्दर विकंपित गति से भूमिदेवी की शोभा बढ़ाते हुए उसी प्रकार बढ़ने लगे, जिस प्रकार अंधकार को दूर करते हुए सूर्य बढ़ता है और स्वरो की ध्वनि के साथ चारों वेद (संसार मे) बढ़ते हैं।
समय आने पर धवल चन्द्र से विभूषित शंकर समान वसिष्ठ मुनि ने यथाविधि उनके चूडाकरण तथा उपनयन-संस्कार कराये। (फिर) अमर वेदो एवं अनन्त शास्त्रो का इस प्रकार से अध्ययन कराया कि उनके ज्ञान की कोई सीमा ही नही रही।
देवताओ के एकमात्र नेता रामचन्द्र ने अपने भाइयो के साथ हाथी, रथ, घोड़े आदि सवारी तथा इसी प्रकार की अन्य (क्षत्रियोचित) विद्याओ की शिक्षा यथाविधि प्राप्त की और शत्रुओ का नाश करनेवाली सेना-संचालन कि रीति तथा धनुर्विद्या का भी अभ्यास किया।
वेदो के ज्ञाता मुनि, देवता, भूमिदेवी और उस नगर के सभी निवासी, यह सोचकर कि इन (राजकुमारो) से हमारे कष्ट एवं उनके कारण-भूत पाप और पुण्य कर्म भी मिट जायेंगे, उनके निकट से हटना नही चाहते थे।
श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण नदियो मे, मेघो से आवृत (ऊँचे वृक्षो से भरे) उपवनो मे और तड़ागो में साथ-साथ संचरण करते थे, जैसे ताने के साथ भरनी का सूत मिल गया हो; इससे भूमिदेवी कि तपस्याएँ प्रकट होती थी।
भरत और शत्रुघ्न एक क्षण के लिए भी एक दूसरे से अलग नही होते थे; रथ या घोड़े की सवारी करते समय या वेद-शास्त्रो का अध्ययन करते समय सदा एक साथ रहते थे। वे दोनो मेरे (लेखक के) स्वामी श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण के (जोड़े) जैसे रहते थे।
पराक्रमी राम और भरत अपने अनुज लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ (प्रतिदिन) बड़े सबेरे नगर से बाहर सुगंध-भरे उपवनो मे दयालु मुनियो के पास (अध्ययन के लिए)
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जाते और सूर्यास्त के समय अपने सुन्दर नगर में लौट आते ; उस समय उनका स्वागत करने-वाले नागरिक जन आनन्द के कारण मेघों के आगमन से उल्लसित होनेवाले शस्य के समान दिखाई देते थे ।
अयोध्यापुरी की नारियाँ, वहाँ के पुरुष, जो उन नारियों के पीन स्तनों के अनुरूप ही बलिष्ठ थे, तथा उनके बंधुजन, कौसल्या एवं दशरथ के सदृश ही अपने इष्टदेवों से प्रार्थना करते कि ये कुमार चिरंजीवी हों।
वेदों के लिए अगोचर, अनन्य समान श्रीरामचन्द्र और उनके साथ सदा लगे रहनेवाले लक्ष्मण को आते देखकर लोग उपमा देते हुए कहते थे कि (रामचन्द्र को देखने से ही ऐसा प्रतीत होता है) मानो नीलसमुद्र या कालमेघ उज्ज्वल विकसित कमलपुंज से शोभायमान हो, उत्तर दिशा में स्थित मेरु पर्वत के साथ आ रहा हो ।
हमारे स्वामी रामचन्द्र अपने समक्ष आनेवाले नागरिकों को देखकर अपने मुख-कमल को विकसित कर बड़ी कृपा के साथ पूछते कि तुम्हारे कार्य क्या हैं ? कोई कष्ट तो तुम्हें नहीं है ? तुम लोगों की गृहिणियाँ एवं ज्ञानवान् संतति सुखी और स्वस्थ हैं न ?
नगर-निवासी उत्तर देते—स्वामिन् ! हम बड़े भाग्यवान् हैं , आपके समान राजा को पाने पर हमें किस बात का अभाव हो सकता है ? हमारे लिए सुखी जीवन प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं, (हमारी यही कामना है कि) जबतक ब्रह्मा जीवित रहे, तबतक आप हमारी आत्माओं पर एवं सप्तद्वीप विशिष्ट भूतल पर शासन करते रहे ।
इस प्रकार, उस सुन्दर नगर के निवासियों की प्रशंसा प्राप्त करते हुए तथा अपने भाइयों के द्वारा अनुगत रहते हुए त्रिमूर्तियों के नेता श्रीरामचन्द्र जीवन बिताने लगे ।
राजाधिराज दशरथ समस्त संसार को अपने श्वेत छत्र की छाया में आश्रय देते हुए, नगाड़ों की जय-ध्वनि सुनते हुए, मुनियों के द्वारा प्रशंसित होते हुए, निःसीम आनन्द-सागर में गोते लगाते रहते। (१—१३८)
अध्याय ६
समर्पण पटल
(दशरथ चक्रवर्ती) आकाश को छूनेवाले रत्न-खचित सभा-मंडप में आये । पुष्पभार से लदे कल्पवृक्ष से सुशोभित स्वर्गलोक के निवासियों को, उस मंडप को देखकर इन्द्र के सभा-मंडप की भ्रांति हो गई ।
(मंडप में पहुँचकर महाराज दशरथ) परिशुद्ध और कोमल (गद्देदार) सिंहासन पर विराजमान हुए । (उन्हें देखकर) गगन में संचरण करनेवाली अप्सराओं को यह संदेह हो गया कि यही उनके अधिपति इन्द्र हैं, फिर (दशरथ के) हजार नयन न होने से उनका संदेह दूर हुआ ।
बालकाण्ड ३६
उस सिंहवली दशरथ के सामने एकाएक बड़े क्रोधी विश्वामित्र ऋषि आ उपस्थित हुए, जिन्होंने कभी सभी प्राणियों और लोकों का अलग सर्जन करके नये देवगण तथा नये ब्रह्मा की भी सृष्टि करने का उपक्रम किया था।
मुनि के आते ही, दशरथ झट अपने आसन से उठकर उनके चरणों में नत हुए, जैसे कमलासन (ब्रह्मा) के आगमन पर इंद्र उठ खड़ा हुआ हो. तब दशरथ के वक्ष पर (उनके उठने के साथ) हार भी हिलडुलकर यों किरण फेंकने लगे, जिससे सूर्य की कांति भी परास्त हो जाती थी।
(दशरथ ने मुनि को) प्रणाम कर उन्हें रत्नों से जड़े हुए स्वर्णासन पर बड़े प्रेम से बिठाया और उनके चरणकमल-युगल की अर्चना करके, हाथ जोड़कर कहा कि (आपके आगमन से) मेरे प्रारब्ध कर्म की परंपरा अभी टूट गई। (अर्थात्, मैं कर्म-बंधन से मुक्त हो गया।
हे महात्मन् ! आप इस नगर में सुलभता से पधारे और मैं आपकी परिक्रमा करके आपको प्रणाम कर सका, इस सौभाग्य का कारण यदि इस देश का किया हुआ तप मानें, तो वह नहीं है या मेरे किये अच्छे कर्म मानें, तो वह भी नहीं है : हाँ इसका कारण मेरे पूर्वजों के द्वारा किया हुआ तप ही हो सकता है। जब दशरथ ने इस प्रकार कहा. तब विश्वामित्र ने उत्तर दिया—
शत्रुओं का वध करके उनके मांस से युक्त भाला धारण करनेवाले, हे (दशरथ) ! मुझ जैसे मुनियों और देवताओं पर यदि कोई विपदा आ पड़े, तो सभी पर्वतों का उपहास करनेवाला धवल हिमाचल, क्षीरसागर, कमलासन के नगर (सत्य लोक) तथा कल्पवृक्ष से सुशोभित अमरावती के सदृश सुन्दर अट्टालिकाओं से विभूषित अयोध्या नगरी को छोड़, शरण देनेवाला स्थान क्या अन्य कोई हो सकता है ?
