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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

बालकाण्ड ३६

उस सिंहवली दशरथ के सामने एकाएक बड़े क्रोधी विश्वामित्र ऋषि आ उपस्थित हुए, जिन्होंने कभी सभी प्राणियों और लोकों का अलग सर्जन करके नये देवगण तथा नये ब्रह्मा की भी सृष्टि करने का उपक्रम किया था।

मुनि के आते ही, दशरथ झट अपने आसन से उठकर उनके चरणों में नत हुए, जैसे कमलासन (ब्रह्मा) के आगमन पर इंद्र उठ खड़ा हुआ हो. तब दशरथ के वक्ष पर (उनके उठने के साथ) हार भी हिलडुलकर यों किरण फेंकने लगे, जिससे सूर्य की कांति भी परास्त हो जाती थी।

(दशरथ ने मुनि को) प्रणाम कर उन्हें रत्नों से जड़े हुए स्वर्णासन पर बड़े प्रेम से बिठाया और उनके चरणकमल-युगल की अर्चना करके, हाथ जोड़कर कहा कि (आपके आगमन से) मेरे प्रारब्ध कर्म की परंपरा अभी टूट गई। (अर्थात्, मैं कर्म-बंधन से मुक्त हो गया।

हे महात्मन् ! आप इस नगर में सुलभता से पधारे और मैं आपकी परिक्रमा करके आपको प्रणाम कर सका, इस सौभाग्य का कारण यदि इस देश का किया हुआ तप मानें, तो वह नहीं है या मेरे किये अच्छे कर्म मानें, तो वह भी नहीं है : हाँ इसका कारण मेरे पूर्वजों के द्वारा किया हुआ तप ही हो सकता है। जब दशरथ ने इस प्रकार कहा. तब विश्वामित्र ने उत्तर दिया—

शत्रुओं का वध करके उनके मांस से युक्त भाला धारण करनेवाले, हे (दशरथ) ! मुझ जैसे मुनियों और देवताओं पर यदि कोई विपदा आ पड़े, तो सभी पर्वतों का उपहास करनेवाला धवल हिमाचल, क्षीरसागर, कमलासन के नगर (सत्य लोक) तथा कल्पवृक्ष से सुशोभित अमरावती के सदृश सुन्दर अट्टालिकाओं से विभूषित अयोध्या नगरी को छोड़, शरण देनेवाला स्थान क्या अन्य कोई हो सकता है ?

हे चक्रवर्त्ती ! मनोहर कल्पवृक्ष कि छाया में, जहाँ सुगंधित मधु यत्र-तत्र बिखरा रहता है, बैठकर शासन करनेवाला इंद्र जब राज्य से वंचित होकर तुम्हारे श्वेतच्छत्र की छाया में शरणागत हुआ था और अपने कष्ट बताकर सहायता की अभ्यर्थना करते हुए तुम्हारे सम्मुख आया था, तब तुमने ही तो उसपर कृपादृष्टि फेरकर कुलपर्वत-समान भुजाओं से युक्त ‘शंबर’ नामक असुर का समूल नाश करके इंद्र को उसका राज्य दिलवाया था: इन्द्र आज जो राज्य कर रहा है, वह तुम्हारा दिया हुआ ही तो है।

जब विश्वामित्र महर्षि ने इस प्रकार कहा, तब दशरथ के हृदय में आनन्द का एक समुद्र-सा उमड़ पड़ा, जिसका अंत कोई देख नहीं सकता था; उन्होंने हाथ जोड़कर मुनि से विनती की कि राज्यभार प्राप्त करने का जो फल हो सकता है, वह (आपके दर्शनों से) मुझे प्राप्त हो चुका, अब मुझे जो करना हो, उसकी आज्ञा दें तब विश्वामित्र ने उत्तर दिया--

मैं एक यज्ञ करना चाहता हूँ; उस यज्ञ की रक्षा उन राक्षसों से करनी है, जो उसमें विघ्न डालने आयेंगे, जिस प्रकार काम, क्रोध आदि दुर्गुण, मुनियों को डराते हुए उनके पास आ पहुँचते हैं तुम अपने चार पुत्रों में श्यामल (श्रीरामचन्द्र) को, युद्ध में अडिग रहकर उन राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा करने का आदेश देकर मेरे साथ भेज दो।