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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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वालकाण्ड ४१

सत्य के समान ही दो अक्षय तूणीर अपनी पर्वत-जैसी दोनो ऊँची भुजाओ मे बाँधे और (वाम कर मे) विजय देनेवाला धनुष धारण किया ।

(रामचन्द्र) अपने अनुज के साथ सभी प्रकार मे (आयुधो से) सन्नद्ध हो. विश्वामित्र की छाया के समान उनका अनुमरण करते हुए, अयोध्या का ऊँचा स्वर्णमय प्राचीर पारकर यों चले, मानो पिता दशरथ के प्राण शरीर छोड़कर जा रहे हो ।

(वे तीनो) अयोध्या नगरी को, जिसकी समानता करने मे देवताओ की अमरावती भी असमर्थ थी, पारकर सरयू नदी पर पहुँचे, जिममे हंसो का कल्लोल नृत्यशाला मे नर्त्तकियो के मजीरो की ध्वनि-सा प्रतीत होता था ।

(वे लोग) एक उपवन मे ठहर गये, जिसके चारो तरफ के खेतो में ईख के डठलों के परस्पर संघर्ष से निकला हुआ मधुरस खेत की मेड़ो को पारकर बह रहा था और जहाँ के भ्रमर कुड्मल-समान स्तनोवाली रमणियो के केशपाश-जैसे दीखने थे।

जब सात सुनहले घोड़ो के रथ पर सवार होनेवाला सूर्य, अपने शिखरो पर ठहरे हुए मेघो के कारण, मुखपट्टधारी गज के जैसे शोभायमान दीखनेवाले उदयाचल की दृढ चोटी पर पहुँचा, तब वे (तीनो) सरयू के पार पहुँच गये।

श्रीराम ने एक वन को देखा, जहाँ ऐसे यज्ञ होते थे, जिनमे देवता स्वयं आकर अपनी इच्छा से आहुति ग्रहण करते थे; जहाँ का सारा वन धुएँ से भरा हुआ था, चरम तत्त्वो के ज्ञाता भगवान् श्रीरामचन्द्र ने दिव्य और महातपस्वी विश्वामित्र को प्रणाम करके पूछा कि यह कौन-सा वन है ? (१-२४)


अध्याय ७

ताड़का-वध पटल

(विश्वामित्र ने कहा-) यह वही स्थान है, जहाँ मन्मथ ने चंद्रशेखर शिव पर पुष्प-बाण चलाये थे और शिव के ललाट-नेत्र की क्रोधाग्नि ने उसे जलाकर भस्म कर दिया था । उसी समय से वह (मन्मथ) अपने कुसुम-समान अंग के दग्ध हो जाने से अनग बन गया ।

हे देवो के अधिष्ठाता ! जब हस्तिचर्म धारण करनेवाले (शिवजी) ने उस मन्मथ को जलाकर भस्म कर दिया, तब उसका शरीर राख बनकर इस स्थान मे बिखर गया । इसी-लिए इस प्रान्त को अनंग देश कहते हैं और इसी कारण से इस आश्रम का नाम 'कामाश्म' पड़ गया है ।

आसक्ति, इच्छा आदि का समूल नाश करके आत्मज्ञान के इच्छुक (भक्त लोग) जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति पाने के लिए जिस (शिव) का ध्यान करते हैं, उन्ही (शिवजी) ने स्वयं इस स्थान पर रहकर तपस्या की थी फिर इस स्थान की पवित्रता का क्या कहना है ?