हे चक्रवर्त्ती ! मनोहर कल्पवृक्ष कि छाया में, जहाँ सुगंधित मधु यत्र-तत्र बिखरा रहता है, बैठकर शासन करनेवाला इंद्र जब राज्य से वंचित होकर तुम्हारे श्वेतच्छत्र की छाया में शरणागत हुआ था और अपने कष्ट बताकर सहायता की अभ्यर्थना करते हुए तुम्हारे सम्मुख आया था, तब तुमने ही तो उसपर कृपादृष्टि फेरकर कुलपर्वत-समान भुजाओं से युक्त ‘शंबर’ नामक असुर का समूल नाश करके इंद्र को उसका राज्य दिलवाया था: इन्द्र आज जो राज्य कर रहा है, वह तुम्हारा दिया हुआ ही तो है।
जब विश्वामित्र महर्षि ने इस प्रकार कहा, तब दशरथ के हृदय में आनन्द का एक समुद्र-सा उमड़ पड़ा, जिसका अंत कोई देख नहीं सकता था; उन्होंने हाथ जोड़कर मुनि से विनती की कि राज्यभार प्राप्त करने का जो फल हो सकता है, वह (आपके दर्शनों से) मुझे प्राप्त हो चुका, अब मुझे जो करना हो, उसकी आज्ञा दें तब विश्वामित्र ने उत्तर दिया--
मैं एक यज्ञ करना चाहता हूँ; उस यज्ञ की रक्षा उन राक्षसों से करनी है, जो उसमें विघ्न डालने आयेंगे, जिस प्रकार काम, क्रोध आदि दुर्गुण, मुनियों को डराते हुए उनके पास आ पहुँचते हैं तुम अपने चार पुत्रों में श्यामल (श्रीरामचन्द्र) को, युद्ध में अडिग रहकर उन राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा करने का आदेश देकर मेरे साथ भेज दो।
२० कंब रामायण
इस प्रकार विश्वामित्र ने दशरथ के मन में पीडा उत्पन्न करते हुए कहा; मानो यम ही प्राणों की याचना कर रहा हो।
अपरिमेय तपस्या-सम्पन्न विश्वामित्र के वचन (दशरथ को) ऐसे लगे, मानों शत्रु-प्रयुक्त भाले से उत्पन्न मर्मस्थान के घाव में लूक घुस गया हो। अंतर की पीडा से निकाले जानेवाले उनके प्राण डोलायमान हो उठे, जिससे उन्हें ऐसी वेदना हुई कि कोई जन्म का अंधा आँखें पाकर फिर खो बैठा हो।
निरंतर बहनेवाले मधु के छत्ते के समान मधुस्रावी मालाओं से सुशोभित उन चक्रवर्ती ने किसी प्रकार अपनी पीडा को दबाकर मुनि से निवेदन किया—हे महात्मन् ! यह राम तो अभी छोटा है. शस्त्र चलाने का अभ्यास भी इसे नहीं है; यदि राक्षसों का वध ही आपका उद्देश्य हो; तो अपनी जटा के एक ओर से गंगा को प्रवाहित करनेवाला शिव, चतुर्मुख ब्रह्मा अथवा पुरंदर भी आकर विघ्नकारी बनें; तो उन विघ्नों का भी विघ्न बनकर मैं आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा। आप यज्ञ करने के लिए प्रस्तुत हो जायें।
दशरथ के इस प्रकार कहते ही मुनि, जो किसी समय अपर सृष्टि करने के लिए उद्यत हो गये थे; क्रोध से उबल पड़े : देवता यह आशंका करने लगे कि सृष्टि का अन्तकाल आ गया है : आकाश में चमकनेवाला सूर्य भी अदृश्य हो गया ॰ जहाँ-तहाँ स्थावर वस्तुएँ भी घूर्णायित होने लगीं ; (मुनि की) भौंहों के घने कोने (उनके) उठे हुए ललाट पर फैल गये : नयन रक्त वर्ण हो गये ; सभी दिशाओं में अँधेरा छा गया।
मुनि (विश्वामित्र) को क्रुद्ध जानकर (वसिष्ठ ने) उनसे प्रार्थना की कि हे मुनि, क्षमा करें : और (दशरथ से) कहा—जब तुम्हारे पुत्र को अप्राप्य हित स्वयं आकर प्राप्त हो रहा है, तब क्या उसका अवरोध करना उचित है ?
