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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

२० कंब रामायण

इस प्रकार विश्वामित्र ने दशरथ के मन में पीडा उत्पन्न करते हुए कहा; मानो यम ही प्राणों की याचना कर रहा हो।

अपरिमेय तपस्या-सम्पन्न विश्वामित्र के वचन (दशरथ को) ऐसे लगे, मानों शत्रु-प्रयुक्त भाले से उत्पन्न मर्मस्थान के घाव में लूक घुस गया हो। अंतर की पीडा से निकाले जानेवाले उनके प्राण डोलायमान हो उठे, जिससे उन्हें ऐसी वेदना हुई कि कोई जन्म का अंधा आँखें पाकर फिर खो बैठा हो।

निरंतर बहनेवाले मधु के छत्ते के समान मधुस्रावी मालाओं से सुशोभित उन चक्रवर्ती ने किसी प्रकार अपनी पीडा को दबाकर मुनि से निवेदन किया—हे महात्मन् ! यह राम तो अभी छोटा है. शस्त्र चलाने का अभ्यास भी इसे नहीं है; यदि राक्षसों का वध ही आपका उद्देश्य हो; तो अपनी जटा के एक ओर से गंगा को प्रवाहित करनेवाला शिव, चतुर्मुख ब्रह्मा अथवा पुरंदर भी आकर विघ्नकारी बनें; तो उन विघ्नों का भी विघ्न बनकर मैं आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा। आप यज्ञ करने के लिए प्रस्तुत हो जायें।

दशरथ के इस प्रकार कहते ही मुनि, जो किसी समय अपर सृष्टि करने के लिए उद्यत हो गये थे; क्रोध से उबल पड़े : देवता यह आशंका करने लगे कि सृष्टि का अन्तकाल आ गया है : आकाश में चमकनेवाला सूर्य भी अदृश्य हो गया ॰ जहाँ-तहाँ स्थावर वस्तुएँ भी घूर्णायित होने लगीं ; (मुनि की) भौंहों के घने कोने (उनके) उठे हुए ललाट पर फैल गये : नयन रक्त वर्ण हो गये ; सभी दिशाओं में अँधेरा छा गया।

मुनि (विश्वामित्र) को क्रुद्ध जानकर (वसिष्ठ ने) उनसे प्रार्थना की कि हे मुनि, क्षमा करें : और (दशरथ से) कहा—जब तुम्हारे पुत्र को अप्राप्य हित स्वयं आकर प्राप्त हो रहा है, तब क्या उसका अवरोध करना उचित है ?

हे राजन् ! आज वह समय आया है, जब तुम्हारे पुत्र श्रीराम को अनन्त विद्याएँ उसी प्रकार प्राप्त हो रही हैं, जिस प्रकार वर्षा से बढ़ी हुई नदी की धाराएँ (स्वयं) सागर से जा मिलती हैं। (वसिष्ठ के) ये वचन सुनकर—

और गुरु की आज्ञा मानकर जयशील नरपति ने (अपने सेवकों को) आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर राम को यहाँ ले आओ, सेवकों ने जाकर राम से निवेदन किया कि चक्रवर्ती आपको बुला रहे हैं : समाचार पाकर ज्ञानातीत श्रीरामचन्द्र अपने पिता के निकट आये।

दशरथजी ने रामचन्द्र को तथा उनके साथ आये हुए भाई लक्ष्मण को, आगे वेदों में निणात विश्वामित्र को दिखाकर कहा—प्रभो ! इनके ललिता आप ही हैं, अनुपम माता आप ही हैं; मैंने इन्हें आपके सुपुर्द कर दिया, इनके अनुकूल जो भी कार्य हों, इनसे लीजिए। यों कहकर मुनिवर को अपने पुत्र सौंप दिये।

कुमारों को प्राप्त करके (कामादि) दुर्गुणों से रहित विश्वामित्र का क्रोध शान्त हो गया। इन्होंने (दशरथ को) आशीर्वाद दिया। फिर कुमारों से कहा—चलो अब हम जाकर यज्ञ सम्पन्न करेंगे। तीनों वहाँ से चलने को उद्यत हुए।

सभी लोगों की रक्षा करनेवाले (राम) ने विजयप्रद खड्ग अपनी कटि से बाँधा