कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ कंब रामायण
विश्वामित्र की बात सुनकर राम और लक्ष्मण आश्चर्य मे पड़ गये, फिर तीनो उस स्थान में पहुँचे, वहाँ पहुँचकर उन्होंने, उनके स्वागत के लिए आये हुए सन्मार्गधन मुनियो की सत्संगति मे पूरा दिन व्यतीत किया और (दूसरे दिन) जब विस्तृत किरणो से प्रकाशमान सूर्य उदयाचल के शिखर पर चढ़ने लगा, तब (वे वहाँ से प्रस्थान करके) एक मरुस्थल में पहुँचे, जो (धूप मे) तप रहा था।
उस मरुस्थल में ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य कोई ऋतु नही होती थी, वहाँ सूर्यदेव भूमि का समस्त सार पीने के लिए विजय-ध्वजा फहराते हुए संचरण करते थे, गरमी के ताप के कारण वह स्थान ऐसा हो गया था कि यदि अग्निदेव भी उसका स्मरण करें, तो उनका मन भी कुम्हला उठे और उसकी ओर देखें, तो उनके नेत्र भी झुलस जायें।
यदि कोई उस मरुभूमि की उष्णता का वर्णन करना चाहे, तो वर्णन करनेवाले की जिह्वा झुलस जाय, वहाँ पहुँचकर (सारी सृष्टि को) आवृत कर फैलनेवाला अंधकार तथा अंतरिक्ष-रूपी आवरण भी झुलस जायें, वहाँ उदय होने पर सूर्य भी झुलस जाय, मेघ झुलस जायें, बिजली और वज्र भी झुलस जायें, ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो वहाँ पहुँचकर झुलस न जाय ?
वह वालुकामय प्रदेश उन योद्धाओ के हृदय के समान ही सर्वदा तपता रहता था और कभी ठंडा नही होता था, जो लड़ने की शक्ति खोकर, बाणो एवं भालों की वर्षा को सहते हुए युद्ध-क्षेत्र में पड़े हो और जो वंचक शत्रुओ के दुष्कृत्यो के कारण अपना मान-रूपी श्रेष्ठ रत्न खो बैठे हो।
उस बीहड़ प्रदेश में कही सूखे हुए सेंहुड, अगुरु आदि के वृक्ष खड़े थे, जिनके तनो को चीरकर भूत के जैसा काला अगुरु निकल रहा था, कही पत्तो से रहित बाँस के फट जाने से श्वेत मोती बिखर रहे थे, कही विषैले नागो के मुख से गिरे माणिक्य विकीर्ण हो रहे थे।
भू-माता उस स्थान से हट नही सकती थी, क्योकि वह अचला हैं, (उस स्थान की अधिष्ठात्री देवी) कालिका भी वहाँ से हट नही सकती थी, क्योकि उन्हे अपना स्थान नही छोड़ना चाहिए, उस स्थान के ऊपर सूर्य का रथ भी दौड़ नही पाता था, वहाँ के आकाश मे मेघ भी नही जा सकते थे, न वहाँ वायु का संचरण हो सकता था।
वहाँ (दर्शको के) नेत्रों को झुलसानेवाली विषाग्नि उगलनेवाला आदिशेष, आकाश को चीरनेवाली बिजली के समान चमकदार माणिक्य बिखेरता था। जब धरती की छाती को विदीर्ण करनेवाली सूर्य की प्रचण्ड किरणे उन माणिक्यो पर पडती थीं, तब ऐसा लगता था, मानो भू-देवी के शरीर मे खुले हुए घावो से रक्त निकल रहा हो।
व्याकुल करनेवाली क्षुधा से बेचैन होकर बड़ा अजगर जीव-जंतुओ को निगलने के लिए अपना मुँह खोलकर वहाँ पड़ा रहता था, गर्जन करनेवाला बलवान् हाथी गगन पर जलनेवाले सूर्य की उष्ण किरणो से रक्षा पाने के लिए छाया की खोज मे इधर-उधर भागता था और सामने अजगर के खुले मुख को देखकर उसके भीतर शीघ्रता से प्रवेश कर जाता था।
उस वालुका-भूमि में जहाँ अग्निदेव अपनी अतुलनीय उष्णता के साथ शासन