हे राजन् ! आज वह समय आया है, जब तुम्हारे पुत्र श्रीराम को अनन्त विद्याएँ उसी प्रकार प्राप्त हो रही हैं, जिस प्रकार वर्षा से बढ़ी हुई नदी की धाराएँ (स्वयं) सागर से जा मिलती हैं। (वसिष्ठ के) ये वचन सुनकर—
और गुरु की आज्ञा मानकर जयशील नरपति ने (अपने सेवकों को) आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर राम को यहाँ ले आओ, सेवकों ने जाकर राम से निवेदन किया कि चक्रवर्ती आपको बुला रहे हैं : समाचार पाकर ज्ञानातीत श्रीरामचन्द्र अपने पिता के निकट आये।
दशरथजी ने रामचन्द्र को तथा उनके साथ आये हुए भाई लक्ष्मण को, आगे वेदों में निणात विश्वामित्र को दिखाकर कहा—प्रभो ! इनके ललिता आप ही हैं, अनुपम माता आप ही हैं; मैंने इन्हें आपके सुपुर्द कर दिया, इनके अनुकूल जो भी कार्य हों, इनसे लीजिए। यों कहकर मुनिवर को अपने पुत्र सौंप दिये।
कुमारों को प्राप्त करके (कामादि) दुर्गुणों से रहित विश्वामित्र का क्रोध शान्त हो गया। इन्होंने (दशरथ को) आशीर्वाद दिया। फिर कुमारों से कहा—चलो अब हम जाकर यज्ञ सम्पन्न करेंगे। तीनों वहाँ से चलने को उद्यत हुए।
सभी लोगों की रक्षा करनेवाले (राम) ने विजयप्रद खड्ग अपनी कटि से बाँधा
वालकाण्ड ४१
सत्य के समान ही दो अक्षय तूणीर अपनी पर्वत-जैसी दोनो ऊँची भुजाओ मे बाँधे और (वाम कर मे) विजय देनेवाला धनुष धारण किया ।
(रामचन्द्र) अपने अनुज के साथ सभी प्रकार मे (आयुधो से) सन्नद्ध हो. विश्वामित्र की छाया के समान उनका अनुमरण करते हुए, अयोध्या का ऊँचा स्वर्णमय प्राचीर पारकर यों चले, मानो पिता दशरथ के प्राण शरीर छोड़कर जा रहे हो ।
(वे तीनो) अयोध्या नगरी को, जिसकी समानता करने मे देवताओ की अमरावती भी असमर्थ थी, पारकर सरयू नदी पर पहुँचे, जिममे हंसो का कल्लोल नृत्यशाला मे नर्त्तकियो के मजीरो की ध्वनि-सा प्रतीत होता था ।
(वे लोग) एक उपवन मे ठहर गये, जिसके चारो तरफ के खेतो में ईख के डठलों के परस्पर संघर्ष से निकला हुआ मधुरस खेत की मेड़ो को पारकर बह रहा था और जहाँ के भ्रमर कुड्मल-समान स्तनोवाली रमणियो के केशपाश-जैसे दीखने थे।
जब सात सुनहले घोड़ो के रथ पर सवार होनेवाला सूर्य, अपने शिखरो पर ठहरे हुए मेघो के कारण, मुखपट्टधारी गज के जैसे शोभायमान दीखनेवाले उदयाचल की दृढ चोटी पर पहुँचा, तब वे (तीनो) सरयू के पार पहुँच गये।
श्रीराम ने एक वन को देखा, जहाँ ऐसे यज्ञ होते थे, जिनमे देवता स्वयं आकर अपनी इच्छा से आहुति ग्रहण करते थे; जहाँ का सारा वन धुएँ से भरा हुआ था, चरम तत्त्वो के ज्ञाता भगवान् श्रीरामचन्द्र ने दिव्य और महातपस्वी विश्वामित्र को प्रणाम करके पूछा कि यह कौन-सा वन है ? (१-२४)
अध्याय ७
ताड़का-वध पटल
(विश्वामित्र ने कहा-) यह वही स्थान है, जहाँ मन्मथ ने चंद्रशेखर शिव पर पुष्प-बाण चलाये थे और शिव के ललाट-नेत्र की क्रोधाग्नि ने उसे जलाकर भस्म कर दिया था । उसी समय से वह (मन्मथ) अपने कुसुम-समान अंग के दग्ध हो जाने से अनग बन गया ।
हे देवो के अधिष्ठाता ! जब हस्तिचर्म धारण करनेवाले (शिवजी) ने उस मन्मथ को जलाकर भस्म कर दिया, तब उसका शरीर राख बनकर इस स्थान मे बिखर गया । इसी-लिए इस प्रान्त को अनंग देश कहते हैं और इसी कारण से इस आश्रम का नाम 'कामाश्म' पड़ गया है ।
आसक्ति, इच्छा आदि का समूल नाश करके आत्मज्ञान के इच्छुक (भक्त लोग) जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति पाने के लिए जिस (शिव) का ध्यान करते हैं, उन्ही (शिवजी) ने स्वयं इस स्थान पर रहकर तपस्या की थी फिर इस स्थान की पवित्रता का क्या कहना है ?
४२ कंब रामायण
विश्वामित्र की बात सुनकर राम और लक्ष्मण आश्चर्य मे पड़ गये, फिर तीनो उस स्थान में पहुँचे, वहाँ पहुँचकर उन्होंने, उनके स्वागत के लिए आये हुए सन्मार्गधन मुनियो की सत्संगति मे पूरा दिन व्यतीत किया और (दूसरे दिन) जब विस्तृत किरणो से प्रकाशमान सूर्य उदयाचल के शिखर पर चढ़ने लगा, तब (वे वहाँ से प्रस्थान करके) एक मरुस्थल में पहुँचे, जो (धूप मे) तप रहा था।
उस मरुस्थल में ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य कोई ऋतु नही होती थी, वहाँ सूर्यदेव भूमि का समस्त सार पीने के लिए विजय-ध्वजा फहराते हुए संचरण करते थे, गरमी के ताप के कारण वह स्थान ऐसा हो गया था कि यदि अग्निदेव भी उसका स्मरण करें, तो उनका मन भी कुम्हला उठे और उसकी ओर देखें, तो उनके नेत्र भी झुलस जायें।
यदि कोई उस मरुभूमि की उष्णता का वर्णन करना चाहे, तो वर्णन करनेवाले की जिह्वा झुलस जाय, वहाँ पहुँचकर (सारी सृष्टि को) आवृत कर फैलनेवाला अंधकार तथा अंतरिक्ष-रूपी आवरण भी झुलस जायें, वहाँ उदय होने पर सूर्य भी झुलस जाय, मेघ झुलस जायें, बिजली और वज्र भी झुलस जायें, ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो वहाँ पहुँचकर झुलस न जाय ?
वह वालुकामय प्रदेश उन योद्धाओ के हृदय के समान ही सर्वदा तपता रहता था और कभी ठंडा नही होता था, जो लड़ने की शक्ति खोकर, बाणो एवं भालों की वर्षा को सहते हुए युद्ध-क्षेत्र में पड़े हो और जो वंचक शत्रुओ के दुष्कृत्यो के कारण अपना मान-रूपी श्रेष्ठ रत्न खो बैठे हो।
उस बीहड़ प्रदेश में कही सूखे हुए सेंहुड, अगुरु आदि के वृक्ष खड़े थे, जिनके तनो को चीरकर भूत के जैसा काला अगुरु निकल रहा था, कही पत्तो से रहित बाँस के फट जाने से श्वेत मोती बिखर रहे थे, कही विषैले नागो के मुख से गिरे माणिक्य विकीर्ण हो रहे थे।
भू-माता उस स्थान से हट नही सकती थी, क्योकि वह अचला हैं, (उस स्थान की अधिष्ठात्री देवी) कालिका भी वहाँ से हट नही सकती थी, क्योकि उन्हे अपना स्थान नही छोड़ना चाहिए, उस स्थान के ऊपर सूर्य का रथ भी दौड़ नही पाता था, वहाँ के आकाश मे मेघ भी नही जा सकते थे, न वहाँ वायु का संचरण हो सकता था।
वहाँ (दर्शको के) नेत्रों को झुलसानेवाली विषाग्नि उगलनेवाला आदिशेष, आकाश को चीरनेवाली बिजली के समान चमकदार माणिक्य बिखेरता था। जब धरती की छाती को विदीर्ण करनेवाली सूर्य की प्रचण्ड किरणे उन माणिक्यो पर पडती थीं, तब ऐसा लगता था, मानो भू-देवी के शरीर मे खुले हुए घावो से रक्त निकल रहा हो।
व्याकुल करनेवाली क्षुधा से बेचैन होकर बड़ा अजगर जीव-जंतुओ को निगलने के लिए अपना मुँह खोलकर वहाँ पड़ा रहता था, गर्जन करनेवाला बलवान् हाथी गगन पर जलनेवाले सूर्य की उष्ण किरणो से रक्षा पाने के लिए छाया की खोज मे इधर-उधर भागता था और सामने अजगर के खुले मुख को देखकर उसके भीतर शीघ्रता से प्रवेश कर जाता था।
उस वालुका-भूमि में जहाँ अग्निदेव अपनी अतुलनीय उष्णता के साथ शासन
बालकाण्ड ४३
करते थे, कौए ओर हाथी भी झुलसकर काले हो जाते थे और यत्र-तत्र पड़े रहत थे , जिन्हें देखने से ऐसा लगता था, मानो उस मरुभूमि से उठकर सारे गगन मे छा जानेवाली उष्णता के कारण मेघ-समूह जल-भुनकर जहाँ-तहाँ गिरे पडे हो ।
उस स्थान मे जो मृग-मरीचिका सचरण करती थी, उसे देखने से भ्रम होता था कि वरुणदेव ही यह सोचकर वहाँ आ पहुँचे हों कि (उस मरुभूमि की) उष्णता कही बढकर गगन को भी न छू ले और कही देवलोक भी न जल जाय । (अर्थात्) देवताओ पर अनुग्रह करके ही वे वहाँ आ पहुँचे थे ।
उस संतप्त भूमि पर जो ग्रीष्म-रूपी राजा राज्य करता था, उसके बैठने के लिए बनाये गये सुनहले पैरवाले स्फटिक-सिंहासन के समान ही, वह मृग-मरीचिका ऊपर उठी हुई दिखाई देती थी ।
वह धरती इस प्रकार शुष्क थी, जिस प्रकार उन आत्मज्ञानियो का हृदय (शुष्क) होता है, जो (पुण्य और पाप-रूपी) दु ख-दायक विविध कर्मों को मिटाकर तथा दुर्निवार्य काम, क्रोध और मोह-रूपी बाधाजनक तीनो मोर्चों को पार कर, भक्ति-मार्ग पर चलते हैं; अथवा उन नारियो के मन के समान (शुष्क) था, जो सुवर्ण के लिए अपना शरीर बेच देती हैं।
तपानेवाली गरमी में झुलसे हुए छोटे-छोट कंकड़ वहाँ बिखरे पड़े थे, (गरमी के कारण) धरती मे जो दरारें पड़ गई थी, वे पाताल-लोक तक चली गई थी; इस प्रकार लंबी राह मिल जाने के कारण जगत् को तपानेवाली सूर्य-किरणे श्रेष्ठ माणिक्य से विभूषित सर्पराज के लोक में भी अनायास ही पहुँच जाती थी ।
जब इस प्रकार जलनेवाली बालुकामय उस भूमि में तीनो पहुँचे, तब विश्वामित्रने सोचा कि यद्यपि राम और लक्ष्मण अपार शक्ति-संपन्न हैं, तथापि वे पुष्प से भी अधिक कोमल हैं; अतः (इस मरुभूमि मे चलने में) उन्हे किंचित् कष्ट हो सकता है ।
(यह सोचकर) विश्वामित्र ने उनके मुखों की ओर दृष्टि डाली । इंगित को सहज ही जाननेवाले वे कुमार भी अपनी और देखनेवाले विश्वामित्र के चरणो के निकट जा पहुँचे । तब विश्वामित्र ने उन्हे ब्रह्मा द्वारा आविष्कृत दो विद्याएँ (बला तथा अतिबला) सिखाईं । दोनो ने उन मंत्रो का जप किया ।
जब वे उन मंत्रो का जप करते हुए चलने लगे, तब प्रलयाग्नि को भी पराजित करनेवाली भीषण अग्नि से उत्तप्त उस प्रदेश में यात्रा करना उसी प्रकार सरल हो गया, जैसे स्वच्छ तथा शीतल जल मे चलना होता है । उस समय भक्तो की इच्छा पूरी करनेवाले (श्रीराम) ने विश्वामित्र को प्रणाम करके पूछा—
'हे ज्ञानशिरोमणे! क्या यह प्रदेश, भँवरो से भरी हुई गंगा को पुष्पमाला के रूप मे अपनी जटा में धारण करनेवाले (शिव) की ललाट-दृष्टि पड़ने से इस प्रकार जल गया है, अथवा कोई और कारण है? क्या कारण है कि यह प्रदेश किसी निन्दनीय अत्याचारी नरेश के राज्य से भी अधिक उजड़ा हुआ पड़ा है?
(राम के) यह प्रश्न पूछने पर विश्वामित्र ने उत्तर दिया—एक ऐसी स्त्री का
४४ | कम्ब रामायण
वृत्तान्त तुम्हे सुनाता हूँ, जो अच्छे-अच्छे प्राणियो को मारकर खा जाती है, जिसका रूप यमराज के जैसा भयंकर है और जिसमे हजार मदमत्त हाथियो का बल है ।
यक्षो के कुल मे सुकेतु नामक निर्मल स्वभाववाला एक व्यक्ति उत्पन्न हुआ था, जो अपने बल से सारे ससार को चकित कर देता था, जिसका क्रोध अग्नि के समान जलानेवाला था; जो मोह से रहित था और जो हाथी जैसा बलवान् होने पर भी बडा कृपालु था ।
सुकेतु के कोई सतान नही थी, इसलिए वह बहुत चिन्तित रहता था । उसने (सतान-प्राप्ति के लिए) एक लंबी अवधि तक कमल-पुष्प पर आसीन ब्रह्मदेव के निमित्त कडी तपस्या की ।
हे सूक्ष्म ज्ञानयुक्त (रामचन्द्र) ! (सुकेतु के तपस्या करते समय) वेदो के आश्रय ब्रह्मदेव उसके सम्मुख प्रकट हुए और पूछा कि तुम्हारा अभीष्ट क्या है ? सुकेतु ने प्रार्थना की कि मेरे कोई पुत्र नही, इसलिए मै दुःखी हूँ । पुत्र-प्राप्ति का वर दीजिए । ब्रह्मा ने उत्तर दिया—तुम्हारे कोई पुत्र नही होगा; एक पुत्री ही होगी।
तुम्हारे एक ऐसी पुत्री होगी, जो कमल-पुष्प पर निवास करनेवाली सरस्वती के सदृश नित्य-यौवना, मयूर-जैसी सुन्दर, लक्ष्मी की समता करनेवाली तथा एक हजार मत्त हाथियो के बल से युक्त होगी । तुम चिन्ता छोडकर अपने घर जाओ ।
ब्रह्मदेव के वरदान के अनुसार उसके एक पुत्री हुई । जब वह पुत्री कमल-पुष्प-वासिनी सुन्दर लक्ष्मी के सदृश युवती हुई, तब सुकेतु ने सोचा कि इसके अनुकूल पति कौन हो सकता है ? अत मे अपनी ही जाति के अधिपति सुद नामक यक्ष से उसका विवाह कर दिया ।
सुद और उसकी पत्नी ताडका, रात-दिन आनन्द सागर मे डूबे रहते । उनके सुख की कोई सीमा नही रही ।
बहुत दिन बीतने पर, लक्ष्मी-समान उस ताडका के गर्भ से पर्वत-सदृश भुजाओवाला मारीच एव मल्ल-युद्ध मे निपुण सुबाहु उत्पन्न हुए, जिनके जन्म से सारा ससार भय से काँप गया ।
ये दोनो कुमार माया म, वचना मे और अपार बल मे इस प्रकार उन्नति करते गये कि उन्होने अपनी माँ से भी बढकर इन कलाओ का अभ्यास कर लिया और उससे भी आगे बढ गये । उनका पिता सुद, जिसका क्रोध जलानेवाला होता था, आनन्द की अधिकता के कारण—
दुर्गुणो से भरे असुरो का अत्याचार मिटानेवाले तथा विक्षुब्ध सागर को एक ही चुल्लू मे भरकर पी जानेवाले महातपस्वी (अगस्त्य) के आश्रम में पहुँचकर ऊँचे वृक्षो को जड से उखाडकर फेंकने लगा ।
अधिक स्पृहणीय तपस्या करनेवाले मुनि जिस आश्रम में रहते थे, वहाँ के कृष्णसार. रुरु. ऋष्य आदि (जातियो के) हिरणो को मारकर खा लिया और ऊँचे 'सुरपुन्ना' आदि वृक्षो को तोड दिया । इसपर महातपस्वी (अगस्त्य) ने क्रोध से अपनी अग्निमय दृष्टि फेरकर देखा तो वह जलकर भस्म हो गया